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नवरात्र : 4 आदिशक्तिपीठ और 18 महाशक्तिपीठों की उर्जा हो जाती हैं प्रबल, तांत्रिक साधना के विशेष केंद्र

 

नई दिल्ली, 18 अक्टूबर (आईएएनएस)। शारदीय नवरात्र के पावन अवसर पर देशभर में मां दुर्गा की श्रद्धापूर्वक पूजा-अर्चना की जा रही है। रविवार सुबह 8:27 बजे से अष्टमी तिथि का आरंभ हो गया। नवरात्र के दौरान देशभर के शक्तिपीठों और प्रमुख देवी मंदिरों में बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन और पूजा के लिए पहुंचते हैं।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अष्टमी तिथि का विशेष महत्व होता है। इस दिन शक्तिपीठों में श्रद्धा और भक्ति का वातावरण चरम पर पहुंच जाता है। श्रद्धालु मां भगवती के दर्शन कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं तथा आध्यात्मिक शांति और ऊर्जा का अनुभव करते हैं।

देशभर में स्थित 51 शक्तिपीठों की अपनी-अपनी धार्मिक मान्यता और विशेषता है, लेकिन चार आदि शक्तिपीठ तथा 18 महाशक्तिपीठों का महत्व विशेष रूप से माना जाता है। इन शक्तिपीठों में वर्षभर श्रद्धालु दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं तथा मां शक्ति का आशीर्वाद प्राप्त करने की कामना करते हैं।

चार आदि शक्तिपीठ देश के सबसे प्राचीन और प्रमुख शक्ति तीर्थों में गिने जाते हैं। इन्हें 'आदि शक्तिपीठ' इसलिए कहा जाता है, क्योंकि तांत्रिक और पौराणिक परंपराओं में इन्हें देवी शक्ति की आराधना के प्राचीनतम और प्रमुख केंद्रों के रूप में मान्यता प्राप्त है।

असम के गुवाहाटी में नीलाचल पर्वत पर स्थित आदि शक्तिपीठ के रूप में मां कामाख्या विराजमान हैं। यहां माता सती का योनी खंड (गर्भ) गिरा था। इस शक्तिपीठ को 51 शक्तिपीठों में सबसे ज्यादा शक्तिशाली और तांत्रिक साधना का प्रमुख केंद्र माना जाता है। देश-विदेश से तांत्रिक सिद्धि प्राप्त करने के लिए आते हैं। मां कामाख्या की पूजा और साधना में अष्टमी तिथि का अत्यंत विशेष और सर्वोच्च स्थान माना जाता है। अष्टमी तिथि को तंत्र साधना, मंत्र जप, और विशेष महापूजा (जैसे संतान प्राप्ति या मनोकामना पूर्ति अनुष्ठान) के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।

विमला शक्तिपीठ को आदि शक्तिपीठ माना जाता है। यहां माता सती की चरण गिरे थे। इस शक्तिपीठ के भैरव स्वयं भगवान विष्णु माने जाते हैं। शाक्त और वैष्णव परंपराओं का यहां अद्भुत संगम देखने को मिलता है। यह शक्तिपीठ श्री जगन्नाथ मंदिर परिसर के भीतर ही दक्षिण-पश्चिम कोने में रोहिणी कुंड के पास स्थित है। अष्टमी के दिन देवी के इस स्वरूप की विशेष आराधना से भक्तों को अनंत ऊर्जा और शुद्धि मिलती है। खास बात यह है कि जगन्नाथ मंदिर में भगवान को लगाया जाने वाला भोग तब तक 'महाप्रसाद' नहीं कहलाता, जब तक उसे पहले मां विमला को अर्पित न किया जाए।

