मुंगेर के बिहार स्कूल ऑफ योग में गुरु पूर्णिमा महोत्सव, 'पद्म भूषण' स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ने साधना और सेवा पर दिया बल
मुंगेर, 29 जुलाई (आईएएनएस)। बिहार के मुंगेर स्थित बिहार स्कूल ऑफ योग के सन्यास पीठ में आयोजित गुरु पूर्णिमा महोत्सव श्रद्धा, साधना और गुरु-शिष्य परंपरा के संदेश के साथ संपन्न हो गया। 26 जुलाई से शुरू हुए इस आयोजन में देश-विदेश से पहुंचे हजारों श्रद्धालुओं ने गुरु पादुका का दर्शन और पूजन कर आध्यात्मिक जीवन के मूल्यों को अपनाने का संकल्प लिया।
पूरे आयोजन के दौरान वैदिक मंत्रोच्चार, हवन, पूजन, भजन, आरती और ध्यान के कार्यक्रमों ने परिसर को भक्तिमय वातावरण से भर दिया। गुरु पूर्णिमा महोत्सव के अवसर पर परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ने कहा कि सन्यास पीठ केवल एक आश्रम नहीं, बल्कि गुरु के प्रति समर्पण, श्रद्धा और साधना का केंद्र है। उन्होंने कहा कि गुरु पूर्णिमा का उद्देश्य केवल गुरु की पूजा करना नहीं, बल्कि उनके आदर्शों और शिक्षाओं को अपने जीवन में उतारना है। यदि कोई व्यक्ति प्रतिदिन गुरु के एक उपदेश का भी ईमानदारी से पालन करे, तो उसके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन संभव है।
उन्होंने कहा कि गुरु व्यक्ति नहीं, बल्कि वह चेतना हैं, जो मनुष्य को अज्ञान से ज्ञान, अंधकार से प्रकाश और सीमितता से अनंतता की ओर ले जाती है। उन्होंने बताया कि वर्ष 2023 से 2031 तक स्वामी सत्यानंद सरस्वती की पद्म जयंती मनाई जा रही है। उनके अनुसार "पद्म" जागृत चेतना का प्रतीक है और यह श्रृंखला योग एवं आध्यात्मिक चेतना के प्रसार को समर्पित है।
स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ने इस वर्ष के गुरु पूर्णिमा महोत्सव की थीम 'चेतना का रूपांतरण' बताते हुए कहा कि मनुष्य का सबसे बड़ा संघर्ष बाहरी परिस्थितियों से नहीं, बल्कि अपने भीतर मौजूद क्रोध, अहंकार, लोभ, ईर्ष्या और नकारात्मक प्रवृत्तियों से होता है। योग और आध्यात्मिक जीवन का उद्देश्य इन विकारों का परिष्कार कर व्यक्ति को उसकी वास्तविक चेतना से जोड़ना है।
उन्होंने लोगों से सकारात्मक विचारों, रचनात्मक कार्यों और आत्मविकास की दिशा में आगे बढ़ने का आह्वान किया। उन्होंने यह भी कहा कि इस वर्ष का आयोजन कई कारणों से विशेष रहा। भगवान श्री तिरुपति बालाजी के मुंगेर आगमन तथा भगवान विश्वनाथ और भगवान जगन्नाथ की उपस्थिति से जुड़े आध्यात्मिक प्रसंगों ने श्रद्धालुओं की आस्था को और मजबूत किया।
महोत्सव के दौरान काशी से आए विद्वान आचार्यों ने वैदिक परंपरा के अनुसार गुरु पूजन, रुद्राभिषेक, हवन और अन्य धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराए। महामृत्युंजय मंत्र, गुरु स्तोत्र और शिव स्तुति के सामूहिक पाठ से पूरा परिसर आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर रहा। श्रद्धालुओं ने स्वामी सत्यानंद सरस्वती की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित करने के साथ गुरु पादुकाओं का पूजन किया। आयोजन के दौरान भक्ति संगीत और सामूहिक आरती भी आकर्षण का केंद्र रहे। श्रद्धालुओं ने गुरु चरणों में पुष्प अर्पित कर सेवा, संयम, सदाचार और साधना के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।
आयोजकों के अनुसार गुरु पादुका पूजन भारतीय परंपरा में ज्ञान, विनम्रता और आध्यात्मिक उत्तराधिकार का प्रतीक माना जाता है। सन्यास पीठ में आयोजित इस महोत्सव में भारत के विभिन्न राज्यों के अलावा यूरोप, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अमेरिका और एशिया के कई देशों से आए साधकों ने भाग लिया। आयोजन के माध्यम से गुरु-शिष्य परंपरा, योग और आत्मपरिवर्तन के संदेश को वैश्विक स्तर पर आगे बढ़ाने का आह्वान किया गया।
आयोजकों का कहना है कि वर्तमान समय में मानसिक तनाव और भौतिक प्रतिस्पर्धा के दौर में गुरु पूर्णिमा का संदेश व्यक्ति के आंतरिक विकास और संतुलित जीवन के लिए पहले से अधिक प्रासंगिक है।
--आईएएनएस
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