नेहरू के विशेष आग्रह पर चुनी थी राजनीति, फिर कैसे कांग्रेस के साथ विजयाराजे सिंधिया के संबंध बिगड़े?
नई दिल्ली, 24 जनवरी (आईएएनएस)। स्वतंत्र भारत की राजनीति में कुछ रिश्ते रणनीति से शुरू होकर टकराव पर खत्म होते हैं, ठीक उसी तरह जैसे राजघराने की राजमाता विजयाराजे सिंधिया का संबंध कांग्रेस के साथ रहा। एक ओर कांग्रेस को ग्वालियर रियासत में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए सिंधिया घराने का सहारा चाहिए था, तो दूसरी ओर राजमाता विजयाराजे सिंधिया राजनीति में प्रवेश ही नहीं करना चाहती थीं। जवाहरलाल नेहरू के विशेष आग्रह पर जिस रिश्ते की शुरुआत मजबूरी और समझौते से हुई, वही आगे चलकर वैचारिक मतभेद, सत्ता संघर्ष और व्यक्तिगत टकराव के कारण खुली राजनीतिक दुश्मनी में बदल गया। यही संबंध भारतीय राजनीति में कांग्रेस बनाम राजमाता की उस कहानी की नींव बना, जिसने मध्य प्रदेश से लेकर राष्ट्रीय राजनीति तक कई सत्ता समीकरण बदल दिए।
बुंदेलखंड के छोटे से शहर सागर में ठाकुर महेंद्र सिंह और चूड़ामणि देवी के घर 11 अक्टूबर 1919 को एक बालिका ने जन्म लिया। नामकरण हुआ लेखा देवेश्वरी। यही लेखा देवेश्वरी 21 फरवरी 1941 को ग्वालियर स्टेट के तत्कालीन महाराजा जीवाजी राव सिंधिया के साथ शादी के बंधन में बंधीं। तब राज परंपरा के अनुसार उन्हें नई पहचान मिली, महारानी विजयाराजे सिंधिया।
शाही रियासतों को जोड़कर एक मध्य भारत नाम का एक राज्य बना था और इन रजवाड़ों के राज प्रमुख ग्वालियर के आखिरी महाराज जीवाजी राव सिंधिया थे। 31 अक्टूबर 1956 को शाही रियासतें मध्य प्रदेश में मिला दी गईं। 1957 में लोकसभा के चुनाव होने वाले थे। उसी दौर में ग्वालियर और आसपास के इलाकों में हिंदू संगठनों का असर बढ़ रहा था। आजादी के पहले सबसे पहले सत्ता संभालने वाली कांग्रेस इन क्षेत्रों में हिंदू संगठनों के असर से परेशान थी। अब तक राजनीति में सिंधिया परिवार की एंट्री नहीं हुई थी, लेकिन माना गया कि जीवाजी राव सिंधिया हिंदू संगठनों के प्रति नरम थे। इसी से वोटों का सीधा प्रभाव शाही खानदान पर भी बना रहा, जिससे कांग्रेस भी वाकिफ थी।
चुनावी दौरे पर मध्य प्रदेश आए जवाहरलाल नेहरू चाहते थे कि किसी तरह सिंधिया घराने का साथ उन्हें मिल जाए तो ग्वालियर रियासत की सियासत में उनका दबदबा बन जाएगा। उस समय की ग्वालियर रियासत में लोकसभा की 8 और विधानसभा की 60 सीटें हुआ करती थीं। उन्हीं सीटों के लिए कांग्रेस महाराज जीवाजी राव सिंधिया का साथ चाहती थी। कहा जाता है कि महाराज सिंधिया कांग्रेस की नीतियों के विरुद्ध रहा करते थे।
हिंदू महासभा का दबदबा भी बढ़ रहा था। कांग्रेस भाप चुकी थी कि अगर सिंधिया परिवार को साथ नहीं लिया तो ग्वालियर रियासत में उसका हाथ कुछ नहीं लगेगा, क्योंकि जीवाजी राव हिंदू महासभा के पक्ष में थे। विजयाराजे सिंधिया के भाई ध्यानेंद्र सिंह ने एक इंटरव्यू में यह बताया था।
