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'आरएसएस को राजनीतिक चश्मे से नहीं, सेवा कार्यों से समझें', 'हंड्रेड ईयर्स यंग' की लेखिका रश्मि सामंत

 

नई दिल्‍ली, 18 अक्‍टूबर (आईएएनएस)। राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ (आरएसएस) असल में सेवा पर आधारित संगठन है, जहां सेवा ही सबसे बड़ा कर्तव्य है। आरएसएस को लेकर बहुत गलतफहमियां हैं और इसे लगभग पूरी तरह से एक राजनीतिक नजरिए से देखा जाता है। जिन लोगों ने इस संगठन के साथ काम किया है या इसके संपर्क में रहे हैं, उनका अनुभव बहुत सकारात्मक रहा है। ये बातें 'हंड्रेड ईयर्स यंग : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ' की लेखिका रश्मि सामंत ने आईएएनएस से खास बातचीत के दौरान कही।

आईएएनएस से बातचीत में रश्मि सामंत ने कहा कि भारत के असली युवा यानी वास्तविक 'जेनजी' रचनात्मक कार्यों में सक्रिय रूप से लगे हुए हैं। वे राष्ट्र-निर्माण, सकारात्मक पहलों और प्रभावशाली प्रयासों में जुटे हैं। उदाहरण के लिए, स्काईरूट ने भारत का पहला निजी तौर पर निर्मित अंतरिक्ष यान लॉन्च किया। 'हंड्रेड ईयर्स यंग : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ' की लेखिका रश्मि सामंत ने आईएएनएस से खास बातचीत की। यहां पढ़िए बातचीत के प्रमुख अंश।

सवाल - 'हंड्रेड ईयर्स यंग : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ' पुस्‍तक के जरिए आरएसएस की ऐसी कौन सी तस्‍वीर सामने लाना चाहती थीं, जो आम राजनीतिक बहस में अक्‍सर दिखाई नहीं देती?

जवाब - राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को अक्सर एक खास नजरिए से देखा जाता है या अंग्रेजी में कहें तो, एक 'कलर्ड लेंस' (पूर्वाग्रह वाले चश्मे) से देखा जाता है। लेकिन जिन लोगों ने इस संगठन के साथ काम किया है या इसके संपर्क में रहे हैं, उनका अनुभव बहुत सकारात्मक रहा है। इसलिए, मेरा नजरिया यह था कि हमें ऐसे लोगों को सामने लाना चाहिए, जिन्होंने संगठन के साथ काम किया है और इसे करीब से देखा है। ये वे लोग नहीं हैं, जो बचपन से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े रहे हों; बल्कि, वे बाद में इससे जुड़े, देखा कि संघ कैसे काम करता है और चीजों को कैसे देखता है, और फिर उनकी सोच बदल गई। इसलिए, अगर आप इन लेखों को पढ़ेंगे, तो पाएंगे कि पहले उनकी भी एक खास धारणा थी, बाकी लोगों की तरह ही, लेकिन जब उन्होंने आरएसएस के साथ काम करना शुरू किया और इसके संपर्क में आए, तो उनका नजरिया पूरी तरह से बदल गया। तो, यह 20 युवा और प्रतिभाशाली लोगों के उस बदलाव की कहानी है, जिन्होंने अपने जीवन के अलग-अलग क्षेत्रों में सफलता हासिल की है।"

सवाल - किताब के शीर्षक का क्‍या अर्थ है? आपके अनुसार एक शताब्‍दी पुराना संगठन आज की युवा पीढ़ी के लिए कैसे प्रासंगिक बना रह सकता है?

जवाब - अगर आप संघ की किसी भी शाखा में जाएं, तो आप देखेंगे कि युवा वहां खेल-कूद, शारीरिक गतिविधियों और बौद्धिक चर्चाओं में सक्रिय रूप से शामिल हैं। आज भी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ युवाओं का ही एक संगठन है। यही वजह है कि इस किताब का शीर्षक '100 ईयर्स यंग' रखा गया है, क्योंकि इसमें योगदान देने वाले सभी लेखक 40 साल से कम उम्र के हैं। असल में, इनमें से ज्यादातर 30 साल से भी कम उम्र के हैं, और केवल कुछ ही ऐसे हैं, जिनकी उम्र 30 साल से अधिक है।

सवाल - 18 युवा अचीवर्स (सफल युवाओं) को चुनने के मापदंड और इसमें कौन लोग शामिल हैं, जिनकी आरएसएस को लेकर अलग राय या अनुभव है?

