ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने शिक्षा और विधवा पुनर्विवाह के जरिए बदली समाज की दिशा, कभी स्ट्रीट लाइट के नीचे करते थे पढ़ाई
नई दिल्ली, 25 सितंबर (आईएएनएस)। 26 सितंबर 1820 को बंगाल के मेदिनीपुर में जन्मे ईश्वर चंद्र बंदोपाध्याय उर्फ ईश्वर चंद्र विद्यासागर सिर्फ एक विद्वान ही नहीं बल्कि एक युग-परिवर्तनकारी व्यक्तित्व थे। उन्होंने शिक्षा और समाज सुधार के जरिए भारत के भविष्य की नींव रखी।
विद्यासागर ने बेहद गरीबी में अपना बचपन बिताया। हालांकि गरीबी उनकी आत्मा को नहीं छू सकी और न ही यह उनके जीवन के लक्ष्यों को प्राप्त करने से उनको रोक सकी। पिता ठाकुरदास बंदोपाध्याय और मां भगवती देवी धार्मिक प्रवृति के व्यक्ति थे। ईश्वर चंद्र एक मेधावी छात्र थे। ज्ञान के प्रति उनकी जिज्ञासा इतनी तीव्र थी कि वे स्ट्रीट लाइट के नीचे बैठकर पढ़ा करते थे क्योंकि उनके पास घर में जलाने के लिए लैंप नहीं था।
उन्होंने सभी परीक्षाएं उत्कृष्ट अंकों के साथ और बहुत कम समय में उत्तीर्ण कीं। उन्हें उनकी शैक्षणिक उपलब्धि के लिए कई छात्रवृत्तियां प्राप्त हुईं। अपना और परिवार का भरण-पोषण करने के लिए ईश्वर चंद्र ने जोराशंको में अंशकालिक अध्यापन का काम भी किया। ईश्वर चंद्र का विवाह चौदह वर्ष की आयु में हुआ था। उनकी पत्नी का नाम दिनामयी देवी था। नारायण चंद्र बंदोपाध्याय उनके इकलौते पुत्र थे।
सन् 1839 में ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने संस्कृत विधि की परीक्षा सफलतापूर्वक उत्तीर्ण की। 1841 में ईश्वर चंद्र ने फोर्ट विलियम कॉलेज में संस्कृत विभाग के प्रमुख के रूप में दायित्व संभाला।
पांच साल बाद 1846 में विद्यासागर ने फोर्ट विलियम कॉलेज छोड़ दिया और संस्कृत कॉलेज में 'सहायक सचिव' के रूप में शामिल हो गए। सेवा के पहले वर्ष में ईश्वर चंद्र ने मौजूदा शिक्षा प्रणाली में कई बदलावों की सिफारिश की। इस रिपोर्ट के परिणामस्वरूप ईश्वर चंद्र और कॉलेज सचिव रसोमय दत्ता के बीच गंभीर विवाद हुआ। उन्होंने 1849 में संस्कृत कॉलेज से इस्तीफा दे दिया और फोर्ट विलियम कॉलेज में प्रधान क्लर्क बन गए।
विद्यासागर बंगाल पुनर्जागरण के प्रमुख समर्थकों में से एक के रूप में प्रसिद्ध थे। वे हिंदू विधवा पुनर्विवाह के सबसे प्रमुख प्रचारक थे, जिन्होंने कड़े विरोध के बावजूद विधान परिषद में याचिका दायर की, जिसमें राधाकांत देब और धर्म सभा द्वारा दायर एक प्रति-याचिका भी शामिल थी। हालांकि, विधवा पुनर्विवाह को हिंदू रीति-रिवाजों का घोर उल्लंघन माना जाता था और इसका कड़ा विरोध किया जाता था। फिर भी लॉर्ड डलहौजी ने व्यक्तिगत रूप से विधेयक को अंतिम रूप दिया और हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम, 1856 पारित हुआ। बाल विवाह के विरुद्ध विद्यासागर के प्रयासों से सहमति आयु अधिनियम, 1891 पारित हुआ, जिसमें विवाह संपन्न होने की न्यूनतम आयु 12 वर्ष निर्धारित की गई थी। विधवाओं के प्रति अपनी दयालुता का प्रमाण उन्होंने स्वयं अपने बेटे का विवाह एक विधवा से करा कर दिया।
विद्यासगर ने बंगाली गद्य को सरल और आधुनिक रूप प्रदान किया, जिससे यह आम जनता के लिए सुलभ हो सका। उनकी पुस्तक ‘वर्ण परिचय’ ने बंगाली भाषा की शिक्षा को क्रांतिकारी बनाया। उन्होंने कोलकाता में मेट्रोपॉलिटन कॉलेज सहित कई स्कूलों की स्थापना की और बालिका शिक्षा को बढ़ावा दिया। संस्कृत कॉलेज में प्राचार्य के रूप में कार्य करते हुए गैर-ब्राह्मण छात्रों के लिए शिक्षा के द्वार खोले, जो एक साहसिक कदम था।
क्षुद्र व स्वार्थी व्यवहार से तंग आकर उन्होंने अपने परिवार के साथ संबंध विच्छेद कर दिया और अपने जीवन के अंतिम 18 वर्ष आदिवासी जनता के कल्याण हेतु समर्पित कर दिया। अपने जीवन के अंतिम 18 वर्ष उन्होंने झारखंड के जामताड़ा में संथाल आदिवासियों के बीच बिताए, जहां उन्होंने संथाल लड़कियों के लिए देश का पहला औपचारिक बालिका विद्यालय और एक मुफ्त होम्योपैथी क्लीनिक स्थापित किया। साहित्य के क्षेत्र में भी विद्यासागर ने अमिट छाप छोड़ी। उनकी 52 रचनाओं में से 17 संस्कृत में और पांच अंग्रेजी में थीं। ईश्वर चंद्र विद्यासागर का जीवन सादगी, साहस और समाज सेवा का प्रतीक है। ईश्वर चंद्र विद्यासागर का 29 जुलाई 1881 को निधन हो गया था।
--आईएएनएस
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