त्योहारों के मौसम में भारतीय रेलवे का अद्भुत कारनामा: जानिए किस स्पेशल फॉर्मूले से रातों-रात तैयार हो जाती हैं हजारों फेस्टिवल स्पेशल ट्रेनें
दिवाली और छठ पूजा जैसे बड़े त्योहारों पर बिहार और पूर्वांचल जाने वाले यात्रियों की संख्या अचानक बढ़ जाती है। दिल्ली, मुंबई, सूरत, लुधियाना और देश के दूसरे बड़े शहरों से लाखों लोग अपने घर लौटना चाहते हैं। ऐसे में नियमित ट्रेनों में सीट मिलना बेहद मुश्किल हो जाता है। कई बार वेटिंग टिकट भी कन्फर्म नहीं हो पाता। यात्रियों की इसी परेशानी को देखते हुए भारतीय रेलवे हर साल सैकड़ों स्पेशल ट्रेनें चलाता है।
इस बार भी दिवाली और छठ के मौके पर रेलवे ने 1,053 से अधिक स्पेशल ट्रेन ट्रिप्स चलाने की घोषणा की है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि अचानक इतनी सारी ट्रेनें कहां से आ जाती हैं? क्या रेलवे त्योहारों के लिए नए इंजन और हजारों डिब्बे तैयार रखता है? आखिर कुछ ही समय में इतनी बड़ी संख्या में ट्रेनें चलाने के पीछे रेलवे की क्या योजना होती है?
दरअसल, इसके पीछे रेलवे की एक खास रणनीति और लंबी तैयारी होती है। स्पेयर कोच से लेकर कम भीड़ वाले रूट्स की ट्रेनों और नए बने डिब्बों तक, कई तरीकों से अतिरिक्त ट्रेनें तैयार की जाती हैं।
हर साल हजारों स्पेशल ट्रेनें चलाता है रेलवे
त्योहारों के दौरान यात्रियों की भीड़ को संभालने के लिए रेलवे बड़े स्तर पर स्पेशल ट्रेनों का संचालन करता है। सरकारी सूचना एजेंसी PIB के मुताबिक, रेलवे ने वित्त वर्ष 2023-24 में करीब 40,500 और 2024-25 में 85,400 स्पेशल ट्रेनें चलाई थीं। इस साल दिवाली और छठ पूजा के लिए भी 1,053 से ज्यादा स्पेशल ट्रेन ट्रिप्स का ऐलान किया गया है।
इन ट्रेनों का संचालन यात्रियों की मांग, वेटिंग लिस्ट और टिकट बुकिंग के आंकड़ों को ध्यान में रखकर किया जाता है। यानी रेलवे को पहले से अंदाजा होता है कि किन रूट्स पर यात्रियों की संख्या सबसे ज्यादा रहने वाली है।
1. स्पेयर रैक और स्टैंडबाय कोच से तैयार होती हैं ट्रेनें
रेलवे हर जोन और डिवीजन में कुछ अतिरिक्त कोच और पूरी ट्रेन के बैकअप सेट रिजर्व रखता है। इन्हें स्पेयर कोच और स्क्रैच रैक कहा जाता है। सामान्य दिनों में इनका इस्तेमाल ट्रेन में तकनीकी खराबी, दुर्घटना या किसी दूसरी आपात स्थिति के दौरान किया जाता है।
लेकिन त्योहारों के समय रेलवे इन्हीं रिजर्व डिब्बों को इस्तेमाल में लाता है। जरूरत के हिसाब से अलग-अलग कोच जोड़कर पूरी ट्रेन का रैक तैयार किया जाता है और उसे स्पेशल ट्रेन के रूप में चलाया जाता है।
आसान भाषा में समझें तो स्क्रैच रैक अतिरिक्त या उपलब्ध डिब्बों को मिलाकर तैयार किया गया ट्रेन का पूरा सेट होता है। इसे जरूरत पड़ने पर कम समय में संचालन के लिए तैयार किया जा सकता है।
ईस्टर्न रेलवे के एक अधिकारी के मुताबिक, आसनसोल डिवीजन ने 2025 में छठ पूजा के दौरान स्पेयर कोचों की मदद से ऐसे ही स्क्रैच रैक तैयार किए थे।
2. कम भीड़ वाले रूट्स की ट्रेनों के कोच दूसरी जगह लगाए जाते हैं
त्योहारों के दौरान हर रूट पर यात्रियों की संख्या एक जैसी नहीं होती। दिल्ली-बिहार, मुंबई-उत्तर प्रदेश और बेंगलुरु-कोलकाता जैसे रूट्स पर भारी भीड़ रहती है, जबकि कुछ दूसरे रूट्स पर यात्रियों की संख्या तुलनात्मक रूप से कम हो जाती है।
ऐसे में रेलवे टिकट बुकिंग और यात्रियों की मांग का विश्लेषण करता है। जिन रूट्स पर सीटें खाली रहने की संभावना होती है, वहां ट्रेनों के फेरे कम किए जा सकते हैं या जरूरत के अनुसार उनके कुछ डिब्बे निकालकर अधिक भीड़ वाले रूट्स पर इस्तेमाल किए जाते हैं।
