पीएम मोदी की विदेश नीति का मूल 'शांति' है, पेजेश्कियन से मुलाकात में दिया बड़ा संदेश : पूर्व एमओएस एमजे अकबर
नई दिल्ली, 1 सितंबर (आईएएनएस)। किर्गिस्तान में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) समिट के दौरान भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन से मुलाकात हुई। अटकलें लगाई जा रही है कि दोनों नेताओं के बीच चाबहार पोर्ट को लेकर भी चर्चा हुई। इसे विदेश मामलों के पूर्व राज्यमंत्री एमजे अकबर ने भारत की शांति-केंद्रित विदेश नीति का बड़ा संकेत बताया।
एमजे अकबर ने कहा, "किर्गिस्तान में प्रधानमंत्री मोदी के एजेंडा में सबसे जरूरी ईरानी राष्ट्रपति के साथ उनकी पहली मीटिंग थी। इस मीटिंग से उन्होंने एक बहुत मजबूत संदेश दिया क्योंकि मुलाकात खुद मक्का पैक्ट के बैकग्राउंड में थी और इसने असल में यह संदेश दिया कि समस्याओं का हल युद्ध और गठबंधन नहीं हैं। समस्याओं का हल बातचीत में है। प्रधानमंत्री मोदी ने इसे अपनी नीति का मुख्य हिस्सा माना है, जो शांति है।"
उन्होंने कहा कि ईरान और भारत ने एक नया तालमेल खोजने के लिए, कूटनीति में जिसे 'लचीला यथार्थवाद' कहा जाता है, उसका इस्तेमाल किया है। बातचीत का एक बहुत महत्वपूर्ण तत्व व्यापार पर चर्चा थी और इसे अमेरिका के ईरान पर 'बाह्य प्रतिबंध' और टैरिफ लगाने के प्रयास के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए। दोनों ने चर्चा की और प्रधानमंत्री ने जोर दिया कि जहाजों की आवाजाही के लिए होर्मुज स्ट्रेट को सुरक्षित रखना बहुत महत्वपूर्ण है।
एमजे अकबर ने कहा कि मेरे विचार में, सबसे महत्वपूर्ण द्विपक्षीय तत्व चाबहार बंदरगाह पर चर्चा थी। चाबहार बंदरगाह, वर्तमान संकट में अत्यंत महत्वपूर्ण हो गया है। यह बंदरगाह लंबे समय से भारत-ईरान एजेंडे का हिस्सा रहा है, लेकिन वास्तव में प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल के पहले पांच वर्षों में यह साकार हुआ। चाबहार पोर्ट को लेकर फिर से चर्चा होना दोनों देशों के लिए अत्यंत अच्छी खबर है। भारत और ईरान सभ्यताओं के आधार पर बने राष्ट्र हैं, जो समझते हैं कि वे जो द्विपक्षीय संबंध बना सकते हैं, वे युद्ध के लिए बनाए गए पैक्ट से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं।
चीन को लेकर एमजे अकबर ने कहा, "हमारे एनएसए अजीत डोभाल की चीन की यात्रा का भारत-चीन समीकरणों के साथ-साथ इन दो देशों, इन दो पड़ोसियों के बीच सबसे महत्वपूर्ण कठिनाई, जिसे सीमा प्रबंधन कहा जा सकता है, पर भी असाधारण रूप से सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। सीमा प्रबंधन पिछले पांच दशकों से अधिक समय से हमारी समस्या का स्रोत रहा है। 1962 का युद्ध स्वयं ही एक बहुत बड़ी रेखा था।
उन्होंने कहा कि इससे पहले हमारे संबंध मोटे तौर पर सौहार्दपूर्ण थे और तब से सीमा हमारे दोनों सेनाओं के साथ-साथ हमारे राजनयिकों और हमारी विदेश नीतियों के लिए संघर्ष और चुनौती दोनों का बिंदु रही है। मोटे तौर पर 1988 में सीमा पर हुई सहमति बनी हुई है, जिसमें दोनों पक्षों ने एक बहुत ही मौलिक समझ विकसित की कि समाधान 'समाधान न करने' में है। इसका मतलब है कि आप वास्तविकता को वैसे ही स्वीकार करते हैं, जैसी वह है और फिर सहयोग के अन्य तरीके और अन्य रास्ते खोजते हैं।
पूर्व एमओएस ने कहा कि यह एक ऐसा संदेश है जिसे डोभाल की यात्रा ने मजबूत किया है। इसके पर्याप्त सबूत हैं कि चीन ने यह समझा है कि चीनी व्यवस्था के भीतर के 'हॉक', चीनी सेना के भीतर के 'हॉक' भारत के साथ अच्छे संबंधों के लिए अनुकूल नहीं हैं। ऐसी अटकलें हैं कि चीनी सेना के सर्वोच्च कमान में एक बहुत प्रमुख सैन्य 'हॉक' को हाल ही में अचानक हटा दिया गया है। हम इसकी पूरी सच्चाई नहीं जानते क्योंकि चीनी व्यवस्था अपारदर्शी बनी हुई है। लेकिन, हम यह जानते हैं कि राष्ट्रपति शी जल्द ही दिल्ली आएंगे।
उन्होंने आगे कहा कि ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए और दोनों पक्ष यह सुनिश्चित करने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे हैं कि यह यात्रा, हालांकि ब्रिक्स के बैनर तले होगी, लेकिन इसमें एक बहुत मजबूत द्विपक्षीय तत्व होगा कि यह बातचीत और यह बैठक, प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति शी के बीच एक सार्थक बैठक, मौजूदा अशांति को समाप्त करेगी और निकट भविष्य में सहयोग का मार्ग प्रशस्त करेगी।
--आईएएनएस
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