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वायु प्रदूषण पर 13 हजार करोड़ खर्च, फिर भी 190 शहरों में PM10 मानक से ज्यादा; रिपोर्ट में चौंकाने वाले आंकड़े

 

देश में वायु प्रदूषण कम करने के लिए वर्ष 2019 से अब तक 13 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की राशि जारी की गई, लेकिन इसके बावजूद प्रदूषण की समस्या गंभीर बनी हुई है। अर्थ5आर की ‘इंडिया एयर पॉल्यूशन 2026’ रिपोर्ट के मुताबिक, खर्च की गई रकम का करीब 68 प्रतिशत हिस्सा सड़कों की धूल कम करने पर लगाया गया। वहीं, प्रदूषण की निगरानी और उसके प्रमुख स्रोतों की पहचान में कई कमियां सामने आई हैं।

रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025 में देश के 229 शहरों में से 190 शहरों में पीएम10 का स्तर निर्धारित मानकों से अधिक दर्ज किया गया। इससे साफ होता है कि वायु प्रदूषण देश के बड़े हिस्से में सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए चुनौती बना हुआ है।

प्रदूषण से जुड़ी मौतों में 43 प्रतिशत की बढ़ोतरी

रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2023 में भारत में वायु प्रदूषण से जुड़े कारणों के चलते करीब 20 लाख लोगों की मौत होने का अनुमान सामने आया। यह संख्या वर्ष 2000 के मुकाबले 43 प्रतिशत अधिक बताई गई है।

वायु प्रदूषण का स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ सकता है। हवा में मौजूद सूक्ष्म कण और अन्य प्रदूषक सांस संबंधी बीमारियों के साथ हृदय और फेफड़ों से जुड़ी समस्याओं का खतरा बढ़ा सकते हैं। रिपोर्ट में बताए गए मौतों के आंकड़े प्रदूषण से जुड़े स्वास्थ्य प्रभावों की गंभीरता को रेखांकित करते हैं।

सड़कों की धूल पर खर्च हुआ 68 प्रतिशत पैसा

रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2019 से अब तक वायु प्रदूषण नियंत्रण के लिए 13 हजार करोड़ रुपये से अधिक की राशि जारी की गई। इसमें खर्च की गई रकम का लगभग 68 प्रतिशत हिस्सा सड़कों की धूल को नियंत्रित करने पर लगाया गया।

सड़कों की धूल पीएम10 प्रदूषण का एक महत्वपूर्ण स्रोत हो सकती है। हालांकि, वायु प्रदूषण के दूसरे कारणों में वाहनों से निकलने वाला धुआं, औद्योगिक उत्सर्जन, निर्माण कार्य और अन्य गतिविधियां भी शामिल हैं। ऐसे में प्रदूषण कम करने के लिए अलग-अलग स्रोतों की पहचान कर उनके अनुसार उपाय करना जरूरी है।

प्रदूषण मापने के लिए पर्याप्त निगरानी व्यवस्था नहीं

रिपोर्ट में वायु गुणवत्ता की निगरानी से जुड़ी कमियों की ओर भी ध्यान दिलाया गया है। वर्ष 2025 में देश में वायु गुणवत्ता जांचने के लिए कुल 1,600 स्टेशन बताए गए। इनमें 565 लगातार निगरानी करने वाले और 1,035 मैनुअल जांच वाले स्टेशन शामिल थे।

इसके बावजूद राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम के तहत आने वाले 130 शहरों में से 28 शहर ऐसे थे, जहां लगातार वायु प्रदूषण मापने वाला एक भी स्टेशन नहीं था। वहीं, 40 शहरों में प्रदूषण के स्रोतों और अलग-अलग कारणों से होने वाले प्रदूषण का आकलन भी पूरा नहीं हुआ था।

प्रदूषण के स्रोतों की सही जानकारी के बिना यह तय करना मुश्किल हो सकता है कि किसी शहर में प्रदूषण कम करने के लिए किस उपाय पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है।

गंगा के मैदानी इलाकों और दिल्ली-एनसीआर में स्थिति गंभीर

रिपोर्ट के अनुसार, गंगा के मैदानी इलाकों के 61 शहरों में से 60 शहरों में प्रदूषण का स्तर निर्धारित मानकों से अधिक रहा। वहीं, दिल्ली-एनसीआर के सभी 14 शहरों में पीएम10 का स्तर तय सीमा से ज्यादा दर्ज किया गया।

पीएम10 ऐसे कण होते हैं जिनका व्यास 10 माइक्रोमीटर या उससे कम होता है। ये हवा के साथ सांस के जरिए शरीर में प्रवेश कर सकते हैं और स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकते हैं।

रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि प्रदूषण नियंत्रण के लिए जारी धनराशि के साथ-साथ उसके प्रभावी इस्तेमाल, नियमित निगरानी और प्रदूषण के स्रोतों की पहचान पर भी ध्यान देना जरूरी है। शहरों की जरूरत के अनुसार योजनाएं लागू करना और उनके नतीजों का आकलन करना वायु गुणवत्ता में सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं।