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ओडिशा: भार्गवी नदी, बिंदुसागर तालाब और मां बिरजा मंदिर में पिंडदान का विशेष महत्व

 

भुवनेश्वर, 25 सितंबर (आईएएनएस)। पूर्वजों की आत्मा की शांति और तृप्ति के लिए पितृ पक्ष में तर्पण, पिंडदान और दान-पुण्य किए जाते हैं। इस वर्ष पितृ पक्ष (श्राद्ध पक्ष) की शुरुआत 26 सितंबर को पूर्णिमा श्राद्ध से होगी, जबकि प्रतिपदा तिथि से इसका विधिवत प्रारंभ 27 सितंबर को होगा। इसका समापन 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के दिन होगा। ओडिशा में भार्गवी नदी के तट, भुवनेश्वर और जाजपुर में स्थित मां बिरजा मंदिर परिसर में पितरों की आत्मा की शांति के लिए मोक्ष की प्राप्ति होती है।

ओडिशा में पितृ पक्ष के दौरान बड़ी संख्या में लोग पवित्र भार्गवी नदी के तट पर अपने पूर्वजों के लिए तर्पण, पिंडदान और दान-पुण्य करने के लिए पहुंचते हैं। मान्यता है कि इस नदी के तट पर पिंडदान करने से पितरों को शांति और मोक्ष मिलता है। मान्यता है कि पिंडदान करने से पूर्वज जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाते हैं। इसको 'मुक्ति' का द्वार कहते हैं।

जगन्नाथपुरी हिंदू धर्मों के चार धामों में से एक है, इस वजह से भी यहां बहने वाली भार्गवी नदी के तट पर लोग बड़ी संख्या में तर्पण करते हैं। मान्यता है कि जो भी चार धामों की यात्रा करता है, उसे सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। सभी कोणों से पिंडदान करने से परिवार के सदस्यों को पुण्य मिलता और आत्मा को शांति मिलती है।

ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर में पिंडदान और तर्पण के लिए बिंदुसागर तालाब सबसे प्रमुख और पवित्र स्थान माना जाता है, जो प्रसिद्ध लिंगराज मंदिर के पास स्थित है। भुवनेश्वर को 'गुप्त काशी' या 'उत्कल-वाराणसी' कहा जाता है। यहां के बिंदुसागर तालाब में देश की सभी पवित्र नदियों का जल माना जाता है, जिसकी वजह से यहां पिंडदान और तिला तर्पण करने का विशेष धार्मिक महत्व है। पितृ पक्ष और खासकर महालया (सर्वपितृ अमावस्या) के दिन यहां हजारों की संख्या में श्रद्धालु अपने पूर्वजों को श्रद्धांजलि देने और पिंडदान करने आते हैं।

वहीं, ओडिशा के जाजपुर में यहां श्राद्ध एवं तर्पण करने का काफी महत्व माना जाता है। मान्यता है कि यहां ब्रह्मा जी ने यज्ञ किया था। मां बिरजा मंदिर पितृ तर्पण और पिंडदान के लिए बिहार के गयाजी की तरह ही बेहद पवित्र और महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है। मां बिरजा मंदिर परिसर के भीतर एक गहरा कुआं है, जिसे नाभि गया कहा जाता है। पिंडदान के बाद पिंड इसी कुएं में अर्पित किए जाते हैं। मान्यता है कि इस कुएं में अर्पित किया गया पिंड और पूजन सामग्री धीरे-धीरे अदृश्य या नीचे रिस जाती है, जिसे पितरों तक पहुंचने का प्रतीक माना जाता है। जाजपुर में पिंडदान और तर्पण के बाद पास बहने वाली पवित्र वैतरणी नदी में स्नान करने का भी विशेष विधान है।

--आईएएनएस

एसडी/एएस