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जमानत में जज अपनी निजी नैतिकता को आधार नहीं बना सकते, वीडियो में देंखे सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

 

सुप्रीम कोर्ट ने जमानत और आपराधिक मामलों की सुनवाई को लेकर अहम टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि किसी आरोपी की जमानत पर फैसला करते समय न्यायाधीश अपनी निजी नैतिक सोच या व्यक्तिगत मूल्य-निर्णय को आधार नहीं बना सकते। फैसला कानून और मामले के तथ्यों के आधार पर होना चाहिए। जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चंद्रकुर की पीठ ने 23 सितंबर 2026 को यह टिप्पणी मध्य प्रदेश से जुड़े एक मामले में की।

MP हाईकोर्ट का जमानत आदेश रद्द

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सुप्रीम कोर्ट ने यौन शोषण के आरोपी को जमानत देने से इनकार करने वाले मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के 20 मार्च के आदेश को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने जमानत खारिज करते हुए आशंका जताई थी कि आरोपी की रिहाई से सामाजिक व्यवस्था प्रभावित हो सकती है और पीड़ित परिवार की नैतिकता पर भी असर पड़ सकता है।सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस आधार से असहमति जताई। पीठ ने स्पष्ट किया कि अदालतों को जमानत के मामलों में ही नहीं, बल्कि आपराधिक मुकदमे की सुनवाई के दौरान भी न्यायाधीश की व्यक्तिगत नैतिक धारणाओं को निर्णय पर हावी नहीं होने देना चाहिए।

एक साल से ज्यादा समय से जेल में था आरोपी

मामला मध्य प्रदेश के रतलाम जिले में दर्ज एक आपराधिक प्रकरण से जुड़ा है। आरोपी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता, पॉक्सो एक्ट और एससी-एसटी एक्ट की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था। आरोप था कि उसने नाबालिग का करीब एक महीने तक यौन शोषण किया।आरोपी ने अपने खिलाफ लगाए गए आरोपों से इनकार किया था और दावा किया था कि उसके खिलाफ मामला दूसरे पारिवारिक विवाद से जुड़ी वजहों के चलते दर्ज कराया गया। हालांकि, इन दावों पर अंतिम फैसला मुकदमे के दौरान साक्ष्यों के आधार पर होना है।सुप्रीम कोर्ट ने जमानत पर विचार करते समय यह भी ध्यान में रखा कि आरोपी सितंबर 2025 से जेल में बंद है और एक साल से ज्यादा समय हिरासत में बिता चुका है। कोर्ट ने कहा कि मामले की सुनवाई पूरी होने में अभी और समय लग सकता है। इन परिस्थितियों को देखते हुए पीठ ने आरोपी को जमानत देने का आदेश दिया।

जमानत का मतलब आरोप से बरी होना नहीं

सुप्रीम कोर्ट का आदेश जमानत से संबंधित है। इसका मतलब यह नहीं है कि आरोपी को मामले में दोषमुक्त कर दिया गया है। मुकदमे की सुनवाई और आरोपों पर अंतिम निर्णय संबंधित अदालत द्वारा साक्ष्यों और कानून के आधार पर किया जाएगा।सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का जमानत संबंधी आदेश रद्द करते हुए आरोपी को निर्धारित शर्तों के तहत रिहा करने का निर्देश दिया। साथ ही कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जमानत का यह आदेश आरोपी के खिलाफ किसी अन्य लंबित आपराधिक मामले या अपील में उसकी हिरासत को प्रभावित नहीं करेगा।इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक निर्णयों में व्यक्तिगत नैतिक धारणाओं के बजाय कानून, तथ्यों और स्थापित न्यायिक सिद्धांतों को आधार बनाने पर जोर दिया है।