भारत में अब तक कितनी महिलाओं को मिली मौत की सजा? सिर्फ एक महिला को दी गई फांसी, जानें क्या कहता है कानून
उत्तर प्रदेश के मेरठ में अक्टूबर महीने में दो अलग-अलग मामलों में महिलाओं और उनके साथियों को पति की हत्या के मामले में मौत की सजा सुनाए जाने के बाद देश में महिला दोषियों को फांसी दिए जाने का मुद्दा चर्चा में है। ऐसे में सवाल उठता है कि भारत में अब तक कितनी महिलाओं को मृत्युदंड सुनाया गया है और वास्तव में कितनी महिलाओं को फांसी दी गई है।
नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में निचली अदालतों द्वारा सुनाई गई मौत की सजा के कई फैसले ऊपरी अदालतों में बदल दिए गए। रिपोर्ट में 2016 से 2025 के बीच मृत्युदंड से जुड़े मामलों का विश्लेषण किया गया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, आजादी के बाद भारत में कानूनी रूप से फांसी दी गई महिलाओं में रतन बाई जैन का नाम दर्ज है। उन्हें तीन बच्चियों की हत्या के मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद 3 जनवरी 1955 को दिल्ली की तिहाड़ जेल में फांसी दी गई थी।
आजादी के बाद सिर्फ एक महिला को फांसी
भारत में मृत्युदंड का प्रावधान होने के बावजूद महिलाओं को वास्तव में फांसी दिए जाने के मामले बेहद दुर्लभ रहे हैं। रतन बाई जैन को आजादी के बाद कानूनी रूप से फांसी दी गई एकमात्र महिला बताया जाता है। उन्हें तीन बच्चियों की हत्या के मामले में दोषी ठहराया गया था और 1955 में तिहाड़ जेल में फांसी दी गई।
इसके बाद अब तक किसी दूसरी महिला को भारत में फांसी दिए जाने का मामला सामने नहीं आया है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि अदालतों ने महिलाओं को कभी मृत्युदंड नहीं सुनाया। कई मामलों में महिला दोषियों को मौत की सजा सुनाई गई, लेकिन अपील और न्यायिक समीक्षा के दौरान फैसले बदल गए या सजा कम कर दी गई।
निचली अदालत की सजा पर हाईकोर्ट की मंजूरी जरूरी
भारत में किसी भी दोषी को निचली अदालत से मौत की सजा मिल जाने का अर्थ यह नहीं है कि उसे तुरंत फांसी दे दी जाएगी। कानून में मृत्युदंड की पुष्टि के लिए विशेष न्यायिक प्रक्रिया निर्धारित है।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 407 के तहत सत्र न्यायालय द्वारा सुनाई गई मौत की सजा को हाईकोर्ट के पास पुष्टि के लिए भेजना आवश्यक है। हाईकोर्ट मामले के तथ्यों, सबूतों और कानूनी पहलुओं की समीक्षा करता है। उसकी पुष्टि के बिना मौत की सजा लागू नहीं की जा सकती।
इसके बाद भी दोषी के पास कानूनी उपाय उपलब्ध रहते हैं। वह सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सकता है। निर्धारित परिस्थितियों में समीक्षा याचिका और क्यूरेटिव याचिका भी दायर की जा सकती है। इसके अलावा, दोषी राष्ट्रपति या संबंधित राज्य के राज्यपाल के समक्ष दया याचिका पेश कर सकता है।
2016 से 2025 के बीच हाईकोर्ट ने कितनी सजाएं बरकरार रखीं?
नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, 2016 से 2025 के दौरान निचली अदालतों द्वारा सुनाए गए मृत्युदंड के मामलों में हाईकोर्ट ने केवल 9.77 प्रतिशत मामलों में सजा बरकरार रखी।
यह आंकड़ा बताता है कि निचली अदालत द्वारा मृत्युदंड सुनाए जाने के बाद न्यायिक प्रक्रिया में फैसलों की व्यापक समीक्षा होती है। ऊपरी अदालतें मामले के सबूतों, अपराध की परिस्थितियों और लागू कानून के आधार पर निर्णय लेती हैं।
हालांकि, 9.77 प्रतिशत का आंकड़ा संबंधित अवधि में रिपोर्ट के दायरे में आने वाले मामलों से जुड़ा है। इसे भारत में मृत्युदंड पाए सभी दोषियों या केवल महिला दोषियों का आंकड़ा नहीं समझना चाहिए।
मेरठ के मामलों के बाद फिर चर्चा में मृत्युदंड
मेरठ में अक्टूबर में सामने आए दोनों मामलों में महिलाओं और उनके साथियों को पति की हत्या के लिए मौत की सजा सुनाए जाने के बाद यह विषय फिर चर्चा में आया है। लेकिन निचली अदालत का फैसला अंतिम कानूनी चरण नहीं होता। इन मामलों में भी आगे की न्यायिक प्रक्रिया और संभावित अपीलों का महत्व रहेगा।
कुल मिलाकर, भारत में मृत्युदंड सुनाए जाने और वास्तव में फांसी दिए जाने के बीच कई कानूनी चरण होते हैं। हाईकोर्ट की पुष्टि, सुप्रीम कोर्ट में अपील और दया याचिका जैसी प्रक्रियाएं यह सुनिश्चित करने के लिए हैं कि किसी व्यक्ति को मृत्युदंड देने से पहले मामले की गहन समीक्षा हो।