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नैन सिंह रावत : हिमालय नापने वाले पहले भारतीय, जिन्हें दुनिया 'पंडित' के नाम से जानती है

 

नई दिल्ली, 20 अक्टूबर (आईएएनएस)। जब सैटेलाइट नहीं थे, सही नक्शे नहीं थे, तब उत्तराखंड के एक पहाड़ी शिक्षक ने अपने पैरों से हिमालय को नाप दिया था। उस शख्सियत का नाम पंडित नैन सिंह रावत था।

पंडित नैन सिंह का जन्म 21 अक्टूबर 1830 को कुमाऊं के मिलम गांव में हुआ, जो आज पिथौरागढ़ जिले में है। उनकी जयंती के अवसर पर एक बार फिर उनका नाम चर्चा में है, क्योंकि भारत सरकार ने उनके अधूरे सर्वे को अब सैटेलाइट की मदद से पूरा तो कर लिया, लेकिन उनकी विधि आज भी भूगोल के इतिहास में चमत्कार मानी जाती है।

नैन सिंह रावत कोई अंग्रेज अधिकारी नहीं थे, बल्कि जोहार घाटी के एक साधारण व्यापारी परिवार से थे। उनके पिता अमर सिंह 'लाटा बूढ़ा' तिब्बत के व्यापारियों के साथ ऊन का व्यापार करते थे। उन्हें बचपन से ही तिब्बती भाषा, वेशभूषा और रास्तों की अच्छी समझ थी।

1858 में जब ब्रिटिश हुकूमत 'ग्रेट ट्रिगोनोमेट्रिकल सर्वे ऑफ इंडिया' कर रही थी, तब देहरादून में सर्वे के कर्नल मॉन्टगोमरी को ऐसे लोगों की तलाश थी, जो तिब्बत में घुसकर नक्शा बना सकें। अंग्रेजों को तिब्बत में जाने की अनुमति नहीं थी, तब दो भाइयों, मणि सिंह और नैन सिंह, को चुना गया।

देहरादून में उन्हें जासूसी और सर्वे की गुप्त ट्रेनिंग दी गई। इस ट्रेनिंग में हर कदम को बराबर रखने के लिए 33 इंच की माला के हर दाने पर 100 कदम गिनना, प्रार्थना चक्र में कागज नहीं, बल्कि सर्वे के नोट्स छिपाना, लकड़ी के बक्से में थर्मामीटर छिपाकर रखना ताकि ऊंचाई नापी जा सके और भिक्षुक के वेश में चलना ताकि किसी को शक न हो, शामिल था।

1865-66 में नैन सिंह ने काठमांडू से ल्हासा तक की यात्रा की। 1200 किलोमीटर की यात्रा में उन्होंने 300 से ज्यादा ऊंचाई वाले बिंदुओं की माप की और पूरे रास्ते में हर मील पर अक्षांश-देशांतर की गणना की। उन्होंने यह काम बिना किसी आधुनिक यंत्र के, केवल अपने कदमों और एक छिपे हुए कंपास की मदद से पूरा किया।

1867 में उन्होंने दूसरी बड़ी यात्रा ल्हासा से मानसरोवर और थांगला दर्रे तक की। इसी यात्रा में उन्होंने तिब्बत की सबसे बड़ी झीलों और ब्रह्मपुत्र नदी के उद्गम क्षेत्र का सटीक नक्शा बनाया। उनकी सबसे बड़ी देन तिब्बत की ऊंचाई और स्वर्ण नदी का पता लगाना थी। उन्होंने साबित किया कि त्सांगपो ही ब्रह्मपुत्र है।

उनकी खोजों से ब्रिटिश रॉयल जियोग्राफिकल सोसाइटी इतनी प्रभावित हुई कि 1877 में उन्हें 'पैट्रन मेडल' दिया गया, जो विक्टोरिया क्रॉस के समकक्ष सम्मान माना जाता था। रॉयल जियोग्राफिकल सोसाइटी ने उन्हें एक सोने की घड़ी भी भेंट की, जिस पर लिखा था, 'पंडित नैन सिंह को उनकी असाधारण खोज के लिए।' उस समय से वे 'पंडित' कहलाए।

भारत सरकार ने उन्हें गांव की जागीरदारी और 1,000 रुपए वार्षिक पेंशन भी प्रदान की थी। मुनस्यारी में उनके नाम पर 'पंडित नैन सिंह सर्वेयर पर्वतारोहण प्रशिक्षण संस्थान' स्थापित है। 2004 में भारत सरकार ने उनके सम्मान में डाक टिकट भी जारी किया था।

--आईएएनएस

केके/एबीएम