×

कुम्भलगढ़ किले का इतिहास: 36 किलोमीटर लंबी दीवार, जहां बचपन बीता था महाराणा प्रताप का

 

राजस्थान के राजसमंद जिले में अरावली की पहाड़ियों के बीच स्थित कुम्भलगढ़ किला अपनी अभेद्य सुरक्षा व्यवस्था, विशाल दीवार और गौरवशाली इतिहास के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है। मेवाड़ की शान कहे जाने वाले इस दुर्ग का निर्माण 15वीं शताब्दी में महाराणा कुम्भा ने करवाया था। समुद्र तल से करीब 1,100 मीटर की ऊंचाई पर स्थित कुम्भलगढ़ को राजस्थान के सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक किलों में गिना जाता है।

<a style="border: 0px; overflow: hidden" href=https://youtube.com/embed/opwlc1NpTIc?autoplay=1&mute=1><img src=https://img.youtube.com/vi/opwlc1NpTIc/hqdefault.jpg alt=""><span><div class="youtube_play"></div></span></a>" style="border: 0px; overflow: hidden;" width="640">
महाराणा कुम्भा ने करवाया था निर्माण

इतिहास के अनुसार कुम्भलगढ़ दुर्ग का निर्माण महाराणा कुम्भा के शासनकाल में 15वीं शताब्दी के दौरान कराया गया। दुर्ग के निर्माण और स्थापत्य में तत्कालीन वास्तुकला की उन्नत तकनीक का इस्तेमाल किया गया था। पहाड़ियों से घिरा होने के कारण यह किला प्राकृतिक रूप से भी बेहद सुरक्षित स्थान पर बनाया गया था।किले की मजबूत दीवारें, विशाल बुर्ज और प्रवेश द्वार इसे एक अभेद्य दुर्ग का स्वरूप देते हैं। कुम्भलगढ़ मेवाड़ की सैन्य रणनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता था।

36 किलोमीटर लंबी दीवार

कुम्भलगढ़ की सबसे बड़ी पहचान इसकी विशाल किलेबंदी की दीवार है। आमतौर पर इसकी लंबाई करीब 36 किलोमीटर बताई जाती है। यही वजह है कि इसे अक्सर भारत की दूसरी सबसे लंबी सतत दीवार और कभी-कभी ‘भारत की चीन की दीवार’ जैसे नामों से भी संबोधित किया जाता है।दीवार कई पहाड़ियों और घाटियों से होकर गुजरती है। इसकी मोटाई अलग-अलग स्थानों पर कई मीटर तक बताई जाती है। दुर्ग के भीतर जाने के लिए कई विशाल द्वार बनाए गए थे, जिनमें राम पोल और हनुमान पोल प्रमुख हैं।

महाराणा प्रताप का जन्म कुम्भलगढ़ में

कुम्भलगढ़ का इतिहास महाराणा प्रताप से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 को कुम्भलगढ़ दुर्ग में हुआ था। मेवाड़ के इस महान योद्धा का बचपन अरावली के इसी क्षेत्र में बीता।मुगल काल में भी कुम्भलगढ़ का रणनीतिक महत्व बना रहा। इसकी भौगोलिक स्थिति और मजबूत किलेबंदी के कारण इसे जीतना आसान नहीं था।

किले के अंदर हैं सैकड़ों मंदिर

कुम्भलगढ़ केवल सैन्य दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं था, बल्कि यह धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र भी रहा है। किले के परिसर में 300 से अधिक प्राचीन मंदिरों के होने का उल्लेख मिलता है। इनमें हिंदू और जैन परंपराओं से जुड़े मंदिर शामिल हैं।किले के भीतर स्थित बादल महल भी पर्यटकों के बीच खास आकर्षण का केंद्र है। ऊंचाई पर स्थित इस महल से अरावली की पहाड़ियों और आसपास के क्षेत्र का शानदार दृश्य दिखाई देता है।

यूनेस्को विश्व धरोहर में शामिल

कुम्भलगढ़ को राजस्थान के अन्य प्रमुख पहाड़ी किलों के साथ यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया है। आज यह राजस्थान के प्रमुख पर्यटन स्थलों में से एक है और इतिहास, स्थापत्य तथा राजपूताना संस्कृति में रुचि रखने वाले लोगों को आकर्षित करता है।कुम्भलगढ़ किला केवल पत्थरों से बना एक दुर्ग नहीं, बल्कि मेवाड़ के शौर्य, रणनीति और स्वाभिमान की जीवंत कहानी है। इसकी विशाल दीवारें आज भी उस दौर की स्थापत्य क्षमता और राजपूताना गौरव की गवाही देती हैं।