पितरों की शांति के लिए देश के ये तीर्थ क्यों माने जाते हैं सबसे पवित्र?
नई दिल्ली, 26 सितंबर (आईएएनएस)। गुजरात में नर्मदा नदी के तट पर स्थित शूलपाणेश्वर महादेव का तीर्थ केवल एक उपासना स्थल नहीं, बल्कि पापमुक्ति और आध्यात्मिक शुद्धिकरण का एक प्रमुख केंद्र है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार, जब भगवान शिव ने अंधकासुर नामक दैत्य का वध किया, तो उनका अजेय अस्त्र त्रिशूल (शूल) दैत्य के दूषित रक्त से मलिन हो गया था। अपने अस्त्र को शुद्ध करने के उद्देश्य से महादेव ने संपूर्ण पृथ्वी का भ्रमण किया और नर्मदा के तट पर आकर अपने त्रिशूल को धरती में गाड़ दिया। ऐसा करते ही वहां से एक निर्मल और पवित्र जलधारा ने त्रिशूल को धोकर शुद्ध कर दिया।
इसी पावन स्थल पर एक स्वयंभू शिवलिंग प्रकट हुआ, जिसे भगवान शिव ने स्वयं स्थापित किया और इसी कारण इसका नाम 'शूलपाणेश्वर' पड़ा। ऐतिहासिक रूप से यह स्थान पहले महाराष्ट्र की सीमा से लगे मणिबेली गांव में घने जंगलों और मनमोहक शूलपाणेश्वर झरने के बीच स्थित था। वर्ष 1994 में सरदार सरोवर बांध के निर्माण और जलस्तर बढ़ने के कारण यह मूल प्राचीन मंदिर और शिवलिंग जलमग्न हो गए। इसके पश्चात्, गुजरात सरकार द्वारा एकता नगर (केवडिया) के निकट गोरा ब्रिज के समीप एक ऊंचे स्थान पर नए शूलपाणेश्वर मंदिर का भव्य निर्माण किया गया। यह मान्यता है कि इस स्थान पर नर्मदा में स्नान करने और पितरों का तर्पण करने से मनुष्य के बड़े से बड़े पाप भी धुल जाते हैं, जो इसे पिंडदान के लिए एक अत्यंत पवित्र स्थल बनाता है।
पितृ शांति की यात्रा में गुजरात के वडोदरा जिले के डभोई तालुका में स्थित चाणोद (जिसे चांदोद भी कहा जाता है) एक अत्यंत महत्वपूर्ण पड़ाव है। इस पावन तीर्थ को इसकी भौगोलिक और आध्यात्मिक विशिष्टता के कारण 'दक्षिणी प्रयाग' की उपाधि दी गई है। यहां तीन पवित्र नदियों (नर्मदा, ओरसंग और गुप्त रूप से बहने वाली सरस्वती) का 'त्रिवेणी संगम' होता है। हिंदू धर्म में मृत्यु के उपरांत किए जाने वाले अंतिम संस्कारों, अस्थि विसर्जन और पिंडदान के लिए इसे देश के सबसे पवित्र स्थानों में से एक माना गया है।
चाणोद के घाटों का इतिहास भी इस स्थान को विशेष बनाता है। यहां के सबसे प्रसिद्ध 'मल्हार राव घाट' का निर्माण लगभग 1,000 वर्ष पूर्व हुआ था। ऐतिहासिक दस्तावेजों और स्थानीय किंवदंतियों के अनुसार, अहिल्याबाई होल्कर के ससुर मल्हार राव होल्कर के एक मंत्री ने राज्य के खजाने से भारी धन चुरा लिया था। जब यह धन एक पवित्र तुलसी के पौधे के नीचे से बरामद हुआ, तो राजा ने उस धन का उपयोग जनहित और धर्म के कार्य के लिए करते हुए इस विशाल घाट का निर्माण करवाया। इस 60 फीट चौड़े और 64 सीढ़ियों वाले घाट से श्रद्धालु नाव में बैठकर त्रिवेणी संगम के मध्य तक जाते हैं और अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए वैदिक मंत्रोच्चार के बीच पिंडदान करते हैं।
