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राम मंदिर किस जमीन पर बना? सुप्रीम कोर्ट ने याचिका सुनने से किया इनकार, वीडियो में कहा- सिविल कोर्ट जाएं

 

अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण की जमीन को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका पर सोमवार, 2 नवंबर को सुनवाई हुई। शीर्ष अदालत ने इस याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने याचिकाकर्ता से कहा कि अगर उन्हें मंदिर निर्माण की जमीन को लेकर कोई विवाद है, तो वे इस मामले को लेकर सिविल कोर्ट जा सकते हैं।याचिका में सवाल उठाया गया था कि अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण उसी जमीन पर हुआ है या नहीं, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 9 नवंबर 2019 के ऐतिहासिक फैसले में मंदिर निर्माण के लिए निर्धारित किया था। याचिकाकर्ता ने जमीन के रिकॉर्ड और दूसरे दस्तावेजों के आधार पर इसकी स्वतंत्र जांच कराने की मांग की थी।

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स्वतंत्र समिति बनाने की मांग की गई थी

याचिका में सुप्रीम कोर्ट से एक स्वतंत्र समिति या आयोग गठित करने की अपील की गई थी। इसमें सर्वे, राजस्व, पुरातत्व और अन्य तकनीकी क्षेत्रों के विशेषज्ञों को शामिल करने की मांग की गई थी।याचिकाकर्ता का कहना था कि विशेषज्ञों की टीम जमीन से जुड़े दस्तावेजों, नक्शों और रिकॉर्ड की जांच कर यह पता लगाए कि मंदिर का निर्माण उसी भूमि पर हुआ है, जिसका उल्लेख सुप्रीम कोर्ट के 2019 के फैसले में किया गया था।इसके लिए जमीन की सीमाओं, क्षेत्रफल और वास्तविक स्थिति का सर्वे कराने की मांग भी रखी गई थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में खुद जांच कराने या आयोग गठित करने की मांग स्वीकार नहीं की और याचिकाकर्ता को सिविल कोर्ट जाने का विकल्प बताया।

किसने दाखिल की थी याचिका?

यह याचिका श्री राम जन्मभूमि केस ट्रस्ट की ओर से दाखिल की गई थी। यह ट्रस्ट राम मंदिर का निर्माण और प्रबंधन करने वाले श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट से अलग है।याचिका में जमीन की जांच के अलावा मंदिर में आने वाले चढ़ावे और दान की पारदर्शिता से जुड़े मुद्दे भी उठाए गए थे। इसमें मंदिर के खातों का नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) से सालाना ऑडिट कराने और दान-चढ़ावे का डिजिटल रिकॉर्ड सार्वजनिक करने जैसी मांगें शामिल थीं।

2019 में सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया था ऐतिहासिक फैसला

अयोध्या के राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने 9 नवंबर 2019 को सर्वसम्मति से फैसला सुनाया था। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने विवादित 2.77 एकड़ जमीन रामलला को देने का आदेश दिया था। कोर्ट ने केंद्र सरकार को मंदिर निर्माण के लिए ट्रस्ट बनाने का निर्देश भी दिया था।फैसले में केंद्र सरकार को अयोध्या में ही सुन्नी वक्फ बोर्ड को मस्जिद निर्माण के लिए पांच एकड़ वैकल्पिक जमीन देने का निर्देश दिया गया था।इस फैसले के बाद राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ हुआ और मंदिर निर्माण एवं प्रबंधन के लिए श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन किया गया।

सिविल कोर्ट में उठाया जा सकता है जमीन का मुद्दा

सुप्रीम कोर्ट के ताजा रुख के बाद याचिकाकर्ता के पास जमीन से जुड़े रिकॉर्ड और दस्तावेजों के आधार पर सिविल कोर्ट में मामला उठाने का विकल्प है। अब इस मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई याचिकाकर्ता के अगले कदम पर निर्भर करेगी।