रानी दुर्गावती : गोंडवाना की वीरांगना, जिन्होंने मुगलों के सामने नहीं झुकाया सिर
नई दिल्ली, 23 जून (आईएएनएस)। भारतीय इतिहास वीरता, साहस और बलिदान की अनगिनत गाथाओं से भरा पड़ा है। इन्हीं महान वीरांगनाओं में रानी दुर्गावती (5 अक्टूबर 1524 - 24 जून 1564) का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। गोंडवाना राज्य की पराक्रमी शासिका रानी दुर्गावती ने अपने अदम्य साहस, कुशल नेतृत्व और मातृभूमि के प्रति समर्पण का अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत किया। मुगल साम्राज्य की विशाल सेना के सामने भी उन्होंने कभी आत्मसमर्पण नहीं किया और अंतिम क्षण तक अपने राज्य की रक्षा के लिए संघर्ष करती रहीं।
रानी दुर्गावती का जन्म 5 अक्टूबर 1524 को चंदेल राजवंश के कालिंजर किले (वर्तमान बांदा जिला, उत्तर प्रदेश) में हुआ था। वह कालिंजर के राजा कीर्तिसिंह चंदेल की एकमात्र संतान थीं। दुर्गाष्टमी के दिन जन्म होने के कारण उनका नाम दुर्गावती रखा गया। बचपन से ही उन्हें घुड़सवारी, शस्त्र-विद्या और युद्धकला का प्रशिक्षण मिला, जिससे उनमें साहस, आत्मविश्वास और नेतृत्व क्षमता का विकास हुआ।
रानी दुर्गावती का विवाह वर्ष 1542 में गोंड साम्राज्य के राजा संग्राम शाह के ज्येष्ठ पुत्र दलपत शाह से हुआ था। संग्राम शाह गढ़ा-मंडला राज्य के शासक थे, जिसका क्षेत्र वर्तमान मध्य प्रदेश के जबलपुर, मंडला, नरसिंहपुर, दमोह और आसपास के इलाकों तक फैला हुआ था।
वर्ष 1545 में रानी दुर्गावती ने पुत्र वीर नारायण को जन्म दिया। विवाह के कुछ वर्षों बाद ही दलपत शाह का निधन हो गया। उस समय वीर नारायण अल्पायु थे। ऐसे में रानी दुर्गावती ने संरक्षक शासक के रूप में राज्य की बागडोर संभाली। उनके शासनकाल में कृषि, जल प्रबंधन, प्रशासन और जनकल्याण के क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य हुए, जिससे गोंडवाना राज्य समृद्ध हुआ।
16वीं शताब्दी में मुगल सम्राट अकबर अपने साम्राज्य का विस्तार कर रहा था। इसी क्रम में 1564 में मुगल सेनापति आसफ खान ने गोंडवाना पर आक्रमण किया। रानी दुर्गावती ने सीमित संसाधनों और कम सैन्य बल के बावजूद मुगल सेना का डटकर मुकाबला किया। उन्होंने जबलपुर के निकट नरई क्षेत्र में मोर्चा संभाला और स्वयं युद्ध का नेतृत्व किया।
युद्ध के दौरान रानी दुर्गावती गंभीर रूप से घायल हो गईं। बताया जाता है कि उन्हें कई तीर लगे, लेकिन उन्होंने युद्धभूमि नहीं छोड़ी। जब उन्हें यह आभास हुआ कि शत्रु के हाथों बंदी बनने की स्थिति उत्पन्न हो सकती है, तब उन्होंने आत्मसम्मान और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए स्वयं अपने प्राणों का बलिदान देना उचित समझा।
24 जून 1564 को रानी दुर्गावती वीरगति को प्राप्त हुईं। उन्होंने लगभग 16 वर्षों तक गोंडवाना राज्य का नेतृत्व किया और अपने साहस, स्वाभिमान तथा बलिदान के कारण भारतीय इतिहास में अमर हो गईं। आज भी उन्हें देश की महान वीरांगनाओं में गिना जाता है और उनका जीवन साहस तथा राष्ट्रप्रेम की प्रेरणा देता है।
--आईएएनएस
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