रंगभरी एकादशी : काशी में उड़े अबीर-गुलाल, डमरू की गूंज के बीच खेली गई मसान होली
वाराणसी, 27 फरवरी (आईएएनएस)। देशभर में रंगभरी एकादशी के मौके पर मंदिरों में देवी-देवताओं को गुलाल अर्पित किया गया। अवध में रंगभरी एकादशी से होली का आगाज हो चुका है, और पंचकोसी परिक्रमा कर हर मंदिर में होली का न्योता दिया जा रहा है।
होली के पावन पर्व से काशी कैसे अछूता रह सकता है? अब काशी में रंगभरी एकादशी के मौके पर गुलाब और भस्म दोनों से शिव भक्त होली का जश्न मना रहे हैं।
रंगभरी एकादशी के अवसर पर हरिश्चंद्र घाट पर चिता की राख से होली खेली जा रही है, जिसे देखने के लिए भारी भीड़ उमड़ी है। हजारों श्रद्धालु जलती हुई चिताओं पर पवित्र राख चढ़ा रहे हैं और चारों ओर 'हर हर महादेव' के जयकारे गूंज रहे हैं। यह मनमोहक दृश्य भक्तों की गहरी आस्था और भक्ति को दर्शा रहा है।
एक भक्त ने आईएएनएस से बातचीत में बताया कि मां की पालकी हरिश्चंद्र घाट पर पूरे जुलूस के साथ आती है और घाटों पर इकट्ठा हुए भक्त राख से होली खेलते हैं। यह होली मृत्यु के डर को मिटाती है क्योंकि मृत्यु अटल सत्य है और शिव तक पहुंचने का रास्ता भी है।
उन्होंने आगे कहा कि चिता की होली खेलने के लिए सिर्फ काशी से भक्त नहीं आते, बल्कि हर दिशा से भक्तों का आगमन होता है, जो भगवान शिव को अपना आराध्य मानते हैं।
दिल्ली से पहुंचे एक भक्त ने बताया कि वे खास तौर पर मसान की होली खेलने के लिए आए हैं और विश्व प्रसिद्ध मणिकर्णिका घाट पर होने वाली मसान की होली को देखने के बाद ही लौटेंगे। श्रद्धालु ने आगे बताया कि मसान की होली बाकी सभी होली से अलग है क्योंकि यह आपको बाबा के करीब लेकर जाती है।
काशी के ही स्थानीय श्रद्दालु के मुताबिक मसान की होली की परंपरा सदियों से चली आई है। इसकी शुरुआत खुद महादेव ने की थी। उस समय से भक्त बाबा के रंग में रंगने के लिए मसान की होली खेलते हैं और उनके रंग में डूब जाते हैं।
बता दें कि रंगभरी एकादशी के एक दिन बाद काशी के मणिकर्णिका घाट पर मसान की होली खेली जाती है। इस होली में घाटों पर चिता की राख एक दूसरे को लगाई जाती है। यह होली सामान्य जनों के लिए नहीं है, बल्कि नागा साधु और संतों के लिए होती है, लेकिन आज के समय में हर भक्त मसान की होली खेलता है।
--आईएएनएस
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