एनएलएसआईयू के दीक्षांत समारोह में सीएम शिवुकमार बोले- लोकतंत्र की हो रही परीक्षा, भारी दबाव में हैं संस्थाएं
बेंगलुरु, 17 अक्टूबर (आईएएनएस)। नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी (एनएलएसआईयू) के 34वें वार्षिक दीक्षांत समारोह में कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार शामिल हुए। इस दौरान उन्होंने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए उन्हें बधाई भी दी। इसके साथ ही कहा कि यह विश्वविद्यालय एक बेहतरीन संस्थान है। यह देश का पहला लॉ विश्वविद्यालय यानी 'नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी' है। इसलिए इस विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र होने पर आप सभी को गर्व होना चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि इस समय लोकतंत्र की परीक्षा हो रही है और संस्थाएं भारी दबाव में हैं।
शिवकुमार ने कहा, " आप चाहे जो भी मानें लेकिन मैं एक बात कबूल करना चाहता हूं। एक छात्र के रूप में मैं स्नातक (ग्रेजुएट) नहीं हो पाया था। मैंने 46 या 47 साल की उम्र में स्नातक किया। जब मैं एक छात्र था, उस समय मैंने चुनाव लड़ा था। मेरी इच्छा थी कि मेरे बच्चे मुझसे यह पूछें, "आप ग्रेजुएट क्यों नहीं हुए?" उससे पहले ही मैं ग्रेजुएट हो जाऊं। इसलिए 46 साल की उम्र में जब मैं विधायक के रूप में अपना चौथा कार्यकाल लगभग पूरा कर रहा था, तब मैंने कोशिश की। मैंने राजनीति विज्ञान (पॉलिटिकल साइंस) में अपना स्नातक पूरा किया। जब मैं 29 साल की उम्र में कैबिनेट मंत्री बना, तो मुझे बहुत खुशी हुई थी और बाद में जब फिर से कैबिनेट मंत्री बना, तब भी बहुत खुशी हुई। हालांकि, मुझे उतनी खुशी नहीं हुई जितनी उस दिन हुई थी, जिस दिन मैंने मैसूर विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री प्राप्त की थी। वह मेरे जीवन का सबसे खुशी का दिन था लेकिन मैं वकील नहीं बन सका। मेरी भी यही इच्छा थी और मेरे बेटे ने भी मुझसे ऐसा करने के लिए कहा था लेकिन मैं ऐसा नहीं कर पाया। अब, वह खुद एक वकील बन गया है। इसलिए, मुझे खुशी है कि कम से कम मेरे बच्चों में से एक वकील तो बना और उसने अपने पिता को उस चीज के लिए धन्यवाद दिया जिसे मैं हासिल करना चाहता था।"
डीके शिवकुमार ने विद्यार्थियों से कहा कि भारत अपने इतिहास के एक निर्णायक मोड़ पर है। हम दुनिया के सबसे युवा राष्ट्रों में से एक हैं, जहां हमारी आधी से ज्यादा आबादी 30 साल से कम उम्र की है। हमारे युवा हमारी सबसे बड़ी ताकत हैं लेकिन सिर्फ युवाओं की बड़ी संख्या होने से ही कोई देश महान नहीं बन जाता। आप वह पीढ़ी हैं जो अगले 50 वर्षों के लिए भारत को आकार देने में मदद करेगी। युवाओं के विचार, मूल्य, साहस और उनके कार्य ही किसी राष्ट्र को महान बनाते हैं। आपकी पीढ़ी ही भारत का भविष्य है। हमें इस पर ध्यान देना होगा।
