केरल पीएससी विवाद पर एसएफआई और डीवाएफआई की चुप्पी ने खड़े किए सवाल
तिरुवनंतपुरम, 10 अक्टूबर (आईएएनएस)। केरल पब्लिक सर्विस कमीशन (पीएससी) की परीक्षा में हुई गंभीर अनियमितताओं पर सीपीआईएम के छात्र और युवा संगठनों एसएफवाई और डीवाईएफआई की चुप्पी ने उनकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं, क्योंकि अब यह विवाद संवैधानिक भर्ती संस्था को भी अपनी चपेट में ले सकता है।
विवादित स्टेट प्लानिंग बोर्ड परीक्षा की नई संशोधित रैंक लिस्ट में श्याम कृष्णन पहले स्थान पर हैं, उन्होंने मूल्यांकन में हुई गड़बड़ियों को लेकर कानूनी लड़ाई लड़ी थी। अरुण जे. प्रताप, जो वामपंथी विचारधारा के समर्थक माने जाते हैं और मूल लिस्ट में टॉप करके नौकरी पा चुके थे, अब पांचवें स्थान पर खिसक गए हैं।
पीएससी अब श्याम कृष्णन की नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू करने और प्रताप के लिए जारी नियुक्ति की सिफारिश को रद्द करने की तैयारी कर रही है। हालांकि, प्रताप एक साल से अधिक समय से नौकरी कर रहे हैं, इसलिए इस मामले में एक और कानूनी लड़ाई शुरू हो सकती है।
हैरानी की बात यह है कि कथित अनियमितताओं पर एसएफआई और डीवाएफआई खामोश हैं, जबकि क्राइम ब्रांच की जांच तेज हो रही है और हाई कोर्ट ने भी पीएससी को कड़ी फटकार लगाई है।
मौजूदा 16-सदस्यीय आयोग (जिसमें एक चेयरमैन और 15 सदस्य शामिल हैं) को पिछली पिनाराई विजयन के नेतृत्व वाली एलडीएफ सरकार ने नियुक्त किया था। भर्ती प्रक्रिया भी उसी सरकार के कार्यकाल में शुरू हुई थी।
इन संगठनों की यह खामोशी इसलिए भी चौंकाने वाली है क्योंकि संशोधित लिस्ट ने उस उम्मीदवार को नीचे धकेल दिया है जिसे मूल लिस्ट के जरिए नौकरी मिली थी और उस शिकायतकर्ता को ऊपर पहुंचा दिया है जिसने मूल्यांकन प्रक्रिया को चुनौती दी थी।
हाल ही में वामपंथी विचारधारा से जुड़े एक संगठन ने राज्य सरकार के एक संस्थान में कांग्रेस नेता की पत्नी की कॉन्ट्रैक्ट पर नियुक्ति के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया था।
उस प्रतिक्रिया और पीएससी मामले पर चुप्पी के बीच अंतर ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या ये संगठन अपने ही राजनीतिक खेमे से जुड़ी कथित अनियमितताओं के मामले में भी वही मानक अपना रहे हैं।
यह विवाद तब और गंभीर हो गया जब क्राइम ब्रांच की चल रही जांच में राज्य की प्रमुख भर्ती एजेंसी द्वारा की गई नियुक्तियों में और भी कथित अनियमितताएं सामने आईं।
इस सप्ताह की शुरुआत में केरल हाई कोर्ट ने सवाल उठाया कि क्या प्लानिंग बोर्ड परीक्षा में 58 अंकों के उत्तरों का मूल्यांकन न करना खुलेआम भ्रष्टाचार के बराबर है। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि नौकरी के लाखों उम्मीदवार पीएससी पर निर्भर हैं और इस संस्था में उनके भरोसे को बनाए रखना जरूरी है।
सरकार ने पीएससी के इस दावे का विरोध किया है कि यह चूक केवल एक लिपिकीय या तकनीकी गलती थी। सरकार का तर्क है कि उत्तरों का मूल्यांकन न करना जानबूझकर की गई हेरफेर का संकेत हो सकता है।
पीएससी के खिलाफ 150 से ज़्यादा शिकायतें भी कोर्ट के संज्ञान में लाई गई हैं। पीएससी ने हाई कोर्ट में क्राइम ब्रांच की जांच को चुनौती दी है।
जांच में यह पता लगाया जा रहा है कि मूल्यांकन में हुई चूक अनजाने में हुई थी या इसका मकसद कुछ खास उम्मीदवारों को फायदा पहुंचाना था।
--आईएएनएस
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