काम मांगने पहुंचे केष्टो मुखर्जी का बिमल रॉय ने लिया अनोखा ऑडिशन, कुत्ते की आवाज ने बदल दी किस्मत
मुंबई, 6 अगस्त (आईएएनएस)। 7 अगस्त 1925 को कोलकाता में जन्मे केष्टो मुखर्जी हिंदी सिनेमा के उन कलाकारों में गिने जाते हैं, जिन्होंने छोटे-छोटे किरदार निभाकर दर्शकों के दिलों में बड़ी जगह बनाई। पर्दे पर उनका मासूम चेहरा और शराबी की अनोखी एक्टिंग आज भी लोगों को याद है। इस मुकाम तक पहुंचने का उनका सफर बिल्कुल भी आसान नहीं था। संघर्ष के दिनों में उन्होंने कई दिग्गज फिल्मकारों के दरवाजे खटखटाए। इन्हीं दिनों उनसे जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा भी सामने आया, जब मशहूर निर्देशक बिमल रॉय ने उनसे कुत्ते की आवाज निकालने के लिए कहा था।
केष्टो मुखर्जी का जन्म बंगाल के एक साधारण परिवार में हुआ था। बचपन से ही उन्हें अभिनय का शौक था। स्कूल और मोहल्ले में होने वाले नाटकों में वह बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे। रंगमंच पर उनकी पकड़ धीरे-धीरे मजबूत होती गई। इसी दौरान उनकी मुलाकात प्रसिद्ध फिल्मकार ऋत्विक घटक से हुई। ऋत्विक घटक ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें अपनी बंगाली फिल्म 'नागरिक' में अभिनय का मौका दिया।
फिल्म की शूटिंग 1952 में पूरी हो गई थी, लेकिन यह कई साल बाद 1977 में रिलीज हो सकी। इसके बाद केष्टो ने 'अजांत्रिक', 'बारी ठेके पालिये' और दूसरी बंगाली फिल्मों में भी काम किया। हालांकि इन फिल्मों से उन्हें पहचान तो मिली, लेकिन आर्थिक स्थिति में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया।
बेहतर मौके की तलाश में केष्टो मुखर्जी कोलकाता छोड़कर मुंबई पहुंच गए। यहां उनका संघर्ष और भी कठिन हो गया। काम की तलाश में वह रोज अलग-अलग फिल्म स्टूडियो के चक्कर लगाते थे। इसी दौरान वह मशहूर निर्देशक बिमल रॉय से मिलने पहुंचे। बिमल रॉय उस समय शूटिंग में व्यस्त थे। काफी इंतजार के बाद जब मुलाकात हुई तो उन्होंने कहा कि अभी कोई काम नहीं है और बाद में आना लेकिन केष्टो वहीं खड़े रहे।
बताया जाता है कि बिमल रॉय ने उनसे पूछा, "क्या तुम कुत्ते की आवाज निकाल सकते हो?" कुछ पल के लिए केष्टो चुप रहे, लेकिन अगले ही पल उन्होंने कुत्ते की आवाज निकालनी शुरू कर दी। ये देख वहां मौजूद लोग हैरान रह गए। उनकी यह कला देखकर बिमल रॉय प्रभावित हुए और उन्हें काम देने का फैसला किया।
मुंबई में उन्हें निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्म 'मुसाफिर' से भी पहचान मिली। इसके बाद उन्होंने लगातार फिल्मों में काम किया।
केष्टो मुखर्जी के करियर का सबसे बड़ा मोड़ तब आया, जब निर्देशक असित सेन ने उन्हें फिल्म 'मां और ममता' में शराबी का किरदार दिया। उन्होंने इस भूमिका को इतनी सहजता से निभाया कि वह उनकी पहचान बन गई। इसके बाद हिंदी फिल्मों में जब भी किसी शराबी किरदार की जरूरत होती, सबसे पहले केष्टो मुखर्जी का नाम सामने आता। हालांकि उन्होंने सिर्फ ऐसे ही किरदार नहीं निभाए। 'पड़ोसन', 'बॉम्बे टू गोवा', 'शोले', 'चुपके चुपके', 'खूबसूरत', 'गोलमाल', 'पिया का घर', 'जंजीर' और 'नसीब' जैसी कई यादगार फिल्मों में भी उन्होंने अलग-अलग भूमिकाएं निभाईं। तीन दशक से ज्यादा लंबे करियर में उन्होंने करीब 90 से ज्यादा फिल्मों में काम किया।
उनकी शराबी की एक्टिंग इतनी असली लगती थी कि कई लोग मानते थे कि वह शूटिंग से पहले शराब पीते होंगे, लेकिन उनके बेटे बबलू मुखर्जी ने एक इंटरव्यू में बताया कि उनके पिता अभिनय के लिए शराब नहीं पीते थे। उन्होंने अपने किरदार के हावभाव और बोलने का तरीका रोजमर्रा की जिंदगी में लोगों को देखकर सीखा था।
केष्टो मुखर्जी को उनके शानदार अभिनय के लिए कई बार फिल्मफेयर पुरस्कारों में सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता की श्रेणी में नामांकन मिला। आखिरकार वर्ष 1981 में फिल्म 'खूबसूरत' के लिए उन्हें फिल्मफेयर का बेस्ट परफॉर्मेंस इन अ कॉमिक रोल पुरस्कार मिला। फरवरी 1982 में एक सड़क हादसे में वह गंभीर रूप से घायल हो गए। इलाज के बावजूद उनकी हालत में सुधार नहीं हो सका और मार्च 1982 में महज 56 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया।
--आईएएनएस
पीके/वीसी