हम अपनी आजादी के 100 साल पूरे होने का जश्न मनाने जा रहे हैं। हमारा लक्ष्य एक ऐसा विकसित राष्ट्र बनना है, जहां मजबूत बुनियादी ढांचा हो, आर्थिक विकास तेज हो, रोजगार के बेहतर अवसर हों और सभी के लिए समान मौके हों। विकास का मतलब सिर्फ देश की संपत्ति बढ़ना नहीं है। इसका अर्थ है लोगों की गरिमा, आजादी, समानता और सुरक्षा और इसीलिए, भारत के भविष्य के लिए कानून का भविष्य बहुत महत्वपूर्ण है।
मुख्यमंत्री ने विद्यार्थियों से कहा, "आप सिर्फ कानून की पढ़ाई नहीं कर रहे हैं। आप उन लाखों लोगों के अधिकारों की रक्षा करने की तैयारी कर रहे हैं, जिन्हें कभी पढ़ने का मौका ही नहीं मिला। भारत को सिर्फ और अधिक वकीलों की जरूरत नहीं है। हमें ऐसे वकीलों की जरूरत है जो ईमानदार हों, जिनमें करुणा हो और जो साहसी हों। वकील लोकतंत्र के मध्यस्थ होते हैं। हमें ऐसे वकीलों की जरूरत है जो सही के लिए खड़े होने को तैयार हों, भले ही ऐसा करना मुश्किल हो क्योंकि कानून की जानकारी आपको एक पेशेवर बनाती है लेकिन न्याय की समझ आपको एक नेता बनाती है। मेरा यही मानना है।
डीके शिवकुमार ने कहा, "मुझे हमेशा संविधान निर्माता बी.आर. आंबेडकर याद आते हैं, जिन्होंने हमें न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के मूल्य दिए। हम इन्हीं मूल्यों का जश्न मना रहे हैं। ये केवल किसी दस्तावेज में लिखे शब्द नहीं हैं बल्कि लोकतंत्र की नींव हैं। कर्नाटक के मुख्यमंत्री के रूप में मैं समझता हूं कि हमारे हर फैसले का अंतिम उद्देश्य आम नागरिकों की भलाई होना चाहिए। एक मजबूत लोकतंत्र वह नहीं है जहां हर कोई सरकार की बात से सहमत हो। एक मजबूत लोकतंत्र वह है, जहां हर नागरिक को सरकार से सवाल पूछने की आजादी हो।"
मुख्यमंत्री ने कहा, "लोकतंत्र की परीक्षा हो रही है। संस्थाएं भारी दबाव में हैं। हमें ऐसे युवाओं की जरूरत है जो सवाल पूछें, बहस करें, विचारों को चुनौती दें और समाधान सुझाएं। सवाल पूछने से कभी न डरें लेकिन साथ ही जवाब खोजने की जिम्मेदारी उठाने के लिए भी तैयार रहें। वकीलों और नीति-निर्माताओं के रूप में आप पर एक विशेष जिम्मेदारी है। आप संविधान के संरक्षक हैं। आपको यह कभी नहीं भूलना चाहिए। संविधान ही आपकी बाइबल, भगवद गीता, कुरान या जो भी आप इसे कहें, वही है। यह संविधान ही है। जब कोई संस्था डगमगाने लगे, तो ऐसी आवाज उठनी चाहिए जिसे सुना जाए और जिसे मजबूत किया जाए। न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व केवल परीक्षाओं के लिए याद करने वाले शब्द नहीं हैं। ये हमारे शासन चलाने, नीतियां बनाने, बहस करने और एक-दूसरे के साथ व्यवहार करने के तरीके का मार्गदर्शन करने चाहिए।"
उन्होंने कहा, "मुझे यह घोषणा करते हुए बहुत गर्व हो रहा है कि कर्नाटक न्यायिक सेवा परीक्षाओं के लिए एक विशेष लॉ कॉलेज स्थापित करेगा, जिसमें युवा उम्मीदवारों के लिए एक कोचिंग संस्थान भी होगा। यूपीएससी, आईपीएस और अन्य पुलिस सेवाओं के लिए ऐसे संस्थान मौजूद हैं, जहां उम्मीदवार अपनी पढ़ाई कर सकते हैं। हमें न्यायपालिका (जुडिशियरी) के लिए भी ऐसे ही संस्थानों की आवश्यकता है। हम चाहते हैं कि युवा वकीलों को आगे बढ़ने और खुद को विकसित करने में मदद मिले।"
--आईएएनएस
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