×

'कोई चालक नहीं है': यूसीएल में आचार्य प्रशांत और न्यूरोसाइंटिस्ट स्टीव फ्लेमिंग का संवाद, अहम की प्रकृति पर पड़ताल

 

लंदन,10 जुलाई (आईएएनएस)। दार्शनिक एवं लेखक आचार्य प्रशांत और प्रतिष्ठित कॉग्निटिव न्यूरोसाइंटिस्ट प्रोफेसर स्टीव फ्लेमिंग ने 9 जुलाई की शाम यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन (यूसीएल) में आत्म-ज्ञान, मेटाकॉग्निशन और चेतना पर एक सार्वजनिक संवाद किया। "थिंकिंग अबाउट थिंकिंग " शीर्षक से आयोजित यह सत्र आचार्य प्रशांत की ब्रिटेन यात्रा की अंतिम कड़ी था, जिसके अंतर्गत वे इससे पूर्व कैंब्रिज यूनियन, ऑक्सफोर्ड, हाउस ऑफ लॉर्ड्स, क्वीन मेरी यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन और लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स में श्रोताओं को संबोधित कर चुके हैं।

छात्रों से खचाखच भरे सभागार में दोनों वक्ताओं के मंच पर आते ही देर तक तालियां गूंजती रहीं और संवाद के बाद चला प्रश्नोत्तर सत्र निर्धारित समय से काफी आगे तक जारी रहा। सत्र का संचालन यूसीएल में कम्प्यूटेशनल कॉग्निशन की प्रोफेसर डॉ. मेगन पीटर्स ने किया, जिनका शोध मेटाकॉग्निशन, सब्जेक्टिव अनुभव और चेतना पर केंद्रित है। परिचय देते हुए उन्होंने कहा कि आत्म-जागरूकता मानव जिज्ञासा के सबसे प्राचीन विषयों में से एक है, और बीते कुछ दशकों में मेटाकॉग्निशन एक प्रयोगसिद्ध विज्ञान बन चुका है, जिससे मस्तिष्क पर आधारित यह शोध उन चिंतन-परंपराओं से सीधा संवाद कर सकता है जो सहस्राब्दियों से अहम् की पड़ताल करती आई हैं। उन्होंने आचार्य प्रशांत का परिचय वाटकिन्स 2026 सूची में विश्व के सर्वाधिक प्रभावशाली जीवित विचारकों में एक के रूप में दिया, जो इस क्षेत्र के सौ सर्वाधिक प्रभावशाली जीवित व्यक्तित्वों की वार्षिक सूची है, और जिनका कार्य दस करोड़ से अधिक लोगों तक पहुंचता है।

प्रोफेसर फ्लेमिंग यूसीएल के इंस्टीट्यूट ऑफ कॉग्निटिव न्यूरोसाइंस में प्रोफेसर तथा मैक्स प्लांक–यूसीएल सेंटर फॉर कम्प्यूटेशनल साइकिएट्री में ग्रुप लीडर हैं। मेटाकॉग्निशन और चेतना पर उनके कार्य को रॉयल सोसाइटी के फ्रांसिस क्रिक मेडल एवं व्याख्यान सहित कई सम्मान मिल चुके हैं, और उनकी पुस्तक "नव थे सेल्फ : द साइंस ऑफ सेल्फ अवेयरनेस" का सात भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। अपनी बात आरंभ करते हुए उन्होंने कहा कि मनुष्य का मन केवल बाहरी संसार का मॉडल ही नहीं बनाता, बल्कि उस मॉडल में स्वयं को भी रख देता है, जिससे मस्तिष्क अपने ही कार्य-व्यवहार पर निगरानी रख पाता है, यद्यपि स्वयं के बारे में उसकी यह जानकारी सदैव सटीक या उपयोगी हो, यह आवश्यक नहीं।