जवाब - इस किताब में लिखने वाले लेखकों ने इसे एक सामान्य नजरिए से देखा है और बताया है कि कैसे ये बातें उनके रोजमर्रा के जीवन में सामने आती हैं। यह एक बहुत ही अनोखी और बेहतरीन रचना है, जो यह दिखाती है कि असल जिंदगी में इन धारणाओं को कैसे जिया जाता है। मेरा मकसद यह था कि इसमें सभी धर्मों, सभी पहचानों और अलग-अलग राष्ट्रीयताओं के लोगों को शामिल किया जाए। इसलिए, इस किताब में आपको न केवल भारतीय, बल्कि ब्रिटिश, इजरायली और अमेरिकी योगदानकर्ता भी मिलेंगे। हिंदुओं के अलावा, इसमें आपको ईसाई, मुस्लिम और यहूदी दृष्टिकोण भी देखने को मिलेंगे। इसमें एलजीबीटीक्‍यूआईए प्‍लस समुदाय के लोग और उनके समर्थक भी शामिल हैं। कोशिश यह थी कि अलग-अलग पहचान और पृष्ठभूमि के लोगों को एक साथ लाया जाए, ताकि आप आरएसएस को हर नजरिए से देख सकें, बस किसी खास पूर्वाग्रह वाले चश्मे से नहीं।

सवाल - किताब में हिंदुत्‍व, धर्म और राष्‍ट्र की अवधारणाओं पर चर्चा है। आप इन विचारों को भारत के संवैधानिक मूल्‍य, धार्मिक प्रवृत्ति और समान नागरिकता के साथ किस तरह से जोड़कर देखती हैं?

जवाब - इस किताब के लेखक इसे सामान्‍य तौर से देखते हैं। हर दिन की जिंदगी में यह तथ्‍य कैसे सामने आते हैं। मैं इसे अद्भुत और यूनिक लेखनी कहना चाहूंगी, जिसमें इन सारी धारणाओं को कैसे जीया जाता है, वो देखा गया है।

सवाल - आरएसएस को लेकर अलग-अलग धारणाएं हैं। क्‍या इस किताब का उद्देश्‍य उन धारणाओं को बदलना है या पाठकों को संगठन को समझने के लिए दृष्टिकोण देना है?

जवाब - इस किताब की प्रस्तावना में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत लिखते हैं कि कई लोगों ने संघ को ठीक से जाने बिना ही उसके बारे में बहुत आलोचनात्मक या नकारात्मक बातें लिखी हैं, जबकि कुछ अन्य लोगों ने इसकी बहुत ज्‍यादा तारीफ की है। लेकिन, इस किताब में आपको एक बीच का रास्ता मिलेगा, जहां लोग अपने अनुभवों और अपनी बदली हुई धारणाओं के आधार पर बात रखते हैं। यह किसी खास विचारधारा या नजरिए के चश्मे से चीजों को देखने के बारे में नहीं है; बल्कि यह बस आरएसएस और उसकी गतिविधियों को अनुभव करने और उनके बारे में लिखने के बारे में है।

सवाल - किताब में सेवा और राष्‍ट्र निर्माण पर जोर दिया गया है। आपके मुताबिक, आरएसएस के सामाजिक कार्यों का मूल्‍यांकन करते समय किस ठोस परिणामों और मापदंडों को देखना चाहिए?

