पाकिस्तान: सिंध में गहराया जल संकट, पंजाब पर तय हिस्से से अधिक पानी लेने का लगाया आरोप
इस्लामाबाद, 7 जून (आईएएनएस)। पाकिस्तान के दो प्रांत पानी बंटवारे को लेकर आपस में भिड़े हुए हैं। हालात बेकाबू होते जा रहे हैं, लेकिन हुक्मरान बेफिक्र हैं। स्थानीय मीडिया का दावा है कि सिंध प्रांत में खरीफ सीजन के दौरान गंभीर जल संकट पैदा हो गया है। यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब पाकिस्तान पहले ही जलवायु परिवर्तन, घटते जल संसाधनों और कृषि चुनौतियों से जूझ रहा है।
प्रमुख अंग्रेजी दैनिक डॉन ने विभिन्न नहरों की गिरती तस्वीर पेश की है। उनके अनुसार, इलाके के बड़े बैराज सुक्कुर की राइट बैंक नहर प्रणाली में पानी की भारी कमी दर्ज की गई है, जिससे लरकाना, कंबर-शहदादकोट, दादू, शिकारपुर और बलूचिस्तान के कई कृषि क्षेत्र प्रभावित हो रहे हैं।
सिंध सिंचाई विभाग के आंकड़ों के अनुसार, नॉर्थ वेस्ट कैनाल (एनडब्ल्यूसी) में 64.1 प्रतिशत, राइस कैनाल में 38 प्रतिशत और दादू कैनाल में 82 प्रतिशत पानी की कमी है। इस कारण धान की खेती और अन्य खरीफ फसलों की बुवाई प्रभावित हो रही है।
अधिकारियों और किसानों का आरोप है कि संकट की एक बड़ी वजह पंजाब प्रांत का अपने निर्धारित हिस्से से अधिक पानी का उपयोग करना है। रिपोर्ट के मुताबिक, पंजाब को 44,000 क्यूसेक पानी आवंटित है, लेकिन वह 53,394 क्यूसेक पानी ले रहा है, जो तय हिस्से से लगभग 21 प्रतिशत अधिक है। इसी तरह तौंसा बैराज पर भी निर्धारित मात्रा से ज्यादा पानी निकाले जाने का दावा किया गया है।
दूसरी ओर, चश्मा बैराज में जलस्तर लगातार बढ़ रहा है, जिससे यह संकेत मिलता है कि ऊपरी क्षेत्रों में पानी जमा हो रहा है जबकि निचले इलाकों में कमी लगातार बढ़ती जा रही है। सिंध सरकार ने 1,30,000 क्यूसेक पानी की मांग की थी, लेकिन उसे केवल 1,00,000 क्यूसेक पानी उपलब्ध कराया जा रहा है।
पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के सिंध अध्यक्ष निसार अहमद खुखरो ने चेतावनी दी है कि खरीफ सीजन में सिंध के हिस्से का पानी कम करना प्रांत की अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर डालेगा। उन्होंने कहा कि सिंध हर साल 55 लाख टन चावल का उत्पादन करता है और लगभग 1.4 अरब डॉलर का निर्यात करता है।
किसानों का कहना है कि कई क्षेत्रों में अभी तक धान की नर्सरी तैयार नहीं हो सकी है क्योंकि नहरों के अंतिम छोर तक पानी नहीं पहुंचा है। चेतावनी दी है कि यदि जल्द समाधान नहीं निकाला गया तो कृषि उत्पादन और ग्रामीण आजीविका को अपूरणीय नुकसान हो सकता है।
यह विवाद पाकिस्तान के 1991 जल बंटवारा समझौते के प्रारूप को लेकर भी सवाल खड़े करता है। जल संसाधनों के असमान वितरण से न केवल प्रांतों के बीच राजनीतिक तनाव बढ़ सकता है, बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा और निर्यात आय पर भी असर पड़ सकता है।
अप्रैल 2025 में दस दिनों तक जल बंटवारे के मुद्दे पर पाकिस्तान लगभग ठप हो गया था। देश के एकमात्र बंदरगाह शहर कराची से उत्तर की ओर स्थित आबादी वाले क्षेत्रों तक कोई भी माल ढुलाई नहीं हुई थी। इसकी वजह सरकार द्वारा पूर्वी पाकिस्तान के चोलिस्तान रेगिस्तान में सिंचाई के लिए छह नहरें बनाने की परियोजना का ऐलान था।
पानी की आपूर्ति में कमी की आशंका से दक्षिणी सिंध प्रांत में प्रदर्शन शुरू हुए थे। प्रदर्शनकारियों ने इस परियोजना को तुरंत रद्द करने की मांग की और उत्तर की ओर जाने वाले सभी राजमार्गों को अवरुद्ध कर दिया था, जिसके बाद आखिरकार सरकार को झुकना पड़ा था।
--आईएएनएस
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