आचार्य प्रशांत ने मेटाकॉग्निशन और आत्म-ज्ञान के भेद को एक रूपक से स्पष्ट किया, जिसे उन्होंने और कई बार दोहराया। उन्होंने कहा कि एक वाहन में इंजन गति उत्पन्न करता है, जो फर्स्ट-ऑर्डर वेरिएबल है, जबकि डैशबोर्ड पर लगा स्पीडोमीटर उसी गति को मापता है, अर्थात प्रणाली का एक हिस्सा दूसरे हिस्से को पढ़ता है। इस दूसरे स्तर की रीडिंग को उन्होंने विज्ञान की भाषा में "कॉन्फिडेंस" कहा, जबकि बाहर खड़ी रडार गन वास्तविक गति, यानी "ग्राउंड ट्रुथ" बताती है। उन्होंने कहा कि स्पीडोमीटर और रडार गन के बीच बना निरंतर अंतर मेटाकॉग्निटिव बायस है, और दोनों का साथ-साथ चलना मेटाकॉग्निटिव सेंसिटिविटी। " यह पढ़ना एक रिपोर्ट है, चुनाव नहीं," उन्होंने कहा, "और इसमें से कुछ भी चालक की ओर संकेत नहीं करता।" उन्होंने कहा कि प्रणाली का प्रणाली को पढ़ना मेटाकॉग्निशन है, जबकि चालक का स्वयं की जांच करना और अंततः यह पाना कि कोई चालक है ही नहीं, आत्म-ज्ञान है।

प्रोफेसर फ्लेमिंग ने रूपक की सराहना करते हुए कहा कि वे इसे अपने व्याख्यानों में प्रयोग करेंगे। उन्होंने बताया कि प्रयोगों में अक्सर देखा जाता है कि व्यक्ति का आत्मविश्वास उसके वास्तविक प्रदर्शन से अलग हो जाता है और ऐसी स्थितियां प्रायः प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स से जुड़ी होती हैं, जो स्वयं के बारे में हमारे आंतरिक मॉडल के निर्माण में भूमिका निभाता है। उन्होंने रूपक में एक संशोधन भी जोड़ा और कहा कि मस्तिष्क में इंजन से अलग कोई डैशबोर्ड नहीं होता, क्योंकि स्पष्ट और अस्पष्ट मेटाकॉग्निशन, दोनों एक ही फिज़िकल हार्डवेयर के भिन्न स्तर हैं।

आचार्य प्रशांत ने कहा कि मस्तिष्क कष्ट नहीं भोगता। "शरीर पीड़ा अनुभव कर सकता है, पर भीतर कोई और है जो रात के तीन बजे जागकर कहता है कि मैं अकेला हूं, अतीत की स्मृतियां मुझे सताती हैं, भविष्य का मैं क्या करूं," उन्होंने कहा। "यह कष्ट भोगने वाला शरीर में कहीं स्थित नहीं किया जा सकता, और यही वह है जिसका अध्ययन आत्म-ज्ञान का क्षेत्र करता है।"

उन्होंने कहा कि यह अहंकार स्वयं की ओर ही इशारा करता है और स्वयं को ही प्रमाणित करता है, जो "मेरा विचार, मेरा शरीर" कहकर हर क्रिया पर स्वामित्व का दावा करता है। उन्होंने इसे प्रणाली में एक "कम्प्यूटेशनल एरर" बताया, कुछ ऐसा जैसे दो और दो को पांच मान लेना, जिसका अस्तित्व नहीं होता, फिर भी जिस पर विश्वास किया जा सकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह "कोई और" शरीर में छिपा कोई तत्व नहीं, बल्कि उनके रूपक का वही चालक है, विश्वास के रूप में सच्चा और सत्ता के रूप में असत्य, और आत्म-ज्ञान इसी दावेदार की पड़ताल करता है। स्मृति की ओर मुड़ते हुए उन्होंने कहा कि दिनभर की असंख्य छापों में से जो कुछ शेष रह जाता है, वह तटस्थ नहीं होता। "यह चुनाव मस्तिष्क नहीं करता," उन्होंने कहा। "कोई और करता है, जो वही रखता है जो उसकी अपनी पहचान से मेल खाए।"

