जम्मू-कश्मीर के डोडा में लंपी के 300 से अधिक मामले, पशुपालन विभाग ने तेज किया टीकाकरण अभियान
डोडा, 9 अक्टूबर (आईएएनएस)। जम्मू-कश्मीर के डोडा जिले में मवेशियों में तेजी से फैल रही लंपी स्किन डिजीज (एलएसडी) ने पशुपालकों की चिंता बढ़ा दी है। जिले में पिछले तीन महीनों के दौरान 300 से अधिक मामले सामने आ चुके हैं। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए जिला पशुपालन विभाग ने प्रभावित इलाकों में युद्धस्तर पर टीकाकरण, जागरूकता और इलाज अभियान शुरू कर दिया है।
मुख्य पशुपालन अधिकारी डॉ. इरफान अली वानी ने खुद इसकी पुष्टि की और कहा कि लोगों को घबराने की जरूरत नहीं है, बीमारी पूरी तरह से नियंत्रण में है।
पशुपालन विभाग की टीमें शुक्रवार को बगोर इलाके में घर-घर जाकर पशुओं की जांच और टीकाकरण कर रही हैं। एक स्थानीय किसान ने आईएएनएस से बातचीत के दौरान कहा, "हम बहुत घबरा गए थे, जब यहां ये बीमारी आई। यह हमारे लिए रोजगार का एकमात्र साधन है, गांव के सभी लोगों का यही सहारा है। हमने तुरंत पशुपालन विभाग से संपर्क किया। विभाग की टीम तुरंत आई और हमारे पशुओं का टीकाकरण किया। डॉक्टर साहब ने हमें सलाह दी है कि अपने पशुओं के रहने की जगह पर साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखें। फिलहाल स्थिति नियंत्रण में है।"
उन्होंने आगे बताया, "पहले हम सभी लोग बहुत डरे हुए थे कि कहीं हमारी गाय मर न जाए। लेकिन अब समय-समय पर टीकाकरण हो रहा है और डॉक्टर खुद गांव-गांव आ रहे हैं। आज पूरी टीम बगोर में आई है और हर घर में जाकर पशुओं को वैक्सीन लगा रही है।"
एक अन्य पशुपालक ने कहा, "यह बीमारी अचानक फैल रही है, लेकिन अब यहां टीकाकरण अभियान चल रहा है और डॉक्टरों की टीम हर संभव मदद कर रही है। पहले हम बहुत परेशान थे कि हमारे पशुओं का क्या होगा, लेकिन डॉक्टरों के आने के बाद हमें राहत मिली है। हमें उम्मीद है कि समय पर टीकाकरण से यह बीमारी दोबारा यहां नहीं आएगी।"
इस पूरे मामले पर डोडा के मुख्य पशुपालन अधिकारी डॉ. इरफान अली वानी ने विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि लंपी स्किन डिजीज का प्रकोप केवल जम्मू-कश्मीर में ही नहीं, बल्कि पूरे उत्तर भारत में देखा जा रहा है। हमारे जिले में भी छिटपुट मामले मिले हैं। पिछले महीने कुछ मामले देखे गए थे और इस महीने भी कुछ नए मामले सामने आ रहे हैं। लेकिन हम शुरू से ही लोगों से कह रहे हैं कि इसमें घबराने की कोई जरूरत नहीं है। यह कोई बहुत बड़ा मुद्दा नहीं है। हालांकि, थोड़ी एहतियात बरतने की जरूरत है। यह बीमारी एक संक्रमित पशु के दूसरे स्वस्थ पशु के संपर्क में आने से, या मच्छर और मक्खियों के काटने से फैलती है। जब एक मच्छर संक्रमित पशु को काटकर दूसरे पशु को काटता है तो वायरस फैल जाता है।
डॉ. वानी ने बताया कि विभाग ने अधिक से अधिक टीमों को फील्ड में तैनात किया है। ये टीमें दो तरह से काम कर रही हैं - पहला, लोगों में जागरूकता फैलाना और दूसरा, जहां भी मामले सामने आ रहे हैं, वहां तुरंत इलाज मुहैया कराना। 4 से 5 दिन के इलाज में जानवर ठीक हो जाता है। इसमें सबसे जरूरी बात यह है कि जानवर खाना-पीना न छोड़े। हम शुरू से ही उन्हें दवाइयां देते हैं। हमारे पास अधिकांश दवाइयां उपलब्ध हैं। कुछ दवाइयां ऐसी होती हैं जो बाहर से मंगवानी पड़ती हैं, जो बहुत महंगी नहीं होतीं, लगभग 100-200 रुपए की होती हैं। हम लोगों से कहते हैं कि वे इसे ले लें। समय पर दवा देने से जानवर बिल्कुल ठीक हो जाता है।
उन्होंने आगे बताया कि इस बीमारी में मृत्यु दर केवल 1 से 2 प्रतिशत है। अभी तक स्थिति काबू में है। कई लोग अफवाह फैलाते हैं कि जानवर मर गए, लेकिन जब हम उनसे फोटो या सबूत मांगते हैं तो नहीं दे पाते। डोडा दुर्गम पहाड़ी इलाका है, जहां एक गांव से दूसरे गांव तक पहुंचने में समय लगता है। साथ ही स्टाफ की कमी भी एक चुनौती है। इसके बावजूद फील्ड स्टाफ पूरी मेहनत से हर जगह पहुंच रहा है। पिछले तीन महीनों में हमारे पास लगभग 300 मामले रिपोर्ट हुए हैं। संक्रमित पशु के आसपास के पशुओं में भी वायरस गया होगा, लेकिन जिन पशुओं की रोग प्रतिरोधक क्षमता अच्छी होती है, उनमें यह बीमारी नहीं लगती। जिनकी इम्युनिटी कम होती है, उन्हें थोड़ी परेशानी होती है, लेकिन समय पर इलाज से वे ठीक हो जाते हैं।"
--आईएएनएस
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