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ईरान युद्धविराम की घोषणा : ट्रंप के फैसले पर अमेरिका में मिली-जुली प्रतिक्रिया

 

वाशिंगटन, 8 अप्रैल (आईएएनएस)। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा अमेरिका और ईरान के बीच दो हफ्ते के संघर्ष-विराम की घोषणा ने अमेरिकी राजनीतिक हलकों में तीखी और बंटी हुई प्रतिक्रियाएं पैदा कर दी हैं। कुछ लॉमेकर्स कूटनीति का समर्थन कर रहे हैं, तो कुछ ने इसे लेकर सचेत रहने के लिए कहा है।

घोषणा के अनुसार, वाशिंगटन और तेहरान ने 10-सूत्रीय प्रस्ताव पर काम करने और होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने की अनुमति देने पर सहमति जताई है। रिपब्लिकन लॉमेकर मॉर्गन ग्रिफ़िथ ने इस कदम का स्वागत किया और बातचीत के लिए मजबूर करने का श्रेय सैन्य दबाव को दिया।

उन्होंने कहा, "ईरान के साथ संघर्ष-विराम समझौता करने के लिए राष्ट्रपति ट्रंप की सराहना की जानी चाहिए। अमेरिकी सशस्त्र बलों के बेहतरीन प्रयासों की बदौलत, ईरान पंगु हो गया है और उसे बातचीत की मेज पर आने के लिए मजबूर होना पड़ा है।"

ग्रिफ़िथ ने अमेरिका के एक प्रमुख उद्देश्य को रेखांकित करते हुए कहा: "मैं ऐसी बातचीत का समर्थन करता हूं जिसका परिणाम यह हो कि ईरान के पास कभी भी परमाणु क्षमताएं न हों। साथ ही, मैं उन अमेरिकियों के लिए प्रार्थना कर रहा हूं जिन्होंने अपने देश के लिए अपनी जान दे दी, और उनके परिवारों के लिए भी। उनकी सेवा की सराहना की जानी चाहिए।"

पेन्सिलवेनिया के लॉमेकर ब्रायन फिट्ज़पैट्रिक ने इस संघर्ष-विराम को एक सतर्क लेकिन आवश्यक कदम बताया। उन्होंने कहा, "कूटनीति हमेशा हमारा उद्देश्य होनी चाहिए। यह अस्थायी संघर्ष-विराम समझौता उस दिशा में एक रचनात्मक कदम है, और हम घटनाक्रम पर बारीकी से नज़र रखना जारी रखेंगे। कोई भी ऐसा कदम जो अमेरिकी नागरिकों की जान बचाता हो और गंभीर शांति वार्ता के लिए जगह बनाता हो, वह सही रास्ता है। हालांकि सावधानी बरतना अभी भी जरूरी है।"

उन्होंने ईरान को लेकर अपनी पुरानी चिंताओं को दोहराते हुए कहा: "इस शासन से पैदा होने वाले खतरे को लेकर कोई अस्पष्टता नहीं हो सकती। इसे कभी भी परमाणु हथियार हासिल करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।" उन्होंने निगरानी पर भी ज़ोर दिया और कहा कि कांग्रेस को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि "जैसे-जैसे स्थिति आगे बढ़े, कांग्रेस द्वारा कड़ी निगरानी रखी जाए।"

सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने कूटनीति के प्रति सतर्क समर्थन का संकेत दिया, लेकिन जल्दबाजी में कोई निष्कर्ष निकालने के खिलाफ चेतावनी भी दी। उन्होंने कहा, "जैसा कि मैंने पहले भी कहा है, अगर कूटनीति से ईरान के आतंकवादी शासन के संबंध में सही परिणाम निकलता है, तो मैं उसे ही प्राथमिकता दूंगा। कूटनीतिक समाधान खोजने की कोशिश में शामिल सभी लोगों की कड़ी मेहनत की मैं सराहना करता हूं। हालांकि अभी मैं इस बात को लेकर बेहद सतर्क हूं कि क्या सच है और क्या मनगढ़ंत। हर पहलू को अच्छी तरह से परख लेना चाहिए।"

इंडियाना के लॉमेकर फ्रैंक मृवान ने प्रशासन पर बिना किसी स्पष्ट औचित्य के काम करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, “ईरान में राष्ट्रपति के एकतरफ़ा कदम गलत हैं, और उनकी खतरनाक बयानबाजी एक बुरी स्थिति को और भी बदतर बना रही है। हालांकि मैं प्रशासन द्वारा युद्धविराम की घोषणा को स्वीकार करता हूं, लेकिन सच तो यह है कि कोई ऐसा खतरा नहीं मंडरा रहा था। युद्ध में हमारे कोई स्पष्ट उद्देश्य नहीं थे। इसका कोई अंत नज़र नहीं आ रहा था और हमारे सैनिक अभी भी खतरे में बने हुए हैं।” मर्वान ने आगे कहा कि अमेरिकी लोग पहले से ही “गैस पंप और किराने की दुकानों पर इसके नतीजे भुगत रहे हैं।”

ऐसे ही कैलिफ़ोर्निया के कांग्रेसी केविन काइली ने अमेरिका के आचरण और कांग्रेस के अधिकार को लेकर व्यापक चिंताएं जताईं। उन्होंने जोर देते हुए कहा, “अमेरिका सभ्यताओं को नष्ट नहीं करता। और न ही हम किसी तरह की बातचीत की रणनीति के तौर पर ऐसा करने की धमकी देते हैं। चल रहे सैन्य अभियानों के संबंध में निगरानी करना कांग्रेस की ज़िम्मेदारी है।”

वहीं, सीनेटर लिसा मुर्कोव्स्की ने राष्ट्रपति की बयानबाजी की आलोचना करते हुए चेतावनी दी। उन्होंने कहा, “इस तरह की बयानबाजी उन आदर्शों का अपमान है जिन्हें हमारा देश लगभग 250 वर्षों से दुनिया भर में बनाए रखने और बढ़ावा देने की कोशिश कर रहा है। यह “विदेशों और देश के भीतर, दोनों जगहों पर अमेरिकियों को सीधे तौर पर खतरे में डालता है।”

एरिज़ोना के सीनेटर रूबेन गैलेगो ने भी इसी चिंता को दोहराया। उन्होंने कहा, “ट्रंप का ‘पूरी सभ्यता’ को खत्म करने की धमकी देना उन सभी मूल्यों का अपमान है जिनके लिए हम खड़े हैं और यह पूरी तरह से गैर-कानूनी है।”

बता दें कि यह युद्धविराम खाड़ी क्षेत्र में बढ़े हुए तनाव के बीच आया है, जहां होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक तेल शिपमेंट के लिए एक महत्वपूर्ण मार्ग बना हुआ है। वहां किसी भी तरह की रुकावट का वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर तत्काल असर पड़ता है, जिसमें भारत भी शामिल है, जो इस क्षेत्र से कच्चे तेल के आयात पर बहुत अधिक निर्भर है।

--आईएएनएस

एएस/