जवाब - अगर आप आरएसएस के कामों को देखें, तो आपको यह ध्यान देना होगा कि पिछले 100 सालों में, चाहे भूकंप आया हो, बाढ़ आई हो, या फिर कोविड महामारी जैसा कोई संकट आया हो, हर बार उनका योगदान साफ ​​नजर आया है। अगर आप इस किताब का कवर पेज देखें, तो इसमें 1963 की गणतंत्र दिवस परेड दिखाई गई है, जिसमें 3,500 स्वयंसेवकों ने मार्च किया था। बहुत से लोग नहीं जानते कि 1962 में चीन के साथ युद्ध के दौरान, जब सिविल पुलिस को सीमा पर तैनात किया गया था, तब पूरे भारत में सिविल प्रशासन से जुड़े काम जैसे ट्रैफिक संभालना आरएसएस के स्वयंसेवकों ने ही किए थे। इसके बारे में किसी को नहीं पता है। लेकिन, यह ऐतिहासिक है और इसकी तस्‍वीर भी मौजूद है। इसका सबूत भी है कि पंडित जवाहर लाल नेहरू ने संघ को गणतंत्र दिवस परेड में शामिल होने के लिए निमंत्रण दिया था। इसी तरह बहुत सी चीजें हैं, जिसकी जानकारी लोगों को नहीं है। आरएसएस को नैरेटिव के आधार पर देखा जाता है। मेरा मानना है कि आप हकीकत को जानिए, सबूत देखिए, फिर अपना मन बनाइए। हमें स्‍लोगन और कहावतों से दूर हटकर इतिहास को देखना चाहिए। यह किताब वही कर रहा है, यह किताब यह नहीं कहता क‍ि संघ बहुत अच्‍छा है, यह बस यही कह रहा है कि संघ ने क्‍या काम किया है। संघ ने कोविड के समय में क्‍या काम किया, विभाजन के समय सिंधी हिंदू जो पाकिस्‍तान से भारत आए, उनके साथ जब दुर्व्‍यवहार हो रहा था तब आरएसएस ने किस तरह से मदद की थी।

सवाल- किताब में अलग-अलग धार्मिक और सामाजिक पृष्ठभूमि को लेकर लोगों की आवाज शामिल है। इन विविध अनुभवों से आरएसएस भारतीय समाज के बारे में आपकी अपनी समझ में क्‍या बदलाव आया है?

जवाब- इसमें एक बड़ा बदलाव आया है, और संघ के काम का दायरा इतना व्यापक है कि मुझे लगता है कि इसकी गहराई को पूरी तरह समझने के लिए एक जीवन काफी नहीं है। पिछले 100 वर्षों में, इसने हर क्षेत्र में अपनी छाप छोड़ी है, चाहे वह शिक्षा हो, राहत कार्य हो, संस्कृति का संरक्षण हो, आदिवासी समुदायों के साथ काम करना हो या सामाजिक समरसता को बढ़ावा देना हो। आज, कई प्रमुख संगठन संघ से प्रेरित हैं। मेरी धारणा निरंतर बदल रही है। हर दिन मुझे लगता है कि ये भी संगठन ने किया है।

सवाल- आज युवाओं के सामने बेरोजगारी, परीक्षा संबंधी विवाद और राजनीतिक असंतोष जैसे मुद्दे हैं। क्‍या आपको लगता है कि सामाजिक संगठनों को उतनी ही सक्रियता से काम करना चाहिए, जितनी सांस्‍कृतिक और वैचारिक मुद्दों पर करते हैं?

जवाब- दुनिया का सबसे बड़ा छात्र संगठन, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी), संघ से प्रेरित है। 1947 से ही इसने पेपर लीक जैसे मुद्दों का पुरजोर विरोध किया है और छात्रों को न्याय दिलाने के लिए आंदोलनों का नेतृत्व किया है। इसके अलावा, कोविड के दौरान जब सेक्स वर्कर और ट्रांसजेंडर समुदाय के लोग बिना किसी आय या सामाजिक सुरक्षा के रह गए थे, तब आरएसएस सबसे पहले आगे आया और उन्हें राहत पहुंचाई। गुजरात भूकंप के समय, सरकारी मदद पहुंचने से पहले ही आरएसएस के स्वयंसेवक मौके पर पहुंच गए थे। आरएसएस इस सिद्धांत पर काम करता है कि अपने काम के बारे में बात करने में जो समय खर्च होगा, उसका इस्तेमाल दो और काम पूरे करने में किया जा सकता है।

सवाल- कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) जैसे युवा राजनीतिक समूहों के विरोध प्रदर्शन और विपक्ष की सक्रियता के संदर्भ में क्‍या आपको लगता है कि आज की युवा पीढ़ी संगठनों की विचारधारा से नहीं, बल्कि ठोस जवाबदेही चाहती हैं?

