ज़िंदगी में हारना और फेल होना भी ज़रूरी है, सच्ची सीख निराशा में ही मिलती है, Video Viral
अक्सर समाज में सफलता को ही जीवन का अंतिम लक्ष्य मान लिया जाता है। जो आगे बढ़ गया, वही सफल कहलाता है और जो पीछे रह गया, उसे असफल मान लिया जाता है। लेकिन ज़िंदगी का सच इससे कहीं अलग है। ज़िंदगी में हारना और फेल होना भी उतना ही ज़रूरी है, क्योंकि सच्ची सीख अक्सर निराशा में ही मिलती है। यह विचार आज की पीढ़ी के लिए पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है।
हर इंसान अपने जीवन में कभी न कभी असफलता का सामना करता है। परीक्षा में फेल होना, नौकरी न मिलना, व्यापार में नुकसान या रिश्तों का टूटना—ये सभी अनुभव दर्दनाक जरूर होते हैं, लेकिन यही पल इंसान को खुद से रूबरू कराते हैं। जब सब कुछ ठीक चल रहा होता है, तब हम अपनी कमियों को अनदेखा कर देते हैं। लेकिन जब हार मिलती है, तब आत्ममंथन शुरू होता है।
मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि निराशा व्यक्ति के भीतर छिपी ताकत को बाहर लाने का काम करती है। असफलता इंसान को धैर्य, सहनशीलता और आत्मविश्वास सिखाती है। जो व्यक्ति हार के बाद भी खड़ा होने की हिम्मत रखता है, वही जीवन में सच्ची सफलता हासिल करता है। असफलता यह सिखाती है कि रास्ता गलत हो सकता है, लेकिन मंज़िल नहीं।
इतिहास भी इस बात का गवाह है कि दुनिया के सबसे सफल लोगों ने असफलता को अपनी सीढ़ी बनाया। थॉमस एडिसन ने हजारों बार असफल होने के बाद ही बल्ब का आविष्कार किया। अब्दुल कलाम जैसे महान व्यक्तित्वों ने भी शुरुआती असफलताओं से सीख लेकर ही देश के लिए मिसाल कायम की। इन सभी उदाहरणों में एक बात समान है—निराशा ने उन्हें तोड़ा नहीं, बल्कि निखारा।
आज के समय में युवा पीढ़ी पर सफलता का दबाव बहुत अधिक है। सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली चमक-धमक लोगों को यह भ्रम देती है कि सब कुछ आसान है। ऐसे में जब असफलता मिलती है, तो कई युवा खुद को कमजोर मान लेते हैं। लेकिन यह समझना जरूरी है कि हार अंत नहीं, बल्कि एक नया अध्याय होता है।
निराशा का समय इंसान को यह सिखाता है कि किस पर भरोसा करना है और किस पर नहीं। यह अहंकार को तोड़ता है और इंसान को ज़मीन से जोड़ता है। जो व्यक्ति हार को स्वीकार करना सीख लेता है, वह जीवन की हर चुनौती के लिए खुद को तैयार कर लेता है।