पुनपुन घाट :'पितृ तीर्थ' गया से पहले पिंडदान करने का स्थान और 'मोक्ष का प्रथम द्वार'
नई दिल्ली, 26 सितंबर (आईएएनएस)। पितृपक्ष हिन्दू पंचांग के अनुसार भाद्रपद पूर्णिमा से शुरू होकर आश्विन मास की अमावस्या (सर्वपितृ अमावस्या) तक चलने वाला 16 दिनों का विशेष पक्ष है। इस अवधि में लोग अपने दिवंगत माता-पिता, दादा-दादी और अन्य पूर्वजों की शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करते हैं। मान्यता है कि इन दिनों पितरों का स्मरण और उनके नाम से दान-पुण्य करने से उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है।
पितृपक्ष को पूर्वजों के तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान के लिए सबसे पवित्र समय माना जाता है। इस दौरान देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु बिहार के गयाजी धाम पहुंचते हैं और अपने पितरों के लिए पिंडदान करते हैं। पिंडदान के लिए गयाजी को विशेष महत्व दिया गया है।
धार्मिक ग्रंथों जैसे गरुड़ पुराण, विष्णु पुराण और वायु पुराण में गयाजी को पितृ कर्मों के लिए सर्वोच्च तीर्थ बताया गया है। मान्यता है कि गयाजी में विधि-विधान से पिंडदान करने पर पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है और उन्हें जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिलती है।
पौराणिक कथा के अनुसार, गयासुर नामक तपस्वी असुर के शरीर पर भगवान विष्णु ने अपने चरण रखे थे। जिस स्थान पर भगवान विष्णु का पदचिह्न माना जाता है, वहीं आज प्रसिद्ध विष्णुपद मंदिर स्थित है। माना जाता है कि गयासुर के वरदान के कारण यहां किए गए पिंडदान से पूर्वजों की आत्मा को शांति और मोक्ष प्राप्त होता है।
विष्णुपद मंदिर, गयाजी में फल्गु नदी के तट पर एक प्रसिद्ध और प्राचीन हिंदू मंदिर है। यह भगवान विष्णु को समर्पित है। इस मंदिर में भगवान विष्णु के लगभग 40 सेंटीमीटर लंबे पवित्र चरण चिह्न आज भी मौजूद हैं, जिसमें शंख, चक्र और गदा जैसे नौ प्रतीक बने हैं। यह स्थान पितरों के मोक्ष और तर्पण (पिंडदान) के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है।
एक अन्य मान्यता के अनुसार, भगवान राम ने अपने पिता राजा दशरथ के लिए गयाजी में श्राद्ध किया था। वहीं, माता सीता द्वारा फल्गु नदी तट पर पिंडदान करने की कथा भी प्रचलित है।
गयाजी धाम में पिंडदान के लिए 48 प्रमुख वेदियां और कई पवित्र स्थल माने जाते हैं। इनमें प्रमुख रूप से विष्णुपद मंदिर, फल्गु नदी तट, अक्षयवट (अक्षयवट वृक्ष), सीता कुंड, पंचतीर्थ, प्रेतशिला, रामशिला, ब्रह्मकुंड, और गया शिरोमणि क्षेत्र को महत्वपूर्ण माना गया है।
धार्मिक परंपरा में गयाजी को 'पितृ तीर्थ' कहा जाता है और इसे पूर्वजों के मोक्ष का सबसे महत्वपूर्ण स्थान माना गया है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि गया पहुंचने से पहले भी एक ऐसी जगह है, जहां तर्पण और पिंडदान करना जरूरी बताया गया है। यह जगह है पुनपुन नदी का घाट, जिसे धार्मिक मान्यताओं में पितृमोक्ष का पहला द्वार कहा जाता है।
पटना जिले के पास स्थित पुनपुन नदी का यह घाट पितृपक्ष के दौरान खास महत्व रखता है। मान्यता है कि गया में पिंडदान करने से पहले पुनपुन नदी में स्नान, तर्पण और प्रथम पिंडदान करना चाहिए। इसके बाद गया जाकर फल्गु नदी के तट पर पिंडदान और अन्य धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं।
पुनपुन घाट की सबसे खास बात इससे जुड़ी भगवान राम और माता सीता की पौराणिक कथा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, जब भगवान राम अपने पिता राजा दशरथ का श्राद्ध और पिंडदान करने के लिए निकले तो उन्होंने गया जाने से पहले पुनपुन नदी के तट पर अपने पूर्वजों के लिए तर्पण किया था।
कहा जाता है कि भगवान राम ने माता जानकी के साथ पुनपुन नदी के किनारे सबसे पहले पिंड अर्पित किया। इसके बाद वे गया पहुंचे और फल्गु नदी के तट पर विधि-विधान से पिंडदान किया। इसी मान्यता के चलते पुनपुन को गया से पहले पिंडदान करने का स्थान और 'मोक्ष का प्रथम द्वार' कहा जाता है।
पुनपुन नदी को लेकर धार्मिक ग्रंथों में भी मान्यताएं मिलती हैं। गरुड़ पुराण से जुड़ी मान्यता के अनुसार इसे ‘आदिगंगा’ कहा गया है। ऐसी धार्मिक मान्यता है कि पुनपुन नदी के तट पर पितरों के लिए तर्पण करने से पूर्वजों का उद्धार होता है और सात पीढ़ियों को इसका पुण्य प्राप्त होता है।
यही वजह है कि पितृपक्ष में आज भी कई लोग पुनपुन से अपनी धार्मिक यात्रा शुरू करते हैं। मान्यता के अनुसार यहां स्नान और तर्पण के बाद प्रथम पिंडदान किया जाता है। इसके बाद गया जाकर फल्गु नदी के तट पर पिंडदान और अन्य कर्मकांड किए जाते हैं।
--आईएएनएस
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