मां तारा-तारिणी शक्तिपीठ को भी आदि शक्तिपीठ माना जाता है। यहां माता सती का वक्ष (स्तन) गिरा था, जिस कारण इसे 'स्तनपीठ' माना जाता है। नवरात्र के अष्टमी के दिन मां तारा और मां तारिणी की विशेष पूजा से समस्त प्रकार की दैवीय कृपा प्राप्त होती है। यह स्थान तंत्र पीठ के रूप में भी प्रसिद्ध है। अष्टमी की तिथि तांत्रिक साधना, होम और विशेष अनुष्ठानों के लिए अत्यंत फलदायी मानी जाती है।

कोलकाता की कालिका देवी शक्तिपीठ को भी आदि शक्तिपीठ माना जाता है। यहां माता सती के दाहिने पैर की अंगुलियां गिरी थीं। नवरात्र की महाष्टमी के दिन मां कालिका और आदिशक्ति के उग्र एवं करुणामय स्वरूप की आराधना की जाती है। महाष्टमी की रात्रि और दिन में की गई साधना से जीवन की गुप्त बाधाएं, नकारात्मक शक्तियां और मानसिक भय समाप्त होते हैं। तंत्र साधना और सामान्य भक्तों के लिए मां काली का सबसे बड़ा और प्रमुख सिद्ध पीठ माना जाता है।

वहीं, देशभर में 18 महाशक्तिपीठ हैं। आदि शंकराचार्य के स्तोत्र और विभिन्न पुराणों (जैसे स्कंद पुराण और देवी भागवत) में 18 प्रमुख शक्तिपीठों को अष्टादश महाशक्तिपीठ का दर्जा दिया गया है। ये स्थान ऊर्जा और दिव्यता के सर्वोच्च केंद्र माने जाते हैं। महाशक्तिपीठों को भी प्रमुख तांत्रिक साधना और असीम सिद्धि का स्थान माना गया है।

महा शक्तिपीठों की बात करें तो तमिलनाडु के कांचीपुरम में स्थित श्री कांची कामाक्षी अम्मन मंदिर में देवी कामाक्षी विराजमान हैं। पौराणिक मान्यता के अनुसार, यहां माता सती का नाभि गिरी थी। मां कामाक्षी को त्रिपुरसुंदरी और परब्रह्म स्वरूपिणी माना जाता है। अष्टमी के दिन की गई उपासना से साधक को असीम आत्मबल, मानसिक स्पष्टता और नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति मिलती है।

पश्चिम बंगाल के पांडुआ में स्थित श्रींखला शक्तिपीठ को महाशक्तिपीठ माना जाता है। आदि गुरु शंकराचार्य की ओर से रचित 'अष्टादश शक्तिपीठ स्तोत्र' में वर्णित हिंदू धर्म के 18 सबसे प्रमुख और पवित्र महाशक्तिपीठों में से एक है। यहां माता सती का उदर (पेट) गिरा था। श्रींखला देवी मंदिर में अष्टमी की पूजा करने से सांसारिक बंधनों और मोह-माया से मुक्ति मिलती है। नकारात्मक ऊर्जा और तांत्रिक बाधाओं का नाश होता है।

कर्नाटक के मैसूर में स्थित देवी चामुंडेश्वरी का मंदिर स्थित है। मां चामुंडा को 18 महा शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। मां चामुंडा देवी दुर्गा का ही एक उग्र और शक्तिशाली रूप है। मां चामुंडेश्वरी ने चंड और मुंड नामक असुरों का वध किया था, जिसके कारण इनका नाम चामुंडा पड़ा। इस दिन देवी की आराधना करने से आंतरिक विकारों (जैसे अहंकार, क्रोध, भय) का नाश होता है और शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है। मां चामुंडेश्वरी की उपासना से भक्तों को बल, साहस, आरोग्य और जीवन की बाधाओं से मुक्ति मिलती है।

