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कौन हैं मां कंसमर्दिनी, जानिए यशोदा की पुत्री 'योगमाया' के इस प्राचीन मंदिर की गाथा

 

उत्तराखंड, 18 मार्च (आईएएनएस)। देवभूमि उत्तराखंड प्राचीन शिलालेखों और मंदिरों की जीती-जागती मिसाल रहा है। वह अपने कण-कण में प्राचीन मंदिर और उनके पीछे की कहानियों को समेटे हुए बैठा है। ऐसा ही एक प्रसिद्ध प्राचीन मंदिर है मां कंसमर्दिनी, जो पौड़ी गढ़वाल जिले के श्रीनगर शहर में अलकनंदा नदी के किनारे स्थित है।

यह मंदिर ऋषिकेश से करीब 104 किलोमीटर दूर स्थित है। पौराणिक कहानी के अनुसार मंदिर का इतिहास द्वापर युग से जोड़ा जाता है। यह मंदिर योगमाया (यशोदा की पुत्री) को समर्पित है, जिन्हें कंस का वध करने वाली देवी माना जाता है। यहां माता की शिलाखंड मूर्ति को तांबे के पात्र से ढका जाता है, और इन्हें संतान दायिनी व समृद्धि की देवी माना जाता है।

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने बुधवार को इसके महत्व पर प्रकाश डाला है। उन्होंने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर मंदिर का खास वीडियो पोस्ट किया। इस वीडियो के साथ उन्होंने लिखा, "श्रीनगर, पौड़ी गढ़वाल स्थित मां कंसमर्दिनी मंदिर आस्था, शक्ति और श्रद्धा का एक महत्वपूर्ण केंद्र है। यहां का शांत और आध्यात्मिक वातावरण भक्तों को एक अलग ही ऊर्जा और सुकून का अनुभव कराता है। नवरात्रि के दौरान यहां विशेष पूजा-अर्चना और भजन-कीर्तन का भव्य आयोजन होता है। आप भी श्रीनगर आगमन पर इस पावन मंदिर के दर्शन अवश्य करें।"

यह मंदिर श्रीनगर का एक प्रमुख शक्तिपीठ है, जहां शांत और आध्यात्मिक माहौल मिलता है। यहां आने वाले श्रद्धालुओं को दिव्य ऊर्जा और गहरा सुकून प्राप्त होता है। खासकर नवरात्रि में यहां भव्य आयोजन होते हैं। विशेष पूजा-अर्चना, भजन-कीर्तन और कन्या पूजन की धूम रहती है। दूर-दूर से भक्त मां के दर्शन के लिए आते हैं।

मंदिर के पीछे की एक कहानी काफी मशहूर है। मान्यता के अनुसार, जब कंस ने मां यशोदा की पुत्री (योगमाया) को शिला पर पटका था, तब वह आकाश में गायब होकर कंस को चेतावनी दी थी कि उसे मारने वाला जन्म ले चुका है, इसलिए वे 'कंसमर्दिनी' कहलाईं।

लगभग 1800 वर्ष पूर्व रेवड़ी गांव का एक किसान अपने खेतों में हल चला रहा था, तो उसी दौरान उसे एक आवाज सुनाई देती है, जिसके बाद वह बेडू पेड़ के समीप जाता है। वह कन्या कहती है, मैं बिना वस्त्र के हूं। तुम्हारे पास जो भी वस्तु है उससे मुझे ढक दो। तब उसने बीज वाले तांबे के बने बर्तन (पाथा) से उसे ढका था। कालांतर में उसी बेडू के पेड़ के नीचे का यह स्थल कंसमर्दनी मंदिर के रूप में अस्तित्व में आया। परिवार की सुख-शांति-समृद्धि के साथ ही संतान दायिनी के रूप में भी इस देवी को पूजा जाता है।

--आईएएनएस

एनएस/पीएम