उत्तर और पश्चिम भारत से निकलकर यदि दक्षिण भारत की सांस्कृतिक परंपराओं का विश्लेषण किया जाए, तो तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली जिले में स्थित श्रीरंगम का 'अम्मा मंडपम' घाट सर्वोच्च आस्था के रूप में उभरता है। कावेरी नदी के तट पर स्थित यह प्राचीन घाट हिंदू अनुष्ठानों, विशेषकर पितृ तर्पण और पिंडदान के लिए विश्व-स्तर पर प्रसिद्ध है।
दक्षिण भारत में कावेरी नदी को अत्यंत पवित्र माना जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार ताई अमावस्या, महालय अमावस्या (पितृ पक्ष) और आदि अमावस्या के विशेष अवसरों पर अम्मा मंडपम पर हजारों की संख्या में श्रद्धालु एकत्रित होते हैं। भक्तगण कावेरी नदी में डुबकी लगाते हैं और पुजारियों के वैदिक मार्गदर्शन में अपने दिवंगत पूर्वजों के लिए 'तर्पणम' संपन्न करते हैं। इस क्षेत्र में यह गहरी मान्यता है कि पूर्वजों का तर्पण करने से लौकिक जीवन के कष्ट दूर होते हैं और पारिवारिक समृद्धि आती है। अम्मा मंडपम में यह पवित्र अनुष्ठान पूरा करने के पश्चात् ही श्रद्धालु भगवान श्रीरंगनाथ स्वामी के मुख्य मंदिर में दर्शन के लिए प्रस्थान करते हैं, जो मृत्यु और जीवन के बीच के संतुलन को दर्शाता है।
भारत की मोक्ष यात्राओं का कोई भी आख्यान मध्य प्रदेश और गुजरात की जीवनरेखा नर्मदा के उल्लेख के बिना पूर्ण नहीं हो सकता। स्कंद पुराण के 'रेवा खंड' सहित कई प्राचीन भारतीय ग्रंथों में नर्मदा को 'रेवा' या 'रेवा' के नाम से संबोधित किया गया है। वायु पुराण में नर्मदा की उत्पत्ति के रहस्य को स्पष्ट करते हुए इसे 'पितरों की पुत्री' बताया गया है, जो इस नदी की आध्यात्मिक महिमा को पिंडदान के संदर्भ में सर्वाधिक प्रासंगिक बना देता है।
शास्त्रीय मान्यताओं में यह स्पष्ट उल्लेख है कि रेवा (नर्मदा) के तट पर किसी भी स्थान पर किया गया श्राद्ध, पितृ तर्पण और पिंडदान मनुष्य को 'अक्षय' (कभी नष्ट न होने वाला) पुण्य प्रदान करता है। अन्य नदियों के विपरीत, नर्मदा में केवल स्नान करने से ही नहीं, बल्कि इसके दर्शन मात्र से भी पापों का नाश माना गया है। नर्मदा के तल से प्राप्त होने वाले स्वयंभू 'नर्मदेश्वर' या 'बाण लिंग' की पूजा बिना किसी प्राण-प्रतिष्ठा के की जा सकती है, जो इस नदी की अद्वितीय प्राणिक ऊर्जा का प्रमाण है। पितृ पक्ष के दौरान अमरकंटक से लेकर भरूच तक फैले रेवा के विस्तृत तटों पर पिंडदान करने से पूर्वज तृप्त होते हैं और आत्मा को जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिलती है।
शूलपाणेश्वर का ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक रहस्य, चाणोद का पवित्र त्रिवेणी संगम, श्रीरंगम में कावेरी नदी का अम्मा मंडपम, और रेवा (नर्मदा) की मोक्षदायिनी लहरें, ये सभी तीर्थस्थल मनुष्य को उसकी जड़ों और पूर्वजों से जोड़ते हैं।
--आईएएनएस
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