सूखे से निपटने के लिए मदद का खर्च आम नागरिकों से नहीं बल्कि बिचौलियों से वसूला जाए: शिवसेना (यूबीटी)
मुंबई, 29 सितंबर (आईएएनएस)। नागरिकों से निजी जश्न कम करने और अपनी बचत को सूखा राहत कार्यों में दान करने के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के आग्रह पर शिवसेना (यूबीटी) की ओर से मंगलवार को प्रशासन की मंशा और प्राथमिकताओं पर सवाल उठाया गया है।
सरकार के इस रवैये को 'खाली जेबों से पैसे निकालने' जैसा बताते हुए, उद्धव ठाकरे गुट ने पार्टी के मुखपत्र 'सामना' के एक संपादकीय में कहा कि आर्थिक तंगी से जूझ रही जनता से आपदा प्रबंधन के लिए फंड जुटाने को कहना असंवेदनशील और नाकाफी है।
संपादकीय में पूरे महाराष्ट्र में बढ़ते कृषि संकट की ओर ध्यान दिलाया गया। इसमें बताया गया कि गंभीर सूखे के कारण कर्ज और मुश्किलों से जूझ रहे परभणी, यवतमाल, सोलापुर और हिंगोली जिलों में सिर्फ दो दिनों के भीतर चार किसानों ने आत्महत्या कर ली। इसमें चेतावनी दी गई कि अगर राज्य सरकार से तुरंत और सीधी मदद नहीं मिली, तो सूखा प्रभावित इलाके 'कब्रिस्तान' में बदल सकते हैं। इन समुदायों को बचाए रखने की पूरी जिम्मेदारी मुख्यमंत्री और उनके प्रशासन पर होगी।
मुख्यमंत्री फडणवीस को सीधे चुनौती देते हुए ठाकरे गुट ने कहा कि जो आम नागरिक पहले से ही महंगाई और आर्थिक तनाव से जूझ रहे हैं, उनसे शादी और नामकरण जैसे छोटे पारिवारिक समारोहों में कटौती करने के बजाय, सरकार को आंतरिक भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी और ठेकेदारों के कमीशन पर सख्ती करनी चाहिए।
संपादकीय में राज्य की विभिन्न बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में कथित वित्तीय अनियमितताओं की ओर इशारा किया गया। इसमें कोंकण क्षेत्र में तटीय जमीन की विवादास्पद बिक्री और शक्तिपीठ एक्सप्रेसवे से जुड़े भारी फंड के लेन-देन का जिक्र किया गया।
इसमें यह भी दावा किया गया कि जनता का पैसा अक्सर ठेकेदारों को फायदा पहुंचाने के लिए दूसरी जगहों पर लगाया जाता है। मुख्यमंत्री से आग्रह किया गया कि वे जनता से कंजूसी करने को कहने के बजाय, इस तरह की पैसे की बर्बादी को रोकें ताकि सूखा राहत के लिए फंड जुटाया जा सके।
ठाकरे गुट ने कहा, "राज्य सरकार कमीशन-एजेंटों और ठेकेदारों की सरकार बन गई है। हर तरफ लूट मची है। ठेकेदारों को सरकारी खजाने का पैसा देने और अपनी जेबें भरने के लिए गैर-जरूरी परियोजनाएं बनाई जा रही हैं। अगर मुख्यमंत्री इस लूट को भी रोक दें, तो इससे सूखा प्रभावित लोगों को फायदा होगा।"
राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और नेताओं की खरीद-फरोख्त (हॉर्स-ट्रेडिंग) के आरोपों पर निशाना साधते हुए, संपादकीय में सत्ताधारी गठबंधन से कहा गया है कि वे राजनीतिक खर्चों को ग्रामीण इलाकों की मुश्किलों को दूर करने में लगाएं। इसमें सुझाव दिया गया है कि राजनीतिक दल-बदल और चुनाव प्रचार के लिए रखे गए फंड को तुरंत प्रभावित किसानों की मदद के लिए इस्तेमाल किया जाए।
इसके अलावा, संपादकीय में सरकार के लिए सूखे से निपटने के लिए बड़ा फंड जुटाने के कई अहम उपाय सुझाए गए हैं। इसमें सरकार से कहा गया है कि वह राजनीतिक सहयोगियों के लिए तय बकाया रकम को सीधे सूखा राहत कोष में ट्रांसफर करे और मुंबई के बड़े बिल्डरों, स्लम रिहैबिलिटेशन अथॉरिटी (एसआरए) के डेवलपर्स और मोटी कमाई करने वाले वरिष्ठ नौकरशाहों से बड़ा योगदान अनिवार्य करे।
संपादकीय में राज्य सरकार से आग्रह किया गया है कि वह महाराष्ट्र के कृषि क्षेत्र की मदद के लिए पीएम केयर फंड में बची हुई रकम में से 2,000 करोड़ रुपये से 4,000 करोड़ रुपये आवंटित करने की मांग करे।
आखिर में, उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना ने इस बात पर जोर दिया कि मंत्रियों द्वारा सांकेतिक दान (जैसे एक महीने की सरकारी सैलरी छोड़ना) सत्ताधारी नेताओं के पास मौजूद भारी संसाधनों को देखते हुए महज दिखावा है। पार्टी ने नेतृत्व से आग्रह किया कि वे भ्रष्ट अधिकारियों, ठेकेदारों और राजनीतिक बिचौलियों की फल-फूल रही मिलीभगत को तोड़कर असली हिम्मत दिखाएं, ताकि राज्य के 11 करोड़ नागरिकों को वास्तविक राहत मिल सके।
--आईएएनएस
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