फिलिस्तीन में शांति सिर्फ उम्मीद नहीं, अंतरराष्ट्रीय समुदाय को अब ठोस कदम उठाने होंगे’: राजदूत अब्दुल्ला एम. अबू
नई दिल्ली, 24 सितंबर (आईएएनएस)। भारत में फिलिस्तीन के राजदूत अब्दुल्ला एम. अबू शावेश ने गाजा संघर्ष और इजरायली कब्जे को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय पर सवाल उठाते हुए कहा है कि फिलिस्तीन में शांति की उम्मीद तभी वास्तविकता में बदल सकती है, जब दुनिया बयानबाजी से आगे बढ़कर ठोस कदम उठाए। आईएएनएस से बातचीत में उन्होंने संयुक्त राष्ट्र की भूमिका पर भी सवाल उठाए। आरोप लगाया कि प्रस्ताव पारित करने के बावजूद संस्था प्रभावी तरीके से उन्हें लागू कराने में सक्षम नहीं हो पाई है।
अबू ने कहा, "फिलिस्तीन में जो स्थिति बनी हुई है, उसे महज ‘संघर्ष’ कहना पर्याप्त नहीं है। यह इजराइली कब्जे और लंबे समय से जारी संकट से जुड़ा मामला है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को इसकी गंभीरता को उसी रूप में समझना होगा।"
उन्होंने कहा, “कूटनीतिक और शांतिपूर्ण समाधान की उम्मीद हमेशा रहती है, लेकिन यह उम्मीद तब तक सैद्धांतिक ही रहेगी, जब तक अंतरराष्ट्रीय समुदाय एकजुट होकर इसे व्यावहारिक स्तर पर लाने के लिए वास्तविक कदम नहीं उठाता।”
फिलिस्तीनी राजदूत ने कहा कि अब जरूरत सिर्फ शांति प्रक्रिया का जिक्र करने की नहीं, बल्कि उसके क्रियान्वयन के लिए ठोस कार्रवाई करने की है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की कि महज बयान जारी करने और औपचारिक प्रतिक्रियाओं से आगे बढ़कर शांति प्रक्रिया को आगे ले जाने के लिए व्यावहारिक कदम उठाए।
संयुक्त राष्ट्र की भूमिका पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा, "वह इस संगठन से लंबे समय तक जुड़े रहे हैं और इसकी अहमियत को समझते हैं, लेकिन मौजूदा व्यवस्था में संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों का जमीनी असर सीमित दिखाई देता है।"
उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र 193 देशों के सामूहिक प्रयास का प्रतिनिधित्व करता है, लेकिन सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों के बीच मतभेद होने पर उसकी प्रभावशीलता प्रभावित होती है। उनके अनुसार, यही वजह है कि कई महत्वपूर्ण प्रस्तावों और अंतरराष्ट्रीय अपीलों के बावजूद फिलिस्तीन के सवाल पर स्थिति में अपेक्षित बदलाव नहीं आया है।
फिलिस्तीनी प्रतिनिधि ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के मौजूदा सत्र में फिलिस्तीनी नेतृत्व की भागीदारी का मुद्दा भी उठाया। बोले, "अमेरिका ने फिलिस्तीनी प्राधिकरण को लगातार दूसरे साल अमेरिका आने का वीजा नहीं दिया है। अंतरराष्ट्रीय संस्था से मेरा मतलब बहुपक्षीय राजनीति से है। 2026 में हो रही यूएनजीए बैठक में हम फिलिस्तीनियों को हमारा अधिकार नहीं दिया गया। हमें शामिल नहीं होने दिया गया और यह फिर से उसी एक फैसले या उस एक देश की वजह से है जो मेजबान देश है। और दूतावास ने पहले ही इस बारे में विरोध पत्र जारी किया था, जब मेजबान देश संयुक्त राष्ट्र के मालिक की तरह व्यवहार करने लगा। तो दुर्भाग्य से, लगातार दूसरे साल, संयुक्त राज्य अमेरिका ने हमें संयुक्त राष्ट्र महासभा में शामिल होने और बोलने से रोक दिया है।"
फिलिस्तीनी प्रतिनिधि ने कहा कि एक तरफ फिलिस्तीनी नेतृत्व को महासभा में व्यक्तिगत रूप से शामिल होने से रोका जा रहा है, जबकि दूसरी तरफ इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू महासभा को संबोधित करने के लिए न्यूयॉर्क पहुंच रहे हैं। उन्होंने इस स्थिति को अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में असमानता का उदाहरण बताया।
उन्होंने अमेरिका की नीतियों पर भी निशाना साधा और कहा कि वाशिंगटन लंबे समय से इजरायल का समर्थन करता रहा है। उन्होंने विशेष रूप से अमेरिका द्वारा इजराइल को हथियारों की आपूर्ति का मुद्दा उठाया।
अमेरिकी प्रशासन की ओर से इजरायल के लिए करीब 2.8 अरब डॉलर के प्रस्तावित हथियार सौदे में 40,000 ऐसे बम शामिल होने की खबरों पर उन्होंने कहा, मौजूदा यूनाइटेड स्टेट्स एडमिनिस्ट्रेशन ने ऐलान किया कि वे इजरायल को 40,000 बम सप्लाई करेंगे, जिनमें से हर एक का वजन 2,000 पाउंड होगा।
फिलिस्तीनी राजदूत ने कहा कि इस तरह की सैन्य सहायता का असर केवल राजनीतिक स्तर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका सीधा प्रभाव आम लोगों पर पड़ता है। उन्होंने कहा कि फिलिस्तीनी, सीरियाई और लेबनानी लोगों के बीच बड़ी संख्या में परिवारों ने इस लंबे संकट में अपने प्रियजनों को खोया है।
उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को अब यह तय करना होगा कि वह केवल प्रस्तावों, बयानों और अपीलों तक सीमित रहेगा या फिर शांति प्रक्रिया को लागू कराने के लिए वास्तविक कदम उठाएगा।
उन्होंने कहा, “जब अंतरराष्ट्रीय समुदाय बयानबाजी से आगे बढ़कर व्यावहारिक कदम उठाएगा, तभी शांति का रास्ता खुलेगा।”
--आईएएनएस
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