ईरान तेल की कीमत से अमेरिका को चोट पहुंचाएगा, भारत की रसोई पर भी पड़ेगा असर : एक्सपर्ट सुरिंदर सिंह लाली
नोएडा, 11 सितंबर (आईएएनएस)। अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ सुरिंदर सिंह लाली ने कहा कि ईरान समझ गया है कि वह सीधे हमले की जगह तेल की कीमतों से अमेरिका को चोट पहुंचा सकता है। लाली ने चेतावनी दी कि तेल, उर्वरक और हीलियम की कीमतें बढ़ने से भारत के चालू खाते के घाटे, महंगाई और रुपए पर सीधा असर पड़ेगा, जो हर भारतीय रसोई तक पहुंचेगा।
सुरिंदर सिंह लाली ने कहा, "ईरान ने एक बात समझ ली है कि अगर उसे अमेरिका का गला घोंटना है, तो वह तेल की कीमतों से कर सकता है, क्योंकि ईरान 8,000 किलोमीटर दूर जाकर हमला नहीं कर सकता। या वह मध्य-पूर्व में अमेरिकी ठिकानों पर हमला कर सकता है। लेकिन अगर ईरान बाकी दुनिया को, खासकर अमेरिका को, प्रभावित करना चाहता है, तो उसे तेल की कीमतों के जरिए करना होगा, क्योंकि अमेरिका सबसे बड़ा उपभोक्ता है।"
उन्होंने कहा कि अमेरिका में दुनिया में सबसे ज्यादा गाड़ियां हैं। जब आम अमेरिकी नागरिक पेट्रोल लेने जाता है और प्रति गैलन 1.5 डॉलर महंगा हो जाता है, तो डीजल और भी महंगा मिलेगा। इससे उनकी जेब पर सीधी चोट पड़ती है और इसका दबाव सीधे ट्रंप पर पड़ता है। मध्यावधि चुनाव नजदीक हैं और ट्रंप को अंदर से भी संकेत मिल गया है कि उनके जीतने की संभावना कम है।
सुरिंदर सिंह लाली ने कहा कि यह पैसा कहां से आएगा, यह किसी को नहीं पता, लेकिन अमेरिका ने लोगों को यह लॉलीपॉप दिया है। अब समस्या यह है कि इसका असर भारत पर भी पड़ रहा है क्योंकि अमेरिका ने कहीं न कहीं भारत पर भी दबाव बनाया है। सवाल यह है कि भारत तेल किससे खरीदेगा, क्या करेगा और उसकी स्थिति क्या होगी? तेल की कीमत, पेट्रोलियम उत्पाद, उर्वरक और हीलियम की कीमतें जहां भी जाएंगी, उनका असर हर जगह पड़ेगा। भारत एक ऊर्जा आयातक देश है, इसलिए इसका सीधा असर चालू खाते के घाटे, महंगाई और रुपए पर पड़ेगा।
लाली ने कहा कि वह प्रार्थना करते हैं कि यह स्थिति लंबे समय तक न चले, क्योंकि ईरान भी थक चुका है। ट्रंप भी जानते हैं कि अब केवल 53 दिन बचे हैं। अगर वह 'लेम डक' बन गए तो स्थिति संभाल नहीं पाएंगे। अमेरिका खुद तय नहीं कर पा रहा है कि यह युद्ध है या नहीं। ट्रंप कभी इसे युद्ध कहते हैं, क्योंकि अमेरिकी कानून के तहत 60 दिनों तक युद्ध लड़ा जा सकता है। अब वह 60 दिन से ज्यादा हो चुके हैं, फिर भी अराजकता और हमले जारी हैं। वहीं उपराष्ट्रपति जेडी वेंस कह रहे हैं कि यह युद्ध नहीं, बल्कि झड़पें हैं, जबकि हकीकत में यह एक पूर्ण युद्ध है जिसमें पूरी दुनिया शामिल है। इसमें रूस, चीन, जीसीसी देश, पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया सब शामिल हैं।
उन्होंने कहा कि चीन ने बिना एक गोली चलाए अमेरिका की ताकत, कमजोरियों और सैन्य क्षमता की मुफ्त केस स्टडी हासिल कर ली है। इसलिए अगर चीन कल ताइवान की ओर बढ़ता है तो उसे ज्यादा रिसर्च करने की जरूरत नहीं पड़ेगी, क्योंकि पूरी जानकारी पहले से ही उसकी टेबल पर है। रूस, जो पहले अलग-थलग पड़ा था, अब न सिर्फ मुख्यधारा में लौट आया है, बल्कि तेल से पैसा कमा कर अपने दूसरे युद्धों को फंड भी कर रहा है। जीसीसी देशों की हालत सिर कटी मुर्गियों जैसी है, क्योंकि 70 के दशक के मध्य में पेट्रोडॉलर आने के बाद से उन्हें लगता था कि उन्होंने सुरक्षा के लिए अमेरिका को पैसा देकर खरीद लिया है। पाकिस्तान एक तरह से 'उपयोगी बेवकूफ' साबित हुआ है, लेकिन वह भी अपने मकसद में नाकाम रहा।
उन्होंने कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच 195 दिनों की लड़ाई के बाद अब मध्यावधि चुनाव में सिर्फ 53 दिन बचे हैं। इससे पता चलेगा कि डोनाल्ड ट्रंप को वोट देने वाले 7.7 करोड़ लोग अभी भी उनके साथ हैं या नहीं, और इसकी संभावना कम लगती है। कल डलास में हुई रैली, जो आमतौर पर मध्यावधि चुनाव के लिए नहीं होती, उसमें ट्रंप ने कहा कि जो भी उन्हें यानी हाउस और सीनेट में वोट देगा, उसे वह 5,000 डॉलर देंगे। कानूनी तौर पर यह संभव नहीं लगता, लेकिन इससे अंदाजा लगता है कि उनकी अंदरूनी रिसर्च टीम उन्हें क्या बता रही है और उनके 'लेम डक' बनने की कितनी संभावना है।
--आईएएनएस
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