संपूर्ण क्रांति के 52 साल : गांधी मैदान से जेपी की हुंकार ने बदली राजनीति की धारा
लखनऊ, 4 जून (आईएएनएस)। 5 जून 1974... इतिहास के पन्नों में दर्ज सिर्फ एक तारीख नहीं है, बल्कि उस दिन की याद दिलाता है, जब देश में पहली बार संपूर्ण क्रांति की मांग उठी थी। पटना का गांधी मैदान, शाम का वक्त और लोगों का ऐसा सैलाब, जैसा बिहार ने पहले कम ही देखा था। अनुमान है कि करीब पांच लाख लोग वहां मौजूद थे। मंच पर एक ऐसे नेता खड़े थे, जिनकी ताकत सत्ता की कुर्सी से नहीं, बल्कि जनता के विश्वास से थी। वह थे लोकनायक जयप्रकाश नारायण, जिन्हें जेपी भी कहा जाता था।
उस दिन गांधी मैदान में जेपी ने एक ऐसा नारा दिया, जिसने भारतीय राजनीति की दिशा ही बदल दी। उन्होंने कहा, "संपूर्ण क्रांति"। क्रांति शब्द नया नहीं था, लेकिन "संपूर्ण क्रांति" का विचार बिल्कुल नया था। जेपी का मानना था कि केवल सरकार बदलने से देश नहीं बदलेगा। बदलाव राजनीति, समाज, शिक्षा, अर्थव्यवस्था और व्यवस्था के हर स्तर पर होना चाहिए। यही संपूर्ण क्रांति थी।
दरअसल, उस समय देश और खासकर बिहार में भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और महंगाई को लेकर लोगों में भारी नाराजगी थी। छात्र आंदोलन तेज हो रहा था। गुजरात में छात्रों के आंदोलन ने सरकार को झुकने पर मजबूर कर दिया था। बिहार के युवा भी बदलाव चाहते थे। ऐसे माहौल में जेपी आंदोलन के नेतृत्व के लिए आगे आए और देखते ही देखते यह आंदोलन बिहार की सीमाओं को पार कर पूरे देश में फैल गया।
गांधी मैदान में जुटी भीड़ केवल एक राजनीतिक सभा का हिस्सा नहीं थी। वह बदलाव की उम्मीद लेकर आई थी। जेपी ने अपने भाषण में साफ कहा था कि संपूर्ण क्रांति का मतलब समाज के सबसे दबे-कुचले और कमजोर व्यक्ति को सत्ता के शिखर तक पहुंचाने की व्यवस्था बनाना है।
उस दिन गांधी मैदान से जो आवाज उठी, उसकी गूंज दिल्ली तक सुनाई दी। आंदोलन लगातार मजबूत होता गया और केंद्र की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार पर दबाव बढ़ता गया। आखिरकार देश ने आपातकाल का दौर भी देखा और फिर सत्ता परिवर्तन का ऐतिहासिक क्षण भी आया।
दिलचस्प बात यह है कि उस आंदोलन से निकले कई युवा बाद में भारतीय राजनीति के बड़े चेहरे बने। नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव, सुशील कुमार मोदी, शिवानंद तिवारी और कई अन्य नेता उसी छात्र आंदोलन की उपज थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कई मौकों पर जेपी आंदोलन से मिली प्रेरणा का उल्लेख कर चुके हैं। आज देश और बिहार की राजनीति में जिन नेताओं का प्रभाव दिखाई देता है, उनमें से कई किसी न किसी रूप में उस आंदोलन की विरासत से जुड़े रहे हैं।
लेकिन गांधी मैदान की कहानी केवल जेपी आंदोलन तक सीमित नहीं है। यह मैदान भारत के स्वतंत्रता आंदोलन और आधुनिक राजनीति का भी महत्वपूर्ण गवाह रहा है। अंग्रेजों के शासनकाल में इसे बांकीपुर मैदान कहा जाता था। महात्मा गांधी ने चंपारण सत्याग्रह के बाद यहां विशाल जनसभा को संबोधित किया था। बाद में इसका नाम गांधी मैदान पड़ गया। यहीं 1938 में मोहम्मद अली जिन्ना ने मुस्लिम लीग की ऐतिहासिक रैली को संबोधित किया था और 1939 में सुभाष चंद्र बोस ने फॉरवर्ड ब्लॉक की पहली बड़ी सभा की थी।
आज, पांच दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी जब बिहार या देश की राजनीति में बदलाव, जनआंदोलन या लोकतांत्रिक मूल्यों की चर्चा होती है, तो गांधी मैदान और जेपी का "संपूर्ण क्रांति" का नारा जरूर याद किया जाता है।
--आईएएनएस
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