आंध्र प्रदेश के आलमपुर में स्थित जगुलंबा देवी को 18 महाशक्तिपीठों में से एक माना जाता है। यहां माता सती के ऊपरी दांत गिरे थे। माता जोगुलंबा का स्वरूप अत्यंत उग्र, दिव्य और तांत्रिक ऊर्जा से परिपूर्ण है। वे शव पर विराजमान हैं, तथा उनके सिर पर बिच्छू, मेंढक और छिपकली सुशोभित हैं। यह रूप योग और तांत्रिक सिद्धियों की अधिष्ठात्री देवी का प्रतीक माना जाता है।

आंध्र प्रदेश के श्रीशैलम में मां भ्रामरांबा देवी का मंदिर स्थित है। मां भ्रामरांबा को 18 महाशक्तिपीठों में से एक माना जाता है। यहां माता सती की (गर्दन/कंठ) गिरी थी। नवरात्र की अष्टमी पर इनकी उपासना से जीवन के बड़े-बड़े संकट, शत्रुओं का पराभव और नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है। मांभ्रामरांबा की पूजा से परिवार में सुख-शांति, वैवाहिक जीवन में मधुरता, संतान सुख और अनातक/अदृश्य भय से रक्षा का वरदान मिलता है।

महाराष्ट्र के कोल्हापुर में स्थित अंबाबाई देवी विराजमान हैं। मान्यता है कि यहां देवी सती के तीनों नेत्र गिरे थे। इस शक्तिपीठ को भी महा शक्तिपीठों में माना जाता है। शारदीय नवरात्र की अष्टमी तिथि को अंबाबाई देवी का शृंगार और परंपरागत पूजा विशेष रूप से महिषासुरमर्दिनी के रूप में की जाती है। इस रूप में देवी शक्ति, वीरता और दुष्टों का नाश करने वाली योद्धा के रूप में प्रकट होती हैं।

महाराष्ट्र के नांदेड़ में माहुर में रेणुका देवी विराजमान हैं। रेणुका देवी को महाशक्तिपीठों में से एक माना जाता है। यहां माता सती का मस्तक गिरा था। नवरात्रि की अष्टमी तिथि पर रेणुका देवी की पूजा का विशेष आध्यात्मिक और पारिवारिक महत्व होता है। मान्यता है कि अष्टमी के दिन माता की आराधना करने से संतान सुख, स्वास्थ्य और भविष्य उज्ज्वल होता है।

मध्य प्रदेश के उज्जैन में स्थित गढ़कालिका (अवंती) का मंदिर है। गढ़कालिका देवी को महाशक्तिपीठों में से एक माना जाता है। यहां माता सती का ऊपरी होंठ गिरा था। गढ़कालिका को तंत्र-मंत्र की देवी माना जाता है। महाअष्टमी की रात्रि में यहां देश भर से तांत्रिक और साधक विशेष अनुष्ठान, हवन एवं तांत्रिक क्रियाएं करने के लिए एकत्रित होते हैं।

आंध्र प्रदेश के पीठापुरम में पुरुहुतिका देवी विराजमान हैं और देवी को महाशक्तिपीठों में से एक माना जाता है। यहां माता सती का बायां हाथ गिरा था। महाअष्टमी के दिन मंदिर में श्री पुरुहुतिका देवी की विशेष प्रार्थनाएं, वैदिक मंत्रोच्चार, और भव्य अर्पण/अनुष्ठान किए जाते हैं। मान्यता है कि नवरात्र की अष्टमी के दिन मां पुरुहुतिका देवी की पूजा करने से भक्तों के जीवन के संकट दूर होते हैं, आंतरिक शुद्धि होती है और सुख-शांति की प्राप्ति होती है।

उड़ीसा के जाजपुर में बिरजा/गिरिजा देवी का मंदिर है। बिरजा/गिरिजा देवी दुर्गा की ही एक रूप हैं। नवरात्र के दौरान गिरिजा माता मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना और अनुष्ठान किए जाते हैं। इन नौ दिनों में माता की उपासना करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है। इसके अतिरिक्त, पूर्णिमा, अष्टमी और शुक्रवार के दिन माता की पूजा करना अत्यंत शुभ माना जाता है।

