नकली दवाओं का अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क बेनकाब, वीडियो में देंखे तुर्किये से मंगवाए जाते थे Pfizer के लेबल, कर्नाटक में 5 करोड़ की दवाएं जब्त
कर्नाटक में नकली दवाएं बनाने और बेचने वाले गिरोह की जांच में कथित तौर पर अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क का खुलासा हुआ है। जांच कर रही स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) के मुताबिक, गिरोह का सरगना आर. प्रशांत रंजन बाबू विदेश से दवाओं के ब्रांडेड लेबल मंगवाता था। आरोप है कि तुर्किये से फाइजर (Pfizer) की दवाओं के लेबल मंगाकर उनकी नकल तैयार की जाती थी। इन लेबल और क्यूआर कोड का इस्तेमाल नकली दवाओं को असली जैसा दिखाने के लिए किया जाता था। जांच एजेंसी के अनुसार, गिरोह का सरगना अजरबैजान में रह रहा था। मामले में सामने आए तथ्यों से आशंका है कि नकली दवाओं की सप्लाई के लिए अलग-अलग देशों में मौजूद संपर्कों का इस्तेमाल किया जा रहा था। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क में शामिल लोगों और उनकी भूमिका की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी।
10 हजार शीशियों पर मिले फाइजर के लेबल
जांच के दौरान फाइजर के लेबल वाली करीब 10 हजार शीशियां मिलने की जानका सामने आई है। आरोप है कि गिरोह नकली लेबल और क्यूआर कोड तैयार कर उन्हें दवाओं की शीशियों पर लगाता था। इस तरह उत्पाद को असली दवा की तरह पेश करने की कोशिश की जाती थी।क्यूआर कोड और पैकेजिंग की नकल उपभोक्ताओं के लिए जोखिम बढ़ा सकती है, क्योंकि केवल बाहरी पैकेज देखकर दवा की वास्तविकता का पता लगाना मुश्किल हो सकता है। नकली दवाओं में गलत सामग्री, गलत मात्रा या प्रभावी दवा के बजाय कोई दूसरा पदार्थ होने का खतरा रहता है। इससे मरीजों के इलाज पर गंभीर असर पड़ सकता है।
छापेमारी में 5 करोड़ रुपये की दवाएं बरामद
बताया गया है कि 18 अगस्त को बेंगलुरु के आसपास बिदादी और दोड्डेरी में छापेमारी की गई थी। इस कार्रवाई में करीब 5 करोड़ रुपये मूल्य की कथित नकली दवाएं बरामद हुईं। इसके अलावा बिल, इंजेक्शन भरने के उपकरण और नकली लेबल भी मिले।मामले में अब तक सात लोगों को गिरफ्तार किए जाने की जानकारी दी गई है। जांच एजेंसी अब यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि दवाएं कहां तैयार की जाती थीं, उनकी पैकेजिंग कैसे होती थी और उन्हें किन बाजारों या ग्राहकों तक पहुंचाया जाता था। यह भी जांच का विषय है कि नेटवर्क के तार भारत के बाहर किन लोगों और कंपनियों तक जुड़े हुए हैं।
नकली दवाओं पर अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों की नजर
नकली दवाओं की समस्या केवल भारत तक सीमित नहीं है। इंटरपोल के ऑपरेशन पांजिया जैसे अभियानों में भी कथित तौर पर नकली और अवैध मेडिकल उत्पादों की अंतरराष्ट्रीय सप्लाई के मामलों की जांच की गई है। ऐसे गिरोह अक्सर दवा कंपनियों के नाम, पैकेजिंग और दूसरे पहचान चिह्नों की नकल कर ग्राहकों को धोखा देने की कोशिश करते हैं।भारत में इससे पहले दिल्ली-एनसीआर में कथित नकली कैंसर दवा नेटवर्क की जांच के दौरान भी विदेश से जुड़े संपर्कों की चर्चा सामने आई थी। यूरोप और ब्रिटेन में भी नकली दवाओं की सप्लाई रोकने के लिए कार्रवाई की जाती रही है।
मरीजों के लिए क्यों गंभीर है मामला?
नकली दवाएं मरीजों की सेहत के लिए गंभीर खतरा बन सकती हैं। खासकर कैंसर, संक्रमण और अन्य गंभीर बीमारियों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाओं की नकली खेप मरीजों को नुकसान पहुंचा सकती है और जरूरी उपचार में देरी करा सकती है।विशेषज्ञों की सामान्य सलाह है कि दवाएं अधिकृत फार्मेसी से ही खरीदें, पैकेजिंग में असामान्य बदलाव दिखने पर सतर्क रहें और संदिग्ध दवा का इस्तेमाल करने से पहले डॉक्टर या फार्मासिस्ट से संपर्क करें। केवल क्यूआर कोड स्कैन कर लेने से किसी दवा के असली होने की पूरी गारंटी नहीं मिलती।कर्नाटक में चल रही जांच के निष्कर्षों से यह स्पष्ट होगा कि इस कथित नेटवर्क का विस्तार कितना बड़ा था और नकली दवाओं की सप्लाई में कौन-कौन शामिल थे