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पीएम मोदी ने शेयर किया गीता का श्लोक, बताया- स्वाभाविक कर्मों में तत्परता से मिलती है परम सिद्धि

 

नई दिल्ली, 30 सितंबर (आईएएनएस)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को एक सुभाषित संदेश शेयर किया। उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 18 (मोक्षसंन्यासयोग) के श्लोक 45 का जिक्र किया और उसका अर्थ समझाया।

पीएम मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर "स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु।।" शेयर किया। उन्होंने इसका अर्थ समझाते हुए बताया, "जो मनुष्य अपने-अपने स्वाभाविक कर्मों में तत्पर रहते हैं, वे परम सिद्धि को प्राप्त करते हैं। इसलिए अपने कर्मों में लगे मनुष्यों को यह अवश्य सुनना और जानना चाहिए कि अपने कर्मों का पालन करते हुए परम सिद्धि किस प्रकार प्राप्त की जाती है।"

प्रधानमंत्री मोदी अक्सर अपने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए विभिन्न ग्रंथों के श्लोकों और उनके जीवन में महत्व को साझा करते रहते हैं। उनका यह पोस्ट भी कर्मयोग के महत्व को रेखांकित करता है।

इस श्लोक का संदेश बेहद व्यापक और जीवन के लिए प्रेरणादायक है। स्व-धर्म हमारे गुणों और हमारे जीवन की अवस्थाओं पर आधारित होते हैं। इन्हें सम्पन्न करना यह सिद्ध करता है कि हम अपने शरीर और मन की योग्यताओं का उपयोग रचनात्मक ढंग से करते हैं।

यह आध्यात्मिक विकास की ओर ले जाता है और समाज एवं आत्मा के लिए लाभदायक होता है। चूंकि हमारे कर्तव्य हमारे स्वभाव के अनुरूप होते हैं, इसलिए इनका निर्वहन करने में हम स्वयं को सहज अनुभव करते हैं।

गीता के इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि हर व्यक्ति का अपना स्वभाव और अपनी प्रकृति के अनुसार कर्म निर्धारित है। अगर व्यक्ति अपने उसी स्वाभाविक कर्म को पूरी निष्ठा और तत्परता से करता है, तो वही उसकी सिद्धि का मार्ग बन जाता है। उसे किसी दूसरे के कर्म की नकल करने की जरूरत नहीं है।

उदाहरण के तौर पर एक शिक्षक का धर्म पढ़ाना है, एक सैनिक का धर्म देश की रक्षा करना है और एक किसान का धर्म खेती करना है। अगर सभी अपने-अपने कर्म को ईमानदारी से करें, तो समाज में संतुलन बना रहता है और व्यक्ति को भी आत्मिक संतुष्टि मिलती है।

इस श्लोक में एक और महत्वपूर्ण बात कही गई है - जब हमारी क्षमता बढ़ती है तब स्व-धर्म भी परिवर्तित हो जाता है और हम अगली कक्षा में प्रवेश करते हैं। इस प्रकार से हम अपने उत्तरदायित्व का निष्ठापूर्वक निर्वहन कर उन्नति की ओर अग्रसर होते हैं।

--आईएएनएस

एससीएच/एएस