किसान मजबूत होगा तो भारत विकसित और आत्मनिर्भर बनेगा: शिवराज सिंह चौहान
नई दिल्ली, 27 अगस्त (आईएएनएस)। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि विकसित भारत 2047 का रास्ता गांवों और खेतों से होकर जाता है। किसानों की आय, सम्मान और सुरक्षा सुनिश्चित किए बिना भारत को विकसित, आत्मनिर्भर और विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्था बनाना संभव नहीं है। उन्होंने सतत कृषि, जल एवं मिट्टी संरक्षण, प्राकृतिक खेती, आधुनिक तकनीक और किसान-उद्योग साझेदारी को ग्रामीण समृद्धि का आधार बताया।
केंद्रीय मंत्री चौहान 21वें ग्लोबल सस्टेनेबिलिटी समिट के विशेष सत्र ‘रूरल प्रॉस्पेरिटी फॉर विकसित भारत : एडवांसिंग सस्टेनेबल एग्रीकल्चर एंड इन्क्लूसिव ग्रोथ’ को संबोधित कर रहे थे। होटल ली मेरिडियन, नई दिल्ली में आयोजित इस सत्र का विषय था- ‘एक्सेलरेटिंग द सस्टेनेबिलिटी ट्रांजिशन : स्पीड, स्केल, सिस्टम्स।’ सत्र में जलवायु-स्मार्ट खेती, हरित आजीविका, समावेशी ग्रामीण बुनियादी ढांचे और किसानों की भागीदारी पर विशेष चर्चा हुई। कार्यक्रम में सीआईआई के महानिदेशक चंद्रजीत बनर्जी और सीआईआई के पूर्व अध्यक्ष तथा आईटीसी लिमिटेड के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक संजीव पुरी सहित उद्योग जगत के प्रतिनिधि उपस्थित रहे।
केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि सतत कृषि को केवल पर्यावरणीय मुद्दे के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह आर्थिक विकास, सामाजिक न्याय, खाद्य सुरक्षा, किसान कल्याण और राष्ट्रीय सुरक्षा से सीधे जुड़ा विषय है। उन्होंने कहा कि भारत अपनी खाद्य जरूरतों के लिए किसी दूसरे देश पर निर्भर नहीं रह सकता। देश के किसानों और वैज्ञानिकों के प्रयासों से भारत ने खाद्यान्न उत्पादन में उल्लेखनीय आत्मनिर्भरता हासिल की है, लेकिन बदलते जलवायु संकट के बीच उत्पादन और संसाधनों की सुरक्षा दोनों पर समान रूप से ध्यान देना होगा। उन्होंने कहा कि भारत की परंपरा प्रकृति के सम्मान और संतुलित उपयोग की रही है। पेड़, नदियां, पर्वत, फसलें और मिट्टी भारतीय जीवन-दर्शन में पूजनीय रहे हैं। इसलिए प्रकृति का अंधाधुंध दोहन नहीं, बल्कि उसका संरक्षण करते हुए उपयोग करना ही भारत का मूल विचार है। उन्होंने कहा कि पेड़ से फल लेना दोहन है, लेकिन पेड़ को काट देना शोषण है। हमें शोषण नहीं, संतुलित दोहन की दिशा में आगे बढ़ना है।
केंद्रीय मंत्री चौहान ने मिट्टी की सेहत को कृषि का सबसे महत्वपूर्ण आधार बताते हुए कहा कि रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के असंतुलित उपयोग से भूमि की उर्वरता प्रभावित हो रही है। किसानों को मिट्टी की जांच, फसल की जरूरत और वैज्ञानिक सलाह के आधार पर ही उर्वरकों का इस्तेमाल करना चाहिए। उन्होंने कहा कि मिट्टी में पोषक तत्वों का संतुलन बनाए रखना जरूरी है। इसके लिए मृदा स्वास्थ्य कार्ड, जैविक खाद, हरी खाद, फसल अवशेषों का प्रबंधन और प्राकृतिक खेती जैसे उपायों को बढ़ावा देना होगा। स्वस्थ मिट्टी से उत्पादन की गुणवत्ता बढ़ेगी, खेती की लागत घटेगी और किसानों की आय में सुधार होगा। केंद्रीय मंत्री चौहान ने जल संरक्षण पर जोर देते हुए कहा कि आने वाले समय में पानी की उपलब्धता कृषि के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन सकती है। खेत-तालाब, सूक्ष्म सिंचाई, वर्षा जल संचयन, ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी तकनीकों के माध्यम से पानी का एक-एक बूंद बेहतर उपयोग करना होगा।
चौहान ने किसानों से एक ही फसल पर निर्भर रहने के बजाय एकीकृत खेती अपनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि अनाज के साथ दलहन, तिलहन, सब्जियां, फल, पशुपालन, मछली पालन, मधुमक्खी पालन और कृषि वानिकी को जोड़ा जा सकता है। उन्होंने कहा कि फसल चक्र में बदलाव से मिट्टी की सेहत सुधरती है और किसानों को वर्षभर आय के अवसर मिलते हैं। दलहनी फसलें मिट्टी में नाइट्रोजन बढ़ाने में मदद करती हैं, जिससे उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है। एकीकृत खेती छोटे और सीमांत किसानों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है, क्योंकि सीमित भूमि से भी अलग-अलग गतिविधियों के माध्यम से अधिक आय प्राप्त की जा सकती है। उन्होंने कहा कि फसल विविधीकरण से पानी की बचत होगी, मिट्टी की उर्वरता बनी रहेगी और किसानों को बाजार के उतार-चढ़ाव से भी सुरक्षा मिलेगी। इससे गांवों में रोजगार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।
कृषि मंत्री चौहान ने कहा कि मौसम में तेजी से हो रहे बदलावों का सीधा असर खेती पर पड़ रहा है। ऐसे में किसानों को स्थानीय जलवायु, मिट्टी और पानी के अनुसार फसल और किस्म का चयन करना होगा। उन्होंने बताया कि देश के जिलों के लिए जलवायु जोखिमों का आकलन कर कृषि सलाह और कार्ययोजनाएं तैयार की जा रही हैं। इन योजनाओं में यह तय किया जाएगा कि किस क्षेत्र में कौन-सी फसल, कौन-सी किस्म और कौन-सी तकनीक अधिक उपयोगी होगी। इसका उद्देश्य जलवायु जोखिमों की पहचान से आगे बढ़कर खेत स्तर पर जलवायु अनुकूल कार्रवाई सुनिश्चित करना है। श्री चौहान ने कहा कि जलवायु-स्मार्ट कृषि में मौसम पूर्वानुमान, ड्रोन, उपग्रह आधारित निगरानी, सेंसर, डिजिटल सलाह और आधुनिक सिंचाई तकनीकों का महत्वपूर्ण योगदान होगा। इन सुविधाओं को किसानों तक सरल भाषा और कम लागत में पहुंचाना सरकार, वैज्ञानिक संस्थानों और उद्योग की साझा जिम्मेदारी है।
--आईएएनएस
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