जवाब- कॉकरोच जनता पार्टी द्वारा आयोजित विरोध प्रदर्शन में लगभग 3,000 से 4,000, या शायद 10,000 युवाओं ने हिस्सा लिया है। भारत की युवा आबादी लगभग 30 से 40 करोड़ के बीच है। मैं खुद 27 साल की हूं, जहां से 'जेनजी' की शुरुआत होती है। इन विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व करने वाले लोग असल में 'जेनजी' नहीं हैं। वे 30 साल से अधिक उम्र के हैं या 29 साल के हैं, इसलिए तकनीकी रूप से वे 'जेनजी' की श्रेणी में नहीं आते। मैं 'जेनजी' हूं, और मेरा मानना ​​है कि भारत के असली युवा यानी वास्तविक 'जेनजी' रचनात्मक कार्यों में सक्रिय रूप से लगे हुए हैं। वे राष्ट्र-निर्माण, सकारात्मक पहलों और प्रभावशाली प्रयासों में जुटे हैं। उदाहरण के लिए, स्काईरूट ने भारत का पहला निजी तौर पर निर्मित अंतरिक्ष यान लॉन्च किया। भारत के युवा इसी तरह के कामों में लगे हुए हैं। दुर्भाग्य से, नकारात्मक खबरों को कहीं ज्यादा कवरेज, ध्यान और व्यूज मिलते हैं, क्योंकि इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के एल्गोरिदम गुस्से और आक्रोश के माहौल को और बढ़ावा देते हैं। यह दुखद है कि देश को अगले 100 या 1,000 वर्षों के लिए तैयार करने की दिशा में युवा भारतीयों और युवा स्वयंसेवकों द्वारा किए जा रहे सकारात्मक कार्यों के बजाय, इस तरह की चर्चाओं को ज्यादा तवज्जो दी जाती है।

सवाल- विदेश में अपने अनुभवों के आधार पर भारत और आरएसएस के बारे में अंतरराष्‍ट्रीय चर्चाओं में कौन से पहलू ज्‍यादा गहराई से समझाए जाने की जरूरत महसूस होती है?

जवाब- मुझे लगता है कि संघ के मूल में 'सेवा भाव' और निस्वार्थ सेवा है, उसे हर किसी को समझना चाहिए। अक्सर आरएसएस को एक राजनीतिक नजरिए से देखा जाता है, लेकिन असल में यह सेवा पर आधारित एक संगठन है, जहां सेवा ही सबसे बड़ा कर्तव्य है। इसे समझे बिना, कोई भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को सही मायने में नहीं समझ सकता। इस किताब में सिर्फ मेरा नजरिया नहीं है; बल्कि भारतीय अध्ययन से जुड़े अंतरराष्ट्रीय शिक्षाविदों ने अपने शोध के आधार पर आरएसएस के बारे में लिखा है, जिनमें ब्रिटिश, इजरायली और जर्मन विद्वान, और साथ ही जर्मनी के एक सांसद भी शामिल हैं। उनके विचार इस संगठन के असली विजन को बेहतर ढंग से समझने में मदद करते हैं। विदेशों में पढ़ाई और काम करने के अनुभव के आधार पर, मेरा मानना ​​है कि आरएसएस को लेकर बहुत गलतफहमियां हैं और इसे लगभग पूरी तरह से एक राजनीतिक नजरिए से देखा जाता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि भाजपा, जो संघ से प्रेरित पार्टी है, अभी सत्ता में है। हालांकि, आरएसएस का अस्तित्व उससे बहुत पहले से है, और इसकी जड़ें हमेशा से सेवा में ही रही हैं।

सवाल- आरएसएस अपनी शताब्‍दी वर्ष मना रहा है, वहीं सीजेपी जैसे राजनीतिक संगठन विरोध के जरिए व्‍यवस्‍था पर सवाल उठा रहे हैं। आज के भारत में युवाओं के वैचारिक टकराव की सबसे बड़ी वजह क्‍या है?

