कर्नाटक के इस मंदिर में रंग नहीं, राख से खेली जाती है होली, कामदेव और भगवान शिव से जुड़ा है इतिहास
नई दिल्ली, 2 मार्च (आईएएनएस)। देशभर में 4 मार्च को होली का त्योहार मनाया जाएगा। जहां उत्तर भारत में होली को प्रह्लाद और होलिका की पौराणिक कथा के साथ जोड़कर मनाया जाता है, वहीं दक्षिण भारत में होली भगवान शिव और कामदेव से जुड़ी है।
दक्षिण भारत में होली अहंकार नष्ट होने का प्रतीक है और इस दिन भगवान शिव व कामदेव के एक साथ दर्शन करना शुभ माना जाता है। होली के दिन कर्नाटक के रामलिंगेश्वर कामन्ना मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ पहुंचती है।
कर्नाटक का रामलिंगेश्वर कामन्ना मंदिर बाकी मंदिरों से काफी अलग है। यह दक्षिण भारत का पहला मंदिर है, जहां गर्भगृह में भगवान शिव और कामदेव एक साथ विराजमान हैं। मान्यता है कि होली के दिन अगर भगवान शिव और कामदेव के एक साथ दर्शन कर लिए जाएं तो सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और अहंकार का भी नाश होता है। मंदिर के गर्भगृह में कामदेव की प्रतिमा शिवलिंग के साथ स्थापित है और प्रतिमा ध्यान की अवस्था में है।
पौराणिक कथाओं की मानें तो भगवान शिव को लंबी और कठोर तपस्या से उठाने के लिए देवताओं ने कामदेव का सहारा लिया था। देवी सती के देह त्याग के बाद भगवान शिव सृष्टि का पालन छोड़ कठोर तपस्या में लीन हो गए थे। सृष्टि की बिगड़ती स्थिति को देखते हुए कामदेव ने कामबाण महादेव पर चलाया था। तपस्या भंग होने के बाद महादेव के तीसरे नेत्र के तेज से कामदेव राख में बदल गए थे। माना जाता है कि कामदेव को अपनी शक्तियों पर बहुत घमंड था, यही वजह रही कि भगवान शिव ने कामदेव का अहंकार तोड़ने के लिए तीसरा नेत्र खोला था।
इसी पौराणिक कथा की वजह से आज भी कर्नाटक के रामलिंगेश्वर कामन्ना मंदिर और बाकी मंदिरों में होली के दिन राख को माथे पर लगाया जाता है। माना जाता है कि यह राख कामदेव के अहंकार का प्रतीक है, जो याद दिलाती है कि अहंकार का अंत कैसे होता है।
रामलिंगेश्वर कामन्ना मंदिर में होली का आयोजन पांच दिन तक चलता है, और अलग-अलग दिन विभिन्न अनुष्ठान होते हैं। इन पांच दिनों में कामदेव और भगवान शिव पर चांदी की वस्तुएं चढ़ाई जाती हैं, खासकर चांदी का पालना। माना जाता है कि अगर किसी दंपत्ति को संतान प्राप्ति नहीं हो रही है, तो वह होली के समय चांदी का झूला अर्पित करता है, तो मनोकामना जरूर पूरी होती है।
--आईएएनएस
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