राम मंदिर में सीईओ की नियुक्ति को लेकर संत समाज में नाराजगी, आंदोलन की चेतावनी
अयोध्या, 12 अगस्त (आईएएनएस)। अयोध्या स्थित श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) की नियुक्ति को लेकर संत समाज में नाराजगी देखने को मिल रही है। संतों ने प्रस्तावित सीईओ पद को अयोध्या की पारंपरिक मंदिर व्यवस्था के विपरीत बताते हुए इसे राम मंदिर के कथित सरकारीकरण की दिशा में उठाया गया कदम बताया है। संत समाज का कहना है कि राम मंदिर का संचालन किसी कॉरपोरेट कंपनी या औद्योगिक संस्थान की तरह नहीं, बल्कि अयोध्या की सदियों पुरानी धार्मिक और परंपरागत व्यवस्था के अनुरूप होना चाहिए।
संतों ने राम मंदिर ट्रस्ट और सरकार से सीईओ की नियुक्ति की प्रक्रिया पर पुनर्विचार करने की मांग की है। साथ ही, चेतावनी दी है कि यदि इस नियुक्ति को आगे बढ़ाया गया तो संत समाज व्यापक आंदोलन का रास्ता अपना सकता है।
हनुमानगढ़ी के पुजारी देवेशाचार्य ने सीईओ की नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि जिस तरह से सीईओ पद के लिए आवेदन मंगाए गए और अब इंटरव्यू की प्रक्रिया शुरू होने की बात सामने आ रही है, उससे ऐसा प्रतीत होता है जैसे किसी बड़ी कंपनी, एजेंसी या फैक्ट्री में सीईओ की नियुक्ति की जा रही हो। उन्होंने सवाल उठाया कि जब मंदिर के संचालन के लिए ट्रस्ट का गठन किया गया है, तो फिर सीईओ की आवश्यकता क्यों महसूस की जा रही है। ट्रस्ट का उद्देश्य ही किसी धार्मिक संस्थान की व्यवस्था को सुचारू और व्यवस्थित तरीके से संचालित करना है। ऐसे में सीईओ की नियुक्ति से यह सवाल उठता है कि क्या मौजूदा ट्रस्ट व्यवस्था को लेकर कोई समस्या है।
उन्होंने कहा कि राम मंदिर के लिए धार्मिक समिति का भी गठन किया गया है, जिसमें अयोध्या के वरिष्ठ संतों को शामिल किया गया है। ऐसे में सीईओ की नियुक्ति के औचित्य को लेकर संत समाज में असमंजस है। राम मंदिर को कॉरपोरेट सिस्टम के तहत चलाने के बजाय अयोध्या की पारंपरिक धार्मिक व्यवस्था के अनुरूप संचालित किया जाना चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि जिस विश्व हिंदू परिषद ने संतों के साथ मिलकर देश के मठ-मंदिरों को सरकारी तंत्र से मुक्त कराने की बात कही थी, उसी से जुड़े लोगों द्वारा राम मंदिर में सीईओ की नियुक्ति की प्रक्रिया आगे बढ़ना विरोधाभासी है। मंदिर की व्यवस्थाओं में ट्रस्ट, धार्मिक समिति और अन्य पारंपरिक पदों की मौजूदगी के बावजूद सीईओ पद की आवश्यकता समझ से परे है।
महंत सीताराम दास ने भी सीईओ पद को लेकर कड़ा विरोध जताया। उन्होंने आरोप लगाया कि राम जन्मभूमि मंदिर में सीईओ की नियुक्ति के जरिए पिछले दरवाजे से सरकारीकरण की कोशिश की जा रही है। संत समाज इस प्रयास को सफल नहीं होने देगा। यदि मंदिर की व्यवस्थाओं को मजबूत करने के लिए किसी पद की आवश्यकता है तो वैष्णव परंपरा से जुड़े, निष्ठावान और भक्ति भाव से समर्पित संत को प्रधान सेवक या धर्माधिकारी की जिम्मेदारी दी जानी चाहिए। मंदिर संचालन में सरकारी तंत्र के बजाय धार्मिक परंपरा और संत समाज की भूमिका प्रमुख होनी चाहिए।
उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि यदि सीईओ की नियुक्ति के माध्यम से मंदिर के सरकारीकरण की दिशा में कदम बढ़ाया गया तो संत समाज मुखर होकर आंदोलन करेगा। उन्होंने सरकार और ट्रस्ट के पदाधिकारियों को चुनौती देते हुए कहा कि संत समाज इस मुद्दे पर पीछे हटने वाला नहीं है।
महंत वरुण दास ने भी सीईओ की नियुक्ति को अयोध्या की परंपरा के विपरीत बताया। उन्होंने कहा कि अयोध्या के मठ-मंदिरों की अपनी पारंपरिक व्यवस्था रही है और उसी व्यवस्था के अनुरूप राम जन्मभूमि मंदिर का संचालन होना चाहिए। अयोध्या की पारंपरिक धार्मिक व्यवस्था में धर्माधिकारी, अधिकारी, पुजारी, भंडारी, कोठारी और महंत जैसे पदों के माध्यम से मंदिरों का संचालन होता आया है। यदि राम मंदिर में प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर किसी पद की आवश्यकता महसूस होती है, तो सीईओ के बजाय धर्माधिकारी की नियुक्ति की जा सकती है।
महंत वरुण दास ने आशंका जताई कि यदि आज सीईओ की नियुक्ति होती है तो भविष्य में इसी व्यवस्था के माध्यम से राम जन्मभूमि मंदिर के सरकारीकरण की दिशा में कदम आगे बढ़ सकता है। उन्होंने कहा कि संत समाज पहले से ही मंदिरों के सरकारीकरण का विरोध करता रहा है और राम जन्मभूमि के मामले में भी इस तरह की किसी व्यवस्था को स्वीकार नहीं किया जाएगा।
--आईएएनएस
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