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त्रिपुरा विधानसभा ने महिला आरक्षण विधेयक फिर लाने की मांग की, तीखी नोंकझोक के बीच प्रस्ताव पारित

 

अगरतला, 30 अप्रैल (आईएएनएस)। त्रिपुरा विधानसभा ने गुरुवार को लंबी और तीखी बहस के बाद केंद्र सरकार से महिला आरक्षण विधेयक, यानी ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’, को फिर से लाने की मांग वाला प्रस्ताव पारित कर दिया।

यह प्रस्ताव सरकार के मुख्य सचेतक कल्याणी साहा रॉय ने पेश किया था, जिसे सत्तापक्ष के 16 अन्य विधायकों का समर्थन मिला। सत्तारूढ़ भाजपा और उसके सहयोगी दल टिपरा मोथा पार्टी और इंडिजिनस पीपुल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुर ने इसका समर्थन किया।

वहीं, विपक्षी दल माकपा और कांग्रेस ने इस प्रस्ताव का विरोध किया।

करीब सात घंटे चली चर्चा में मुख्यमंत्री माणिक साहा और उनके मंत्रिमंडल के सहयोगियों समेत कुल 25 मंत्रियों और विधायकों ने हिस्सा लिया। इसके बाद प्रस्ताव ध्वनिमत से पारित कर दिया गया।

प्रस्ताव में कहा गया, ''भारतीय महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों को और मजबूत व सुरक्षित करने के उद्देश्य से यह सदन देश के सभी संसदीय राजनीतिक दलों के बीच सहमति बनाने का आह्वान करता है और केंद्र सरकार से आग्रह करता है कि वह 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन की प्रक्रिया तुरंत शुरू करे। साथ ही संविधान (131वां संशोधन) विधेयक (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) में संशोधन के लिए नए सिरे से प्रयास करे, ताकि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए कुल सीटों में एक-तिहाई आरक्षण लागू किया जा सके।''

चर्चा में हिस्सा लेते हुए मुख्यमंत्री माणिक साहा ने विपक्षी दलों पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि विपक्ष ने पहले भी राम मंदिर निर्माण, ट्रिपल तलाक कानून, जीएसटी और ऑपरेशन सिंदूर जैसे कई अहम फैसलों का विरोध किया था, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने इन्हें सफलतापूर्वक लागू किया।

मुख्यमंत्री ने कहा, ''विपक्षी दल महिला आरक्षण विधेयक को लेकर गलत नैरेटिव बनाकर भ्रम फैला रहे हैं। महिलाओं को सशक्त बनाने के साथ-साथ यह आरक्षण हर क्षेत्र में लैंगिक भेदभाव खत्म करने में मदद करेगा।''

उन्होंने कहा कि संसद में 1996, 1998 और 2010 में महिला आरक्षण कानून लाने की कोशिश हुई थी, लेकिन सफलता नहीं मिली। आखिरकार मोदी सरकार ने 2023 में यह विधेयक पारित कराया।

मुख्यमंत्री ने अपने आधिकारिक फेसबुक पोस्ट में 17 अप्रैल को 'भारतीय लोकतंत्र का काला दिन बताया और कहा कि संसद में विपक्ष का रुख महिलाओं के सशक्तिकरण के प्रति उसकी सोच को दिखाता है।

विपक्ष के नेता और माकपा के राज्य सचिव जितेंद्र चौधरी ने सरकार के दावों का विरोध किया।

उन्होंने कहा कि 17 अप्रैल को मोदी सरकार ने संसद और राज्य विधानसभाओं में महिला आरक्षण को परिसीमन प्रक्रिया से जोड़कर 131वां संशोधन विधेयक पारित कराने की कोशिश की।

जितेंद्र चौधरी ने सदन में कहा, ''2023 में सभी विपक्षी दलों ने महिला आरक्षण विधेयक का समर्थन किया था, लेकिन इस बार भाजपा सरकार ने 131वां संशोधन विधेयक अपने राजनीतिक हितों के लिए आगे बढ़ाने की कोशिश की।''

विपक्षी सदस्यों ने यह भी कहा कि उनकी पार्टियों की सरकारों ने कई राज्यों में स्थानीय निकायों में महिलाओं को पहले ही 50 प्रतिशत आरक्षण दे रखा है।

संसदीय कार्य मंत्री रतन लाल नाथ ने कहा कि प्रस्तावित आरक्षण का विरोध करने के लिए महिलाएं विपक्षी नेताओं को माफ नहीं करेंगी।

संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 का मकसद 2029 तक लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देना है, लेकिन यह विधेयक 17 अप्रैल को लोकसभा में पारित नहीं हो सका।

संसद में इस घटनाक्रम के बाद भाजपा ने देश के अलग-अलग हिस्सों में 'जन आक्रोश पदयात्रा' शुरू की है। इस अभियान के जरिए कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, डीएमके, समाजवादी पार्टी, वाम दलों समेत अन्य विपक्षी दलों को महिला आरक्षण विधेयक का विरोध करने पर घेरा जा रहा है।

--आईएएनएस

एएमटी/डीकेपी