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रुपया ऐतिहासिक गिरावट पर, वीडियो में जाने डॉलर के मुकाबले 93.24 के रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुंचा

 

भारतीय रुपये ने 20 मार्च को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अपने इतिहास के सबसे निचले स्तर को छू लिया। कारोबार के दौरान रुपया 93.24 प्रति डॉलर तक गिर गया, जो अब तक का रिकॉर्ड लो है। हालांकि बाद में इसमें थोड़ा सुधार देखने को मिला और यह 93.12 के स्तर पर आ गया।

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विशेषज्ञों के अनुसार, रुपये में यह गिरावट कई वैश्विक और घरेलू कारणों का परिणाम है। सबसे बड़ा कारण कच्चे तेल की कीमतों में आई तेजी को माना जा रहा है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का लगभग 85% हिस्सा आयात करता है और इसके लिए उसे विदेशी मुद्रा, खासकर अमेरिकी डॉलर में भुगतान करना पड़ता है। जब तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो डॉलर की मांग भी बढ़ जाती है, जिससे रुपये पर दबाव पड़ता है।

इस महीने की शुरुआत में रुपया 92 के स्तर के आसपास कारोबार कर रहा था, लेकिन हाल के दिनों में इसमें तेज गिरावट देखने को मिली है। डॉलर के मुकाबले पहली बार 93 का मनोवैज्ञानिक स्तर पार करना बाजार के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है। यह दर्शाता है कि रुपये पर दबाव लगातार बढ़ रहा है।

तेल की कीमतों में उछाल का एक बड़ा कारण खाड़ी देशों के ऊर्जा ठिकानों पर हाल ही में हुए हमले बताए जा रहे हैं। इन घटनाओं के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें 110 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गईं। कच्चे तेल की कीमतों में इस तेज उछाल ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता पैदा कर दी है, जिसका सीधा असर भारत जैसी आयात-निर्भर अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ रहा है।

इसके अलावा, विदेशी निवेशकों द्वारा भारतीय बाजार से लगातार पूंजी निकालना भी रुपये की कमजोरी का एक प्रमुख कारण है। जब विदेशी निवेशक अपने निवेश को भारत से बाहर निकालते हैं, तो डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपये पर दबाव बनता है। इस पूंजी निकासी का असर शेयर बाजार के साथ-साथ मुद्रा बाजार पर भी देखा जा रहा है।

आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कच्चे तेल की कीमतें इसी तरह ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं और वैश्विक अनिश्चितता जारी रहती है, तो रुपये पर दबाव आगे भी बना रह सकता है। हालांकि, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) समय-समय पर बाजार में हस्तक्षेप करके मुद्रा को स्थिर करने की कोशिश करता है।

फिलहाल, बाजार की नजर आने वाले दिनों में होने वाले वैश्विक आर्थिक घटनाक्रम और तेल की कीमतों पर टिकी हुई है। रुपये की इस ऐतिहासिक गिरावट ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि भारत अपनी आयात निर्भरता को कैसे संतुलित करेगा और मुद्रा को कैसे मजबूत बनाएगा।