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जलियांवाला बाग नरसंहार: जिस आवाज को गोलियों से दबाना चाहती थी अंग्रेजी हुकूमत, उसकी गूंज ने देशवासियों को किया आजादी के लिए एकजुट

 

नई दिल्ली, 12 अप्रैल (आईएएनएस)। लगभग 107 बरस पहले जब पूरा हिंदुस्तान सहम गया था, मौत भी जिंदगी की भीख मांगने लगी थी और धरती ने इंसानी लाशों से अपनी कोख को ढक लिया था। 13 अप्रैल 1919 को बर्बरता की ऐसी पराकाष्ठा पार की गई कि आज भी दीवारों पर उसके निशान नजर आते हैं। आज भी वो निशान देखकर हर कोई सहम जाता है। यह कहानी है जलियांवाला बाग नरसंहार की, जब अंग्रेजों ने भीड़ पर अंधाधुंध गोलियां बरसाई थीं। ये बात और है कि ब्रिटेन ने आज तक भारत में किए अपने इस घृणास्पद कृत्य के लिए माफी नहीं मांगी है।

13 अप्रैल 1919 को अमृतसर शहर में स्थित जलियांवाला बाग में हुई घटना कोई कहानी नहीं, बल्कि वो जख्म है, जो बार-बार यह कहता है कि अंग्रेजी हुकूमत की उस खौफनाक पराकाष्ठा को कभी भूलो मत। कभी माफ मत करो। यह वो इतिहास है, जिसे हम और आप भुला नहीं सकते। यह वो इतिहास है, जिसे कोई झुठला नहीं सकता और कोई बरगला नहीं सकता।

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान जब भारत पर ब्रिटिश हुकूमत का शासन था। लगभग 13 लाख भारतीय सैनिकों ने इस युद्ध में हिस्सा लिया था। यह सैनिक ब्रिटिश झंडे तले लड़े थे। अपने खून पसीने से उनकी लड़ाई को मजबूती दी थी। इस युद्ध में 43,000 से ज्यादा जवान शहीद हुए थे। उस समय देशवासियों के मन में एक उम्मीद जगी थी कि शायद युद्ध के बाद अंग्रेज भारत को आजादी दे देंगे या कम से कम जो जुल्म भारत और भारतीयों पर ढा रहे थे, उन नीतियों में थोड़ी नरमी लाएंगे, लेकिन हिंदुस्तान की ये उम्मीदें धरी की धरी रह गईं।

ब्रिटिश सरकार ने उस दौर में नए-नए कानूनों के जरिए अपनी पकड़ को और ज्यादा सख्त कर दिया। इससे लोगों का गुस्सा और ज्यादा बढ़ने लगा। उस आग में घी डालने का काम अंग्रेजी हुकूमत के रॉलेट एक्ट ने किया। प्रथम विश्व युद्ध के बाद ब्रिटिश सरकार ने एक ऐसा कानून बनाया, जिसने लोगों के सब्र के बांध को तोड़ दिया।

अंग्रेज आजादी के आंदोलन और क्रांतिकारी गतिविधियों को दबाने के नाम पर भारतीयों के मौलिक अधिकारों को खत्म करना चाहते हैं। इसके लिए जस्टिस रॉलेट की अध्यक्षता में एक कमेटी ने रॉलेट एक्ट बनाया। कानून साल 1918 में तैयार हुआ, जिसे 6 फरवरी और 18 मार्च 1919 के बीच तमाम भारतीय सदस्यों के विरोध के बावजूद इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल में पारित करा दिया गया।

इस कानून के तहत ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ अगर कोई भी आंदोलन होगा तो उसे उस दौर में देशद्रोह माना जाएगा। इस एक्ट के तहत लोगों को बिना वारंट के गिरफ्तार करने की इजाजत दी गई थी। बिना मुकदमे के उन्हें 2 साल जेल में रखने की ताकत दी गई थी। इस क्रूर कानून ने पूरे देश में विरोध की चिंगारी को सुलगा दिया था। खासतौर पर पश्चिम बंगाल और पंजाब जैसे राज्य अंग्रेजों के सामने खुलकर सामने आने लगे थे। पंजाब में इस कानून का जबरदस्त विरोध हुआ।

जब अंग्रेजों पर इसका कोई असर नहीं हुआ तो महात्मा गांधी ने इसके विरोध में सत्याग्रह शुरू किया। इस आंदोलन को व्यापक बनाने के लिए अखिल भारतीय स्तर पर हड़ताल की गई। अमृतसर शहर में भी 6 अप्रैल 1919 को एक हड़ताल की गई। इसमें रॉलेट एक्ट का विरोध किया गया।