प्रोफेसर फ्लेमिंग ने कहा कि यह दृष्टिकोण उन्हें दार्शनिक डेनियल डेनेट की "यूज़र इल्यूज़न" की अवधारणा के निकट लगता है, जिसके अनुसार यह भाव कि कहीं भीतर एक स्थान है जहां सब कुछ आकर मिलता है, स्वयं एक रचना मात्र है, जिसे विचारकों ने सदियों खोजा पर कभी नहीं पाया। किंतु उन्होंने जोड़ा कि अपनी कहानी गढ़ने का यह भाव भी मस्तिष्क की कार्यप्रणाली में ही आधारित है। उदाहरण के रूप में उन्होंने विभाजित-मस्तिष्क पर हुए उन प्रसिद्ध प्रयोगों का उल्लेख किया, जिनमें मस्तिष्क का एक गोलार्ध दूसरे गोलार्ध के किए की मनगढ़ंत व्याख्या रच लेता था, जिससे पता चलता है कि ऐसे आख्यान भी मस्तिष्क के भीतर ही रचे जाते हैं।

आचार्य प्रशांत ने उत्तर में कहा कि प्रणाली की सटीकता संरचनात्मक होती है, पर ईमानदारी सदा एक चुनाव है। उन्होंने कहा, "यह सटीकता नहीं, यह ईमानदारी है। सटीकता संरचनात्मक है। मैं एक अत्यंत सटीक प्रणाली बना सकता हूं, पर ईमानदारी सदैव एक चुनाव है, इरादे की बात है। यह किसी बनावट का उत्पाद नहीं हो सकती।"

उन्होंने चेताया कि अहंकार से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह स्वयं अपनी जांच निष्पक्ष रूप से करेगा, क्योंकि वह स्वयं को देखने के लिए नहीं, स्वयं को बचाने के लिए बना है। यहां तक कि "अहंकार" शीर्षक वाली पुस्तक पढ़ता अहंकार भी, उन्होंने कहा, केवल स्वयं को सुरक्षित रखने के लिए पढ़ता है।

इसी कारण उन्होंने एक बाहरी, तटस्थ दर्पण की आवश्यकता पर बल दिया, जो उनके रूपक की रडार गन के समान हो। उन्होंने इसे "सामने खड़ा एक दर्पण" कहा, "चाहे वह सच्चा मित्र हो, कोई श्रेष्ठ पुस्तक हो, या शिक्षक जो उपदेशक नहीं बल्कि दर्पण हो।" उन्होंने एक हिंदी पंक्ति भी कही, "किसी पर भरोसा कर लो, खुद पर मत करना," जिसका आशय उन्होंने यह बताया कि स्वयं को निरंतर परखते रहना चाहिए। उन्होंने जोड़ा कि यह बाहरी दर्पण आंतरिक ईमानदारी का विकल्प नहीं, क्योंकि ईमानदारी के अभाव में व्यक्ति दर्पण को ही तोड़ देता है।

प्रश्नोत्तर सत्र में छात्रों की ओर से हृदय और मस्तिष्क के संबंध, कृत्रिम बुद्धिमत्ता में चेतना, और परसेप्शन की विश्वसनीयता जैसे विषय उठे। प्रोफेसर फ्लेमिंग ने कहा कि शरीर और मस्तिष्क घनिष्ठ रूप से जुड़े हैं, और हृदय की धड़कन के विभिन्न चरण बाहरी संसार के प्रति हमारी संवेदनशीलता को प्रभावित करते हैं। उन्होंने यह भी सुझाया कि सब्जेक्टिव अनुभव का "हार्ड प्रॉब्लम" संभवतः विज्ञान द्वारा हल किया जाने वाला प्रश्न नहीं, बल्कि एक नैतिक प्रश्न है।

जब एक श्रोता ने अहंकार के शांत पड़ जाने की बात कही, तो आचार्य प्रशांत ने कहा कि उसका मिट जाना भी किसी न किसी के द्वारा दर्ज किया जाता है। उन्होंने कहा, "यह तो अहंकार का स्वयं को अपना मृत्यु-प्रमाणपत्र जारी करने जैसा है।" मशीन-चेतना पर उन्होंने कहा कि वस्तुतः जिसे परखा जा रहा है, वह समानता है, और समानता की नकल सदा संभव है। "पहला प्रश्न तो यह है कि क्या हम स्वयं सचेत हैं," उन्होंने कहा। वे बार-बार एक ही केंद्रीय प्रश्न पर लौटते रहे। "यह सब किसके लिए है? कौन है जो कहता है कि मैं मर रहा हूं, मैं अकेला हूं?" उन्होंने कहा कि वही कष्ट भोगने वाला है, और वही आत्म-ज्ञान का असली विषय है।

