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तमिलनाडु: उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन ने रानी वेलु नचियार को श्रद्धांजलि दी, सौम्यनारायण पेरुमल मंदिर भी पहुंचे

 

चेन्नई, 22 फरवरी (आईएएनएस)। उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने रविवार को तमिलनाडु के शिवगंगा में वीरमंगई रानी वेलु नचियार को श्रद्धांजलि अर्पित की। इस दौरान उपराष्ट्रपति ने कहा कि रानी नचियार का जीवन और विरासत देश को विकसित भारत की यात्रा में मार्गदर्शन करेगी। उन्होंने वीरमंगई रानी वेलु नाचियार के वंशजों से भी बातचीत की।

रानी वेलु नचियार 18वीं सदी की एक वीरांगना और तमिलनाडु के शिवगंगा राज्य की रानी थीं। उन्हें अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने वाली भारत की पहली रानी माना जाता है।

एक अन्य कार्यक्रम में, उपराष्ट्रपति ने शिवगंगा पैलेस में राजा मुथु विजया रघुनाथ सशिवर्णा पेरिया उदय थेवर को पुष्पांजलि अर्पित की। सोशल मीडिया पर जारी एक बयान के अनुसार, राधाकृष्णन ने शिवगंगा के तिरुकोष्टियूर स्थित सौम्यनारायण पेरुमल मंदिर का भी दौरा किया और सभी की शांति, समृद्धि और कल्याण के लिए प्रार्थना की।

एक दिन पहले, अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन ने तमिल और गुजराती में भारत के संविधान के अपडेट संस्करणों के साथ-साथ विधि शब्दावली (अंग्रेजी-हिंदी) का आठवां संस्करण जारी किया था।

उन्होंने तमिल को समृद्ध साहित्यिक विरासत वाली विश्व की सबसे प्राचीन शास्त्रीय भाषाओं में से एक और गुजराती को गहन सांस्कृतिक और दार्शनिक गहराई वाली भाषा बताया था। उन्होंने कहा था कि इस पहल से संविधान लोगों तक उनकी अपनी भाषाओं में पहुंचेगा, जिससे लोकतांत्रिक भागीदारी और जागरूकता मजबूत होगी।

सोशल मीडिया पर जारी एक बयान में कहा गया है कि उपराष्ट्रपति ने इन अनुवादों को प्रकाशित करने और संविधान को देशभर के नागरिकों के लिए अधिक सुलभ बनाने में किए गए व्यापक कार्य के लिए विधि और न्याय मंत्रालय की सराहना की।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के अवसर पर तमिल और गुजराती में संविधान के अद्यतन संस्करणों का विमोचन करना अत्यंत प्रसन्नता का विषय है। उन्होंने कहा कि इस महत्वपूर्ण दिन पर इन संस्करणों का विमोचन पहचान, विचार और सांस्कृतिक निरंतरता को आकार देने में मातृभाषाओं के महत्व को रेखांकित करता है।

भारत की भाषाई समृद्धि पर प्रकाश डालते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि देश की प्रत्येक भाषा, तमिल से लेकर कश्मीरी तक, गुजराती से लेकर असमिया तक सदियों पुरानी विरासत को समेटे हुए है।

उन्होंने कहा कि भारत का संविधान इस विविधता को मान्यता देता है और बहुभाषावाद को एक शक्ति के रूप में मनाता है। उन्होंने टिप्पणी की कि विश्व में कहीं भी ऐसा देश नहीं मिलेगा जहां संविधान इतनी भाषाओं में उपलब्ध हो।

--आईएएनएस

सत्यम दुबे/वीसी