धीरे-धीरे इस अहिंसक आंदोलन का प्रभाव पूरे देश में होने लगा था। अमृतसर, लाहौर और गुजरांवाला सबसे अधिक प्रभावित थे। उस समय के बड़े नेता डॉक्टर सैफुद्दीन खिलचू और डॉक्टर सत्यपाल लोगों को एकजुट कर रहे थे। रॉलेट एक्ट के विरोध आंदोलन में लोगों की भागेदारी से डरकर अंग्रेजी हुकूमत ने दोनों नेताओं को नजरबंद कर दिया। 10 अप्रैल 1919 को अमृतसर में और भी बड़ा आंदोलन हुआ, जिसमें डॉक्टर सैफुद्दीन खिलचू और डॉक्टर सत्यपाल के समर्थन में लोग जुटे थे।

जनता सड़कों पर उतर आई। अपने नेताओं की रिहाई की मांग करने लगी, लेकिन इसी बीच जब पंजाब में हालात बेकाबू होने लगे तब ब्रिटिश सरकार ने मार्शल लॉ लागू कर दिया। उसी समय जनरल डायर को अमृतसर की कमान सौंप दी गई।

13 अप्रैल 1919 को पंजाब में बैसाखी का पर्व बड़े धूमधाम से मनाया जा रहा था। पूरा पंजाब झूम रहा था। इस दिन अमृतसर के स्वर्ण मंदिर के पास स्थित जलियांवाला बाग में सभा चल रही थी। शहर में कर्फ्यू लगा हुआ था। जलियांवाला बाग में लोग एक शांतिपूर्ण सभा करने के लिए तैयार हो रहे थे। करीब 15 से 20 हजार लोग उस बाग में जमा हो गए। नेताओं के भाषण चल रहे थे।

जनरल डायर सैनिकों और राइफलों के साथ वहां पहुंचा था। जलियांवाला बाग से बाहर निकलने का सिर्फ एक रास्ता था और डायर ने अपने सैनिकों के साथ उस रास्ते को घेर लिया। इसके बाद जो कुछ हुआ वो आज भी हिंदुस्तानियों की रूह कंपकंपा देता है।

बिना किसी चेतावनी और बिना किसी वजह जनरल डायर ने गोली चलाने का आदेश दे दिया। सैनिकों ने भीड़ पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। लोग जान बचाने के लिए इधर-उधर भागने लगे। बाग के बीच में कुआं था, जिसमें छिपने के लिए लोग कूद पड़े, लेकिन सैनिक वहां भी नहीं रुके। कुएं में गिरे लोगों पर अंधाधुंध गोलियां चलाने का आदेश दे दिया गया। जो जिंदगी बचाने के लिए कुएं में गए थे, उन्हें बाहर निकलने का मौका ही नहीं मिला।

करीब 10 मिनट तक वहां गोलियां चलती रहीं। 1650 राउंड फायर किए गए। फायरिंग रुकेगी नहीं, ऐसा जनरल डायर का आदेश था लेकिन फायरिंग रुकी। इसलिए नहीं रुकी, क्योंकि आदेश को बदला गया था, बल्कि इसलिए रुकी क्योंकि बंदूक की सारी गोलियां खत्म कर दी गई थीं। अगले दिन उस कुएं से सैकड़ों शव निकाले गए। पूरा बाग खून से लाल हो चुका था। चारों तरफ सिर्फ लाशें थीं।

आधिकारिक रिपोर्ट में कहा गया कि उस रोज 379 लोग मरे थे, लेकिन इतिहासकार मानते हैं कि करीब डेढ़ हजार लोग उस दिन मारे गए, क्योंकि वे अंग्रेजी हुकूमत के एक आदेश के खिलाफ इस बाग में इकट्ठा हुए थे। मरने वालों में बूढ़ी औरतें, मर्द, औरत और मासूम बच्चे थे।

जलियांवाला बाग की घटना के बाद भारतीय, अंग्रेजों के सामने झुकने और दबने के बजाय उग्र, एकजुट और दृढ़ हो चुके थे। पूरे भारत में जंगल की आग की तरह इस निर्मम हत्याकांड की चर्चा होने लगी। युवाओं का खून खौल उठा। अगले साल यानी 1920 में महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन छेड़ दिया, जिसने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को एक नई जागृति दी।

इस घटना को लगभग 107 साल हो गए हैं। लंबे वक्त से अलग-अलग मंचों से मांग उठती रही है कि ब्रिटिश सरकार जलियांवाला बाग नरसंहार के लिए लिखित में माफी मांगे, हालांकि ये अब तक नहीं हो पाया है।

--आईएएनएस

डीसीएच/वीसी