संवाद को समापन की ओर ले जाते हुए आचार्य प्रशांत ने सोच और बोध के भेद पर बात की। उन्होंने कहा कि सोचना प्रणाली का स्वाभाविक गुण है, और मधुमक्खियां तक बिना भाषा के सोचती और परस्पर सहयोग करती हैं। इसी संदर्भ में उन्होंने क्वीन मेरी यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन में प्रोफेसर लार्स चिटका के साथ हुई अपनी हालिया बातचीत का उल्लेख किया, जिनका शोध मधुमक्खियों के व्यवहार और संज्ञान पर केंद्रित है। "पर बोध प्रणाली की कोई क्रिया नहीं है," उन्होंने कहा। "बोध तो उस घुसपैठिये का पीछे हट जाना है जो दृष्टि को विकृत करता है।" उन्होंने कहा कि व्यक्ति अपने बारे में पहले से बहुत कुछ जानता है, पर अहंकार उस जानने को रोक देता है, और जब वह पीछे हटता है, तभी बोध उतरता है। "देखने वाला देखने की क्रिया से बच नहीं पाता," उन्होंने कहा। "यदि देखने का सच्चा इरादा हो, तो वह देखना ही तुम्हें घोल देगा।"

कार्यक्रम के बाद मीडिया से बातचीत में आचार्य प्रशांत ने कहा कि वे और प्रोफेसर फ्लेमिंग एक ही शिखर पर पहाड़ी के दो अलग-अलग छोरों से चढ़ रहे थे। "प्रोफेसर फ्लेमिंग गाड़ी की जांच कर रहे हैं और उसे स्वचालित पा रहे हैं," उन्होंने कहा। "इसका अर्थ यह नहीं कि गाड़ी सदा सटीक है, बल्कि यह कि उसे समझने के लिए किसी बाहरी चालक की ज़रूरत नहीं। मेरा काम उसी चालक को सीधे संबोधित करना है, जो कहता है कि मैं जीवन का स्वामी हूं, मैं ही कर्ता हूं, और उससे पूछना कि क्या तुम वास्तविक हो, क्या तुम्हारी ज़रूरत है।" उन्होंने इसे एक ही सिक्के के दो पहलू बताया।

यात्रा के दौरान आचार्य प्रशांत ने प्रोफेसर जोनाथन बर्च, क्वीन मैरी यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन के प्रोफेसर लार्स चिटका, मनोवैज्ञानिक डॉ. मेलानी जॉय, कैंब्रिज-प्रशिक्षित जीवविज्ञानी एवं रॉयल सोसाइटी के पूर्व रिसर्च फेलो रूपर्ट शेल्ड्रेक, तथा अद्वैत-चिंतक रूपर्ट स्पाइरा के साथ भी संवाद किए। इसी दौरान वे पेटा के लंदन कार्यालय और आध्यात्मिक साहित्य की लंदन की सबसे पुरानी दुकान वॉटकिंस बुक्स भी गए, जहां पाठक उनकी पुस्तकों पर हस्ताक्षर लेने के लिए कतार में लगे। आगे की योजनाओं पर उन्होंने बताया कि भारत में दो बड़े आयोजन प्रस्तावित हैं, वे अपनी आगामी पुस्तक "बीइंग विदाउट बीइंग" पर कार्य कर रहे हैं और लंदन के लिए कुछ और कार्यक्रमों पर सितंबर-अक्टूबर हेतु विचार चल रहा है।

आचार्य प्रशांत आईआईटी दिल्ली और आईआईएम अहमदाबाद के पूर्व छात्र तथा प्रशांत अद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। भारतीय एवं वैश्विक दर्शन पर आधारित उनका कार्य सोशल मीडिया पर 10 करोड़ से अधिक लोगों तक पहुंचता है। हाल ही में उन्हें वाटकिन्स 2026 सूची में विश्व के सर्वाधिक प्रभावशाली जीवित विचारकों में सम्मिलित किया गया है।

--आईएएनएस

एसके/