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रसोई का बजट बिगड़ा! महाराष्ट्र-कर्नाटक से सप्लाई घटने पर प्याज ₹54 के पार, राहत की उम्मीद जल्द

 

देशभर में प्याज की बढ़ती कीमतों ने आम लोगों की रसोई का बजट बिगाड़ दिया है। जून से सितंबर के बीच प्याज के दामों में तेज उछाल देखने को मिला है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 1 जून को प्याज का औसत खुदरा भाव 29.50 रुपये प्रति किलो था, जो 17 सितंबर तक बढ़कर 53.78 रुपये प्रति किलो पहुंच गया।

यानी करीब साढ़े तीन महीने के दौरान प्याज की कीमत में 82.3 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई। खुदरा बाजार में बढ़े दाम का सीधा असर घरों के मासिक बजट पर देखने को मिल रहा है।

थोक बाजार में लगभग दोगुने हुए दाम

प्याज की कीमतों में तेजी सिर्फ खुदरा बाजार तक सीमित नहीं है। थोक मंडियों में भी इसके भाव में बड़ा उछाल आया है।

1 जून को प्याज का औसत थोक भाव करीब 22.60 रुपये प्रति किलो था। इसके बाद 10 सितंबर को यह बढ़कर 46.20 रुपये प्रति किलो पहुंच गया। 17 सितंबर को थोक भाव करीब 45.68 रुपये प्रति किलो दर्ज किया गया।

यानी जून की तुलना में थोक बाजार में प्याज के दाम लगभग दोगुने स्तर तक पहुंच गए हैं।

महाराष्ट्र और कर्नाटक से कम हुई सप्लाई

प्याज के दाम बढ़ने के पीछे कई वजहें बताई जा रही हैं। महाराष्ट्र में गर्मियों की फसल को नुकसान पहुंचने और मंडियों में आवक कम होने से सप्लाई प्रभावित हुई है।

इसके अलावा कर्नाटक से भी प्याज की आवक कम हुई है। दूसरी ओर, नई खरीफ फसल बाजार में आने में देरी हो रही है। ऐसे में मांग के मुकाबले सप्लाई कम होने से कीमतों पर दबाव बढ़ा है।

हालांकि, नई फसल की आवक बढ़ने के बाद आने वाले समय में प्याज की कीमतों में राहत मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।

सरकार महंगा प्याज रोकने के लिए क्या करती है?

प्याज की कीमतों में अचानक तेजी आने पर सरकार बाजार में हस्तक्षेप करती है। इसके लिए प्याज का बफर स्टॉक तैयार किया जाता है।

जब बाजार में प्याज के दाम बढ़ने लगते हैं, तो सरकार अपने स्टॉक से प्याज निकालकर कम कीमत पर बिक्री करती है। इससे बाजार में सप्लाई बढ़ाने और खुदरा कीमतों को नियंत्रित करने की कोशिश की जाती है।

कई मौकों पर सरकार बफर स्टॉक का प्याज करीब 35 रुपये प्रति किलो की दर से भी उपलब्ध करा चुकी है।

जरूरत पड़ने पर एक्सपोर्ट पर भी कदम

देश में प्याज की उपलब्धता बनाए रखने के लिए सरकार जरूरत के मुताबिक निर्यात नीति में बदलाव भी करती है। घरेलू बाजार में कमी की स्थिति बनने पर निर्यात पर शुल्क बढ़ाने या अन्य प्रतिबंधात्मक कदमों के जरिए देश के अंदर सप्लाई बनाए रखने की कोशिश की जाती है।

इसका उद्देश्य घरेलू बाजार में प्याज की उपलब्धता बढ़ाना और कीमतों पर दबाव कम करना होता है।

अगस्त-सितंबर में क्यों बढ़ते हैं प्याज के दाम?

प्याज की कीमतों में अगस्त और सितंबर के आसपास तेजी कोई नई बात नहीं है। इस समय कई कारण एक साथ काम करते हैं।

1. त्योहारों में बढ़ जाती है मांग

रक्षाबंधन, गणेश उत्सव और आने वाले त्योहारों के दौरान कई जगहों पर खाद्य पदार्थों की खपत बढ़ती है। इससे प्याज की मांग भी बढ़ सकती है।

2. बारिश से सप्लाई प्रभावित

मानसून के दौरान लगातार बारिश होने पर फसल की ढुलाई और मंडियों तक प्याज पहुंचाने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। इससे कुछ इलाकों में आवक कम होने पर कीमत बढ़ सकती है।

3. पुरानी फसल और नई फसल के बीच गैप

इस समय पुरानी फसल का स्टॉक धीरे-धीरे कम होने लगता है, जबकि नई खरीफ फसल की आवक में समय लगता है। इसी अंतर के दौरान बाजार में सप्लाई का दबाव बन सकता है।

आगे क्या होगा?

फिलहाल प्याज के बढ़े हुए दाम से आम उपभोक्ताओं को राहत नहीं मिली है। हालांकि, नई खरीफ फसल की आवक बढ़ने और बाजार में सप्लाई सुधरने पर कीमतों में नरमी आने की उम्मीद है।

अब नजर इस बात पर है कि नई फसल मंडियों में कितनी तेजी से पहुंचती है और सरकार बफर स्टॉक के जरिए बाजार में कितनी सप्लाई बढ़ाती है। अगर आवक बढ़ती है, तो आने वाले समय में प्याज की बढ़ती कीमतों से आम लोगों को कुछ राहत मिल सकती है।