आंध्र प्रदेश के द्राक्षरमन में मणिकांबा देवी विराजमान हैं। इनको अष्टदश महाशक्तिपीठों में से एक माना जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार, यहां माता सती का बायां गाल (या ऊपरी जबड़ा) गिरा था। यहां नवरात्र के आठवें दिन मां दुर्गा के आठवें स्वरूप मां महागौरी की पूजा होती है, जो पवित्रता, शांति और सुख-समृद्धि की प्रतीक हैं। मणिकांबा देवी को महाशक्ति का स्वरूप मानकर इस दिन विशेष अड़चन निवारण और वैदिक अनुष्ठान किए जाते हैं।

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में मां माधवेश्वरीदेवी (अलोपी देवी) को 18 महा शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। यहां माता सती की उंगलियां गिरी थीं। मान्यता है कि यहां माता सती का अंग गिरने के बाद वे अंतर्ध्यान हो गई थीं। इसलिए इन्हें 'अलोपी' कहा गया। यहां महागौरी के रूप में अष्टमी के दिन मां की पूजा की जाती है। मां महागौरी की आराधना से जीवन के सभी दुख, कष्ट और पाप नष्ट होते हैं। इनसे सुख-शांति, समृद्धि और मनचाहे विवाह का वरदान मिलता है।

हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा में मां ज्वालामुखी देवी विराजमान हैं। ज्वालामुखी को 18 महा शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, इस स्थान पर माता सती की जिह्वा (जीभ) गिरी थी। यहां देवी की कोई मूर्ति नहीं होती, बल्कि चट्टानों की दरारों से निकलने वाली नौ प्राकृतिक ज्योतियों (जो मां के नौ रूपों का प्रतीक हैं) की पूजा होती है। अष्टमी के दिन इन ज्योतियों का तेज और दिव्य प्रभाव बहुत प्रबल माना जाता है।

बिहार के गया में मां मङ्गलागौरी देवी विराजमान हैं। मङ्गलागौरी को 18 महा शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। यहां माता सती वक्ष (स्तन) गिरा था। मां का वक्ष स्थल ममता, पोषण और मातृत्व का प्रतीक है, इसलिए इस महा शक्तिपीठ को 'पालनहार पीठ' या 'पालनपीठ' भी कहा जाता है। मां दुर्गा के आठवें स्वरूप मां महागौरी की पूजा की जाती है, जिसे दुर्गा अष्टमी या महाअष्टमी के नाम से जाना जाता है।

उत्तर प्रदेश के वाराणसी में मां विशालाक्षी विराजमान हैं। विशालाक्षी देवी को 18 महाशक्तिपीठों में से एक माना जाता है। यहां माता सती का दाहिने कान का कुंडल गिरा था। नवरात्र की अष्टमी तिथि को मां दुर्गा के स्वरूप (विशेषकर महागौरी और शक्ति के विशालाक्षी रूप) की आराधना से विशेष फल प्राप्त होता है। मान्यता है कि विशालाक्षी माता की इस दिन पूजा करने से धन-ऐश्वर्य, भौतिक सुख-संपत्ति और विशेष रूप से आभूषणों व समृद्धि की प्राप्ति होती है।

कश्मीर में स्थित शारदा देवी को महा शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। नवरात्र के अष्टमी पर मां दुर्गा के आठवें स्वरूप मां महागौरी की विशेष पूजा की जाती है। मां महागौरी परम शांति, पवित्रता और सुंदरता की प्रतीक हैं।

श्रीलंका के त्रिंकोमाली में कोणेश्वरम मंदिर में स्थित शंकरीदेवी को महाशक्तिपीठों में से एक माना जाता है। नवरात्र के दौरान विशेष आकर्षण का केंद्र होता है, जहां अष्टमी और नवमी पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है।

--आईएएनएस

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