कांग्रेस पर इसका दबाव बढ़ रहा था। जीवाजी राव राजनीति से दूर रहना चाहते थे, लेकिन कांग्रेस के नेताओं की सिंधिया घराने में जीवाजी राव को अपने पक्ष में लाने की कवायद बढ़ने लगी थी। उसी समय राजमाता विजयाराजे सिंधिया दिल्ली पहुंची थीं और जवाहरलाल नेहरू से साफ इनकार कर दिया था कि इनके पति राजनीति में नहीं आना चाहते हैं। आगे की जिम्मेदारी काम गोविंद वल्लभ पंत और लाल बहादुर शास्त्री के कंधों पर आ चुकी थी। उन्हें न सिर्फ विजयाराजे सिंधिया को मनाना था, बल्कि इस बात के लिए भी राजी करना था कि वे जीवाजी राव को कांग्रेस के साथ लेकर आएं। जब विजयाराजे सिंधिया नहीं मानी तो उनके सामने कांग्रेस ने एक और प्रस्ताव रख दिया, जिससे इनकार नहीं कर सकीं। जीवाजी राव को राजनीति में नहीं आए, लेकिन नेहरू के विशेष आग्रह के कारण विजयाराजे सिंधिया को राजनीति में खड़ा होना पड़ा।
विजयाराजे के मैदान में आते ही कांग्रेस का पलड़ा भारी हो गया। उन्होंने चुनाव में हिंदू महासभा के उम्मीदवार को हराया और पहली बार सिंधिया राजघराने से कोई सदस्य संसद तक पहुंचा। आगे सिंधिया परिवार के लिए राजनीति भी एक विरासत बन चुकी थी, क्योंकि मां के बाद बेटे माधव राव सिंधिया राजनीति के धुरंधर खिलाड़ी बनकर आए।
सब कुछ ठीक चल रहा था, तभी युवा कांग्रेस के नेता अर्जुन सिंह का पंचमढ़ी में आना हुआ था। वहां पर उन्होंने राजे-रजवाड़ों को जमकर कोसा। यह बात राजमाता को कतई बर्दाश्त नहीं हुई। यहीं से कांग्रेस से दूरी बन चुकी थी। समय के साथ विजयाराजे सिंधिया कांग्रेस के लिए चुनौती बनती चली गईं। यहां तक कि राजमाता ने कांग्रेस छोड़कर हिंदू महासभा को ज्वाइन कर लिया था।
कांग्रेस में गोविंद नारायण सिंह का भी दबदबा हुआ करता था। उन्हें राजमाता के करीबी नेताओं में गिना जाता था। अंदाजा इससे लगा सकते हैं कि वे विजयाराजे सिंधिया के इशारे पर कांग्रेस सरकार को भी गिराने के लिए तैयार थे। आखिरकार वह वक्त भी आया, जब 1967 में गोविंद नारायण सिंह ने कांग्रेस के 36 विधायकों को तोड़ लिया। इससे कांग्रेस की सरकार गिर गई।
यहां तक कहा जाता है कि तब के मुख्यमंत्री द्वारका प्रसाद मिश्र अपनी सरकार में मंत्री गोविंद नारायण सिंह को कम तवज्जो देते थे, जबकि उनके मुकाबले अर्जुन सिंह की हैसियत बढ़ रही थी। गोविंद नारायण सिंह को राजमाता का आशीर्वाद था और यही एक कारण बना कि वे मध्य प्रदेश के नए मुख्यमंत्री बन गए। कांग्रेस के साथ राजमाता का यह विवाद लंबे समय तक चलता रहा।
यहां तक कि जब इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लगाया, तो उनके निशाने पर ग्वालियर की महारानी थीं। विजयाराजे सिंधिया तब संसद में विपक्षी दल की नेता के साथ-साथ अपने क्षेत्र के आम लोगों के बीच लोकप्रिय थीं। राजमाता की भी गिरफ्तारी हुई थी और उन्हें दिल्ली की तिहाड़ जेल में डाल दिया गया था।
राजमाता राजपरिवार से थीं, उनके पास सब कुछ था, लेकिन आगे उन्होंने अपना जीवन एक मां की तरह जनसेवा में खपा दिया। चार दशकों की पग-पग पर उतार-चढ़ाव की राजनीति में पद की प्रतिष्ठा से दूर रहते हुए भी वे हमेशा सहज मातृत्व से दीप्त राजनीति बनी रहीं। 25 जनवरी 2001 में राजमाता के निधन के साथ ही सिंधिया राजमहल के एक युग का समापन हुआ।
--आईएएनएस
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