जस्टिस उज्जल भुइयां बोले- लाखों भारतीयों को वोटिंग से रोकने वाली प्रक्रिया मनमानी, वीडियो में देंखे संविधान में नागरिकों के दो वर्ग नहीं
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुइयां ने मतदान के अधिकार को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि ऐसी कोई भी प्रक्रिया, जिसके चलते लाखों भारतीय नागरिक अपने वोट देने के अधिकार से वंचित हो जाएं, स्वाभाविक रूप से मनमानी होगी। इसे किसी भी तरह के तर्क या बहाने से सही नहीं ठहराया जा सकता। जस्टिस भुइयां ने कहा कि इस तरह की प्रक्रिया संविधान की मूल भावना और संवैधानिक व्यवस्था के खिलाफ होगी। जस्टिस भुइयां ने यह टिप्पणी रविवार को हैदराबाद स्थित NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ में आयोजित 19वें जस्टिस बीआर साव्हनी मेमोरियल मूट कोर्ट प्रतियोगिता के समापन समारोह में संबोधन के दौरान की। उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान नागरिकों के दो अलग-अलग वर्ग नहीं बनाता। एक वर्ग ऐसा नहीं हो सकता, जिसके पास वोट देने का अधिकार हो और दूसरे वर्ग को इस अधिकार से वंचित कर दिया जाए।
लाखों लोगों को वोटिंग से रोकना संवैधानिक व्यवस्था के खिलाफ
जस्टिस भुइयां ने कहा कि यदि कोई प्रक्रिया लाखों भारतीय नागरिकों को उनके ही देश में वोटिंग के अधिकार से वंचित करके दूसरे दर्जे का नागरिक बना देती है, तो ऐसी प्रक्रिया मनमानी मानी जाएगी। उनके मुताबिक, इस तरह की कार्रवाई संविधान के अनुच्छेद 14 और 326 के अनुरूप नहीं होगी।उन्होंने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 326 वयस्क मताधिकार के आधार पर लोकसभा और विधानसभा चुनावों की व्यवस्था करता है, जबकि अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है। जस्टिस भुइयां ने मतदान के अधिकार को लोकतांत्रिक व्यवस्था के केंद्र में बताते हुए कहा कि इसे बड़े पैमाने पर खत्म करने वाली कोई भी प्रक्रिया संविधान की मूल भावना पर असर डालती है।
अरबपति हो या रिक्शा चालक, वोट की कीमत बराबर
अपने संबोधन में जस्टिस भुइयां ने भारत में सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की अहमियत पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि एक व्यक्ति अरबपति हो सकता है, जबकि दूसरा रिक्शा चलाने वाला हो सकता है, लेकिन लोकतंत्र में दोनों के वोट का मूल्य समान होता है।उन्होंने कहा कि नागरिक की पहचान उसके आर्थिक या सामाजिक दर्जे से नहीं, बल्कि समान संवैधानिक अधिकारों से होती है। इसलिए किसी नागरिक को वोटिंग के अधिकार से वंचित करना उसके लोकतांत्रिक अधिकारों और नागरिकता की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।
वोटर लिस्ट से नाम हटाने पर भी कही अहम बात
जस्टिस भुइयां ने मतदाता सूची में नाम हटाने की प्रक्रिया को लेकर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि मृत मतदाता के मामले को छोड़कर किसी मतदाता का नाम सूची से हटाने से पहले नोटिस और सुनवाई का अवसर दिया जाना चाहिए। उनके मुताबिक, किसी भारतीय नागरिक की पहचान से उसके वोट देने के अधिकार को अलग नहीं किया जा सकता।उन्होंने यह भी कहा कि वोट देने का अधिकार केवल सामान्य कानूनी अधिकार नहीं है, बल्कि भारतीय लोकतांत्रिक और संवैधानिक व्यवस्था में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में मतदान को मौलिक अधिकार के बजाय संवैधानिक अधिकार माना है।
SIR विवाद के बीच आया बयान
जस्टिस भुइयां की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब मतदाता सूची के Special Intensive Revision यानी SIR को लेकर राजनीतिक और कानूनी बहस चल रही है। हालांकि अपने संबोधन में जस्टिस भुइयां ने सीधे तौर पर SIR या किसी विशेष संस्था का नाम नहीं लिया। उनकी टिप्पणी व्यापक रूप से उन प्रक्रियाओं के संदर्भ में थी, जिनसे बड़ी संख्या में नागरिकों के मतदान के अधिकार पर असर पड़ सकता है।जस्टिस भुइयां ने कहा कि संविधान से ऊपर कोई नहीं है और लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकों के मतदान के अधिकार की रक्षा जरूरी है। उनके बयान ने वोटर लिस्ट, नागरिकों के समान अधिकार और चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता को लेकर चल रही बहस को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है।