महासागरों की रक्षा का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा, जानें क्या है क्रायोस्फीयर
नई दिल्ली, 7 जून (आईएएनएस)। पृथ्वी पर मौजूद बर्फ सिर्फ ठंडे इलाकों की पहचान नहीं है, बल्कि यह पूरी दुनिया की जलवायु और महासागरों के संतुलन को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती है। इसी बर्फीले तंत्र को ‘क्रायोस्फीयर’ कहा जाता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि महासागरों का भविष्य काफी हद तक क्रायोस्फीयर की स्थिति पर निर्भर करता है। यही वजह है कि आज दुनियाभर में इसके संरक्षण और अध्ययन पर विशेष जोर दिया जा रहा है।
पृथ्वी पर बर्फ के सभी रूपों को मिलाकर क्रायोस्फीयर कहा जाता है। यह शब्द ग्रीक भाषा के ‘क्रियोस’ से लिया गया है, जिसका मतलब है बर्फीली ठंड। आज की जलवायु परिवर्तन की चर्चा में क्रायोस्फीयर बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हमारे महासागरों की सेहत और भविष्य से सीधे जुड़ा हुआ है।
क्रायोस्फीयर में शामिल हैं- जमीन पर पड़ी बर्फ, नदियों और झीलों की बर्फ, हमेशा जमी रहने वाली जमीन (पर्माफ्रॉस्ट), अंटार्कटिका और ग्रीनलैंड की विशाल हिम वॉल्स, हिमनद (ग्लेशियर), हिम शिखर, बर्फ के टुकड़े (आइसबर्ग) और समुद्री बर्फ। ये सभी मिलकर पृथ्वी के ठंडे इलाकों का निर्माण करते हैं।
अब सवाल है कि इसे महासागरों की रक्षा का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा, क्यों माना जाता है, क्रायोस्फीयर महासागरों के लिए क्यों इतना जरूरी है? यूनाइटेड नेशंस एजुकेशनल साइंटिफिक एंड कल्चरल ऑर्गनाइजेशन (यूनेस्को) के अनुसार, क्रायोस्फीयर महासागरों को नियंत्रित करने में बड़ी भूमिका निभाता है। ग्लेशियरों और हिम चादरों से पिघलकर आने वाला मीठा पानी महासागरों की धाराओं को प्रभावित करता है। समुद्री बर्फ सूरज की किरणों को (रिफ्लेक्ट) करती है, जिससे पृथ्वी का तापमान नियंत्रित रहता है। जब यह बर्फ पिघलती है तो समुद्र का जल स्तर बढ़ता है, जिससे तटीय इलाकों में बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है।
यूनेस्को के अनुसार, क्रायोस्फीयर में हो रहे तेज बदलाव पूरी दुनिया को प्रभावित कर रहे हैं। ग्लेशियर पिघल रहे हैं, समुद्री बर्फ कम हो रही है और पर्माफ्रॉस्ट पिघलने से बड़ी मात्रा में मीथेन गैस निकल रही है, जो जलवायु परिवर्तन को और तेज कर रही है। इन बदलावों से समुद्री जानवरों का पारिस्थितिक तंत्र बिगड़ रहा है, मछली पकड़ने वाले समुदायों की आजीविका प्रभावित हो रही है और तटीय शहरों पर खतरा मंडरा रहा है।
इसी समस्या को समझते हुए यूनेस्को ने अपने अंतर-सरकारी जल विज्ञान कार्यक्रम (आईएचपी) के तहत क्रायोस्फीयर साइंस के लिए कार्रवाई का दशक शुरू किया है। इसका उद्देश्य वैज्ञानिकों, सरकारों और स्थानीय समुदायों को एक साथ लाकर क्रायोस्फीयर के बदलाव को बेहतर तरीके से समझना और उसके अनुसार कदम उठाना है।
वैज्ञानिक लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि क्रायोस्फीयर में हो रहे बदलाव पहले से कहीं ज्यादा तेजी से हो रहे हैं। इसलिए अब समय आ गया है कि हम ग्लोबल वार्मिंग को कम करने, हरित ऊर्जा को बढ़ावा देने और प्रकृति संरक्षण के प्रयासों को मजबूत करें।
वहीं, यूनेस्को के अनुसार, जैसे-जैसे विश्व महासागर दिवस नजदीक आ रहा है, यह याद रखना बहुत जरूरी है कि महासागरों की रक्षा सिर्फ समुद्र में सफाई करने से नहीं, बल्कि क्रायोस्फीयर की सुरक्षा से भी शुरू होती है।
--आईएएनएस
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