किसान सबसे बड़ा वैज्ञानिक है, जो मौसम के मिजाज और मिट्टी की नब्ज को समझता है: विजय सिन्हा
पटना, 20 जून (आईएएनएस)। बिहार सरकार के कृषि मंत्री विजय कुमार सिन्हा ने शनिवार को बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर के विभिन्न कार्यक्रमों, परियोजनाओं एवं इकाइयों का उद्घाटन किया तथा विश्वविद्यालय की महत्वपूर्ण गतिविधियों में भाग लिया। उनके दौरे की शुरुआत प्रधानमंत्री के आह्वान पर चल रहे अभियान 'एक पेड़ मां के नाम' के अंतर्गत पौधरोपण से हुई। इस अवसर पर कृषि मंत्री सहित अन्य अतिथियों ने सिंदूर के पौधे लगाए।
इसके उपरांत मंत्री ने बिहार कृषि विश्वविद्यालय के विस्तारित एवं संवर्धित मधु प्रसंस्करण इकाई का उद्घाटन किया। इस विस्तार के बाद विश्वविद्यालय की मधु प्रसंस्करण क्षमता 2 क्विंटल प्रति छह घंटे से बढ़कर 6 क्विंटल प्रति छह घंटे हो गई है, जिससे शहद प्रसंस्करण की क्षमता में तीन गुना वृद्धि हुई है।
मंत्री के उद्घाटन के साथ ही बिहार कृषि विश्वविद्यालय में प्रसंस्करण उपरांत शहद की बॉटलिंग, कैपिंग, सीलिंग एवं लेबलिंग की पूरी प्रक्रिया स्वचालित हो गई है। इस प्रक्रिया में किसी प्रकार का मानवीय संपर्क नहीं होगा, जिससे उत्पादित शहद की स्वच्छता, गुणवत्ता एवं खाद्य सुरक्षा मानकों में उल्लेखनीय सुधार होगा।
कृषि मंत्री ने विश्वविद्यालय में स्थापित आणविक पादप रोग प्रयोगशाला का भी उद्घाटन किया। यह प्रयोगशाला पादप रोगों की आधुनिक एवं वैज्ञानिक जांच तथा अनुसंधान गतिविधियों को नई गति प्रदान करेगी।
कृषि मंत्री ने विश्वविद्यालय में आयोजित 31वीं शोध परिषद् की बैठक में भी भाग लिया तथा वैज्ञानिकों एवं किसानों को संबोधित किया। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि स्थापना के मात्र 15 वर्षों के भीतर बिहार कृषि विश्वविद्यालय ने बिहार की कृषि को उन्नत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय ने विभिन्न उत्पादों को जीआई टैग दिलाकर बिहार के किसानों के उत्पादों को राष्ट्रीय पहचान और सम्मान प्रदान किया है।
उन्होंने कहा कि किसान सबसे बड़ा वैज्ञानिक होता है, जो मौसम के मिजाज और मिट्टी की नब्ज को समझता है। उन्होंने वैज्ञानिकों को सुझाव दिया कि अनुसंधान पूरी तरह किसानोपयोगी होना चाहिए तथा कृषि विज्ञान की भाषा को सरल एवं देशज शब्दों पर आधारित बनाया जाना चाहिए ताकि किसान आसानी से उसे समझ सकें। उन्होंने प्रधानमंत्री के 'लैब टू लैंड' मिशन को सफल बताते हुए कहा कि इसका प्रत्यक्ष लाभ किसानों तक पहुंच रहा है।
मंत्री ने कहा कि किसी भी शोध की वास्तविक सफलता तब मानी जाएगी जब वह किसानों के कंधों से खेती का बोझ कम करे। उन्होंने वैज्ञानिकों से आग्रह किया कि विश्वविद्यालय में विकसित शोध, तकनीक एवं नवाचार किसानों तक पहुंचे और उनके जीवन में सकारात्मक बदलाव लाए। उन्होंने विश्वविद्यालय द्वारा प्राप्त पेटेंट को किसानों के हित में उपयोगी बनाने पर बल दिया।
उन्होंने कृषि पर पड़ने वाले अल नीनो के प्रभाव को कम करने वाली किस्मों एवं तकनीकों के विकास की आवश्यकता पर जोर दिया। साथ ही कहा कि बिहार में छोटे एवं सीमांत किसानों की संख्या अधिक है, इसलिए अनुसंधान भी उनकी आवश्यकताओं के अनुरूप होना चाहिए। उन्होंने कहा कि खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धि हुई है, लेकिन खेती में रसायनों के अत्यधिक उपयोग का प्रतिकूल प्रभाव मानव स्वास्थ्य पर पड़ा है। वर्तमान समय की आवश्यकता जहर मुक्त खेती है तथा भावी पीढ़ियों को ध्यान में रखते हुए रसायनों का संतुलित उपयोग किया जाना चाहिए।
उन्होंने किसानों को सलाह दी कि वे अपनी कुल भूमि के कम से कम 25 प्रतिशत हिस्से में प्राकृतिक खेती अपनाएं। साथ ही वैज्ञानिकों से प्राकृतिक खेती के व्यावहारिक मॉडल विकसित करने का आग्रह किया। अपने संबोधन के अंत में उन्होंने आशा व्यक्त की कि बिहार कृषि विश्वविद्यालय केवल आंकड़ों का केंद्र नहीं, बल्कि विकसित बिहार का ध्वजवाहक बनेगा।
--आईएएनएस
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