जवाब- एक युवा भारतीय के तौर पर, जो कुछ समय से सीजेपी के विरोध-प्रदर्शनों पर नजर रख रही है, मैंने उनके नेतृत्व के कई बयान पढ़े हैं। इनमें से एक बयान जिसने मेरा ध्यान खींचा, वह था 'सौ जंतर-मंतर खिलने दो'। यह माओ जेंडोंग के चीन में दिए गए नारे 'सौ फूल खिलने दो' (लेट अ हंड्रेड फ्लावर्स ब्लूम) का ही एक रूप है। उस आंदोलन के बाद 'सांस्कृतिक क्रांति' (कल्चरल रेवोल्यूशन) और 'ग्रेट लीप फॉरवर्ड' जैसी घटनाएं हुईं, जिनमें लाखों लोगों की जान चली गई। मेरा मानना ​​है कि जो विचारधाराएं बेहतर कल का वादा करके आज अराजकता फैलाना चाहती हैं, वे मूल रूप से अलोकतांत्रिक हैं। हमने बांग्लादेश, नेपाल और फ्रांस में भी इसी तरह के अलोकतांत्रिक बदलाव और तख्तापलट देखे हैं। लेकिन, भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और यहां ऐसी विचारधाराओं के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए, जिन्होंने दुनिया भर में केवल तबाही ही मचाई है।

सवाल- अगले 100 वर्षों के भारत की कल्‍पना करते हुए आरएसएस और देश के युवाओं के बीच किस तरह का संवाद देखना चाहती हैं, विशेषकर उन नौजवानों के साथ जो संघ की विचारधारा से सहमत नहीं हैं?

जवाब- संघ का काम पीढ़ियों तक चलने वाला है। यही एक कारण है कि इस किताब का शीर्षक '100 ईयर्स यंग' रखा गया है क्योंकि 100 सालों में ज्‍यादा से ज्‍यादा चार पीढ़ियां ही गुजरती हैं। यह पीढ़ियों तक चलने वाला, राष्ट्र-निर्माण का एक प्रयास है। इस प्रक्रिया में, मुझे लगता है कि लगातार बातचीत होना बहुत जरूरी है, लेकिन दोनों पक्षों को धैर्य के साथ बातचीत की मेज पर आना होगा। दुर्भाग्य से, आज दूसरे पक्ष की ओर से ऐसा धैर्य देखने को नहीं मिलता। मुझे उम्मीद है कि यह नजरिया चाहे वह मौजूदा सीजेपी विरोध प्रदर्शनों के संदर्भ में हो, जो रचनात्मक बातचीत के बजाय सड़कों पर अशांति की ओर ज्‍यादा झुके हुए हैं- एक सार्थक संवाद में बदल सकता है। जैसा कि इस किताब में दिखाया गया है, कई ऐसे विचार जिन्हें आमतौर पर आरएसएस के अनुकूल नहीं माना जाता, उन पर भी खुली चर्चा हो सकती है। अलग-अलग विचारों वाले लोगों का आरएसएस के साथ बातचीत करने के लिए स्वागत है। आरएसएस ने हमेशा से ही ऐसा खुला नजरिया रखा है। मुझे उम्मीद है कि रचनात्मक बहस और नेक नीयत से की जाने वाली चर्चा की भावना वापस आएगी, क्योंकि इसी से कोई देश तरक्की करता है। लोगों के विचार अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन जब तक दोनों पक्ष राष्ट्र का भला चाहते हैं, तब तक वे एक साथ बैठकर बातचीत कर सकते हैं, एक-दूसरे से सीख सकते हैं और सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं। आरएसएस ने समय के साथ लगातार सीखा है और खुद को विकसित किया है। आज का आरएसएस 1925 के आरएसएस से काफी अलग है, क्योंकि यह समय के साथ खुद को ढालता है और हमेशा बातचीत के लिए तैयार रहता है। संघ खुद का प्रचार करने से बचता है, क्योंकि इनका मानना ​​है कि काम खुद अपनी कहानी कहता है। दुर्भाग्य से, 21वीं सदी में, जन-धारणाओं के मामले में यह निस्वार्थ दृष्टिकोण उनके खिलाफ ही चला जाता है। मेरी विनम्र अपील है कि लोग आरएसएस के वास्तविक कार्यों को समझे बिना उनके बारे में कोई राय न बनाएं। पिछले 100 वर्षों में समाज के हर वर्ग के लिए उनके योगदान के बारे में पढ़ें और फिर कोई राय बनाएं।

--आईएएनएस

एएसएच/एबीएम