PIB के मुताबिक, नॉर्थ सेंट्रल रेलवे ने 2026 में 'ट्रेन्स ऑन डिमांड' (TOD) के तहत 1,000 से अधिक स्पेशल ट्रेन ट्रिप्स चलाए। इनका शेड्यूल वेटिंग लिस्ट और बुकिंग के आंकड़ों के आधार पर तैयार किया गया था।
3. मेंटेनेंस का शेड्यूल इस तरह बनता है कि ज्यादा ट्रेनें चल सकें
रेलवे के डिब्बों की नियमित सफाई, जांच और मरम्मत जरूरी होती है। इस प्रक्रिया को पीरियोडिकल ओवरहॉलिंग (POH) कहा जाता है। अलग-अलग तरह के कोच के लिए इसकी समय-सीमा भी अलग होती है।
-
ICF कोच की POH सामान्य तौर पर हर 18 महीने में होती है।
-
LHB कोच की POH सामान्य तौर पर हर 36 महीने में होती है।
त्योहारों के दौरान रेलवे अपने मेंटेनेंस शेड्यूल को इस तरह व्यवस्थित करता है कि ज्यादा से ज्यादा ट्रेनें यात्रियों की सेवा में उपलब्ध रहें। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि सुरक्षा से जुड़े जरूरी मेंटेनेंस को टाल दिया जाता है या रद्द कर दिया जाता है।
करीब 25 साल की सर्विस लाइफ पूरी करने वाले कोचों का इस्तेमाल भी केवल निर्धारित सुरक्षा मानकों और जांच के बाद ही किया जा सकता है। रेलवे इसे किसी तरह की नियमित 'आखिरी ड्यूटी' नीति नहीं मानता।
4. कोच फैक्ट्रियों से नए डिब्बों की सप्लाई
स्पेशल ट्रेनें चलाने के लिए रेलवे केवल पुराने या रिजर्व कोचों पर निर्भर नहीं रहता। देश की प्रमुख कोच निर्माण फैक्ट्रियों में लगातार नए डिब्बे तैयार किए जाते हैं।
इनमें प्रमुख हैं:
-
इंटीग्रल कोच फैक्ट्री (ICF)
-
मॉडर्न कोच फैक्ट्री (MCF)
-
रेल कोच फैक्ट्री (RCF)
रेलवे की कोशिश रहती है कि तैयार हो चुके नए कोचों को जल्द से जल्द अपने बेड़े में शामिल किया जाए। जरूरत पड़ने पर उपलब्ध नए डिब्बों का इस्तेमाल त्योहारों के दौरान अतिरिक्त ट्रेनें चलाने में भी किया जा सकता है।
PIB के अनुसार, वित्त वर्ष 2021-22 से 2025-26 (फरवरी 2026 तक) के दौरान रेलवे ने 1,024 नई ट्रेनें शुरू कीं, 907 ट्रेनों का विस्तार किया और 4,651 कोचों की क्षमता बढ़ाई यानी उनमें अतिरिक्त डिब्बे जोड़े।
5. अतिरिक्त कोच जोड़कर बढ़ाई जाती है यात्रियों की क्षमता
कई बार रेलवे को पूरी नई स्पेशल ट्रेन चलाने की जरूरत नहीं पड़ती। वह पहले से चल रही नियमित ट्रेनों में अतिरिक्त डिब्बे जोड़कर भी यात्रियों को राहत देता है।
उदाहरण के तौर पर, उत्तर रेलवे ने 2025 में त्योहारों के दौरान 52 अतिरिक्त कोच जोड़कर 2,740 ट्रेन ट्रिप्स संचालित किए थे। इससे करीब 2.06 लाख यात्रियों को अतिरिक्त सीटें उपलब्ध कराने में मदद मिली।
इस तरह रेलवे एक तरफ नई स्पेशल ट्रेनें चलाता है, तो दूसरी तरफ मौजूदा ट्रेनों की क्षमता भी बढ़ाता है।
आखिर कैसे संभालता है रेलवे इतनी बड़ी भीड़?
दिवाली और छठ जैसे त्योहारों पर अचानक लाखों यात्रियों का दबाव बढ़ जाता है। ऐसे में रेलवे को केवल इंजन और डिब्बों का इंतजाम नहीं करना होता, बल्कि रूट, प्लेटफॉर्म, स्टाफ, मेंटेनेंस और ट्रेन संचालन के बीच भी तालमेल बैठाना पड़ता है।
इसके लिए रेलवे के अलग-अलग जोन और डिवीजन मिलकर काम करते हैं। टिकट बुकिंग और वेटिंग लिस्ट के आंकड़ों के आधार पर ज्यादा मांग वाले रूट्स की पहचान की जाती है। फिर उपलब्ध कोचों, रिजर्व रैक और नई बोगियों की मदद से अतिरिक्त ट्रेनें तैयार की जाती हैं।
यानी त्योहारों पर अचानक दिखाई देने वाली सैकड़ों स्पेशल ट्रेनें किसी जादू से नहीं आतीं। इनके पीछे रेलवे की पहले से बनाई गई योजना, कोचों का बेहतर इस्तेमाल और अलग-अलग विभागों के बीच तालमेल काम करता है। इसी व्यवस्था की मदद से हर साल लाखों लोग दिवाली और छठ मनाने अपने घर पहुंच पाते हैं।