महज 6000 रुपये में विकसित की गई ब्लाइंड मोड़ पर दुर्घटना रोकने वाली टेक्नोलॉजी
नई दिल्ली, 27 फरवरी (आईएएनएस)। भारत के एक राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईटी) के छात्रों व फैकल्टी ने एक ऐसी स्मार्ट तकनीक विकसित की है, जो सड़क के ब्लाइंड मोड़ पर ‘आंख’ बनकर काम करेगी। यानी सड़क के जिस ब्लाइंड मोड पर वाहन चालक सामने से आ रही दूसरी गाड़ी को देख नहीं पाता, वहां यह स्मार्ट रोडसाइड सिस्टम खतरे को पहचानकर पहले ही चेतावनी दे देगा।
यह महत्वपूर्ण रिसर्च राउरकेला स्थित राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान में की गई है। एनआईटी का यह स्मार्ट रोडसाइड सिस्टम केवल 6000 रुपये की लागत में तैयार किया जा सकता है। यह टेक्नोलॉजी ग्रामीण और पहाड़ी क्षेत्रों में विशेष रूप से उपयोगी साबित हो सकती है, जहां सड़कें संकरी हैं और दृश्यता कम होती है।
यह प्रणाली उन क्षेत्रों में भी उपयोगी है जहां दृश्यता कम है और बुनियादी ढांचा सीमित है, जिससे दुर्घटनाओं का जोखिम काफी बढ़ जाता है। अब शोध दल ऐसी उन्नत व्यवस्था पर काम कर रहा है, जिसमें सड़क किनारे लगी निगरानी प्रणाली और वाहन में लगे सेंसर मिलकर एक बड़ा सिक्योरिटी नेट तैयार करेंगे। यदि यह व्यवस्था बड़े पैमाने पर लागू होती है, तो अंधे मोड़ों पर होने वाली दुर्घटनाओं में काफी कमी लाई जा सकेगी।
वहीं, आपात स्थिति में मदद भी पहले से कहीं अधिक तेजी से पहुंच सकेगी। रिसर्च टीम के अनुसार यह पूरी व्यवस्था सड़क किनारे लगाई जाती है। मोड़ के पास विशेष स्थानों पर लगाए गए सेंसर कैमरे लगातार निगरानी करते हैं। जैसे ही कोई वाहन मोड़ की ओर बढ़ता है, यह प्रणाली उसकी रफ्तार और दूरी का अनुमान लगा लेती है। यदि टक्कर का खतरा बनता है, तो तुरंत ध्वनि और प्रकाश संकेत देकर चालक को सावधान कर दिया जाता है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि ये कैमरे लाइव वीडियो के जरिए आने-जाने वाले वाहनों पर नजर रखते हैं। कंप्यूटर विजन एल्गोरिद्म की मदद से सिस्टम यह पहचान लेता है कि कौन सा वाहन ब्लाइंड कॉर्नर की तरफ बढ़ रहा है, उसकी गति कितनी है और वह अभी कितनी दूरी पर है। जैसे ही कोई वाहन खतरे वाले क्षेत्र में पहुंचता है, सिस्टम तुरंत ऑडियो और विजुअल अलर्ट जारी कर देता है। यानी चालक को पहले ही सावधान कर दिया जाता है ताकि टक्कर से बचा जा सके।
इस शोध में एनआईटी राउरकेला के इलेक्ट्रॉनिक्स एवं संचार अभियांत्रिकी विभाग से के.एल. संजीव टुडू (बीटेक स्नातक), प्रो. संतोष कुमार दास, प्रोफेसर उमेश चंद्र पाटी, प्रोफेसर पूनम सिंह, शोध स्नातक डॉ. गौतम कुमार साहू और डॉ. रश्मिरंजन नायक शामिल हैं। इन्होंने ने जो तकनीक विकसित की है, वह सड़क के अंधे मोड़ों पर होने वाली दुर्घटनाओं को रोकने में मदद करेगी। यह व्यवस्था उस वाहन को भी पहचान लेती है, जो मोड़ के दूसरी ओर से आ रहा होता है।
इस सिस्टम की खास बात यह है कि डेटा को दूर स्थित सर्वर पर भेजने की जरूरत नहीं पड़ती। कैमरों के पास लगे छोटे प्रोसेसर पर ही डेटा की प्रोसेसिंग हो जाती है। इससे देरी नहीं होती और चेतावनी तुरंत मिलती है। यानी सारी गणना और विश्लेषण वहीं पर लगे छोटे उपकरण में ही हो जाता है। जानकारी को कहीं और नहीं भेजना पड़ता। इससे कीमती समय की बचत होती है।
वैज्ञानिकों ने इसके लिए एक ऐसा निगरानी मंच भी तैयार किया है, जिससे यातायात नियंत्रण कक्ष में बैठे अधिकारी भी अंधे मोड़ों की स्थिति पर नजर रख सकें। यह शोध प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। संस्थान के निदेशक का कहना है कि यह गर्व की बात है कि छात्र और शिक्षक मिलकर ऐसे उपयोगी आविष्कार कर रहे हैं, जो सीधे समाज के काम आ रहे हैं। शोध दल के सदस्यों का कहना है कि वास्तविक परिस्थितियों में किए गए परीक्षणों में यह प्रणाली सफल रही है। कम क्षमता वाले उपकरणों पर भी इसका प्रदर्शन अच्छा रहा, जिससे यह कम खर्च में तैयार होकर बड़े स्तर पर लागू की जा सकती है।
इसमें ऐसे विशेष सेंसर लगाए जाते हैं, जो झटके और स्थान की जानकारी को समझते हैं। जैसे ही दुर्घटना होती है, यह प्रणाली तुरंत पुलिस, अग्निशमन दल, एम्बुलेंस सेवा और नजदीकी अस्पताल को सूचना भी भेज सकती है। यानी स्मार्ट रोडसाइड सिस्टम ब्लाइंड कॉर्नर के आसपास देख सकता है और चालकों को सामने से आने वाले उस वाहन की चेतावनी दे सकता है, जिसे वे अपनी आंखों से नहीं देख पाते। इंटरनेट ऑफ थिंग्स और एज कंप्यूटिंग तकनीक को रोडसाइड यूनिट्स तथा छोटे ऑन-साइट प्रोसेसर के साथ एकीकृत करके यह ढांचा तीखे मोड़ों के पास स्थापित किया जा सकता है। लगभग 6000 की एकमुश्त अनुमानित लागत पर विकसित इस तकनीक का पेटेंट किया गया है।
--आईएएनएस
जीसीबी/डीएससी