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सेबी के निपटान नियमों में बदलाव से गबन किए गए धन की वसूली में आएगी तेजी, शेयरधारकों की सुरक्षा भी मजबूत होने की उम्मीद

 

नई दिल्ली, 27 सितंबर (आईएएनएस)। भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) के प्रस्तावित निपटान नियमों में व्यापक बदलाव से हेराफेरी से जुड़े मामलों में गलत तरीके से स्थानांतरित किए गए धन की वसूली में तेजी आ सकती है और शेयरधारकों की सुरक्षा मजबूत हो सकती है। यह जानकारी सेबी के अधिकारियों और कानूनी विशेषज्ञों की ओर से दी गई।

बाजार नियामक ने पिछले सप्ताह हुई बोर्ड बैठक में सेबी (प्रशासनिक और दीवानी कार्यवाही का निपटान) विनियम, 2026 को मंजूरी दी। इसके तहत ऐसे मामलों को लंबे समय तक चलने वाली कानूनी प्रक्रिया के बिना निपटाने के उद्देश्य से कई बदलाव किए गए हैं। संशोधित ढांचे में निपटान राशि की गणना के लिए एक निर्धारित फॉर्मूला, अवैध तरीके से अर्जित लाभ के लिए अलग प्रावधान, कुछ मामलों में फास्ट-ट्रैक निपटान और निपटान व्यवस्था तक व्यापक पहुंच का प्रावधान किया गया है।

इन नियमों को अभी अधिसूचित किया जाना बाकी है और अधिसूचना जारी होने के 30 दिन बाद ये प्रभावी होंगे।

सेबी के चेयरमैन तुहिन कांत पांडे ने कहा कि धन के डायवर्जन या हेराफेरी से जुड़े मामलों में निवेशकों की सुरक्षा केवल निपटान राशि तक सीमित नहीं होगी। उन्होंने कहा कि जहां लागू होगा, वहां धन की वापसी (अवैध लाभ की वापसी) और उपचारात्मक और विनियामक शर्तें (आरआरटी) भी इस प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा होंगे।

पांडे ने कहा, “शेयरधारकों के हितों की सुरक्षा कई तरीकों से की जा सकती है। निश्चित तरीकों में से एक यह है कि यदि धन की हेराफेरी हुई है, तो वह सबसे पहले वापस आना चाहिए। इस पर कोई समझौता नहीं हो सकता।”

उन्होंने कहा कि निपटान को केवल निपटान राशि के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि जहां लागू हो, वहां धन की वापसी और आरआरटी को भी इसका हिस्सा माना जाना चाहिए।

मंजूर किए गए ढांचे के तहत निपटान राशि एक निर्धारित फॉर्मूले के आधार पर तय की जाएगी, जबकि जहां आवश्यक होगा, वहां आरआरटी लागू किया जाएगा। पांडे ने कहा कि निपटान राशि “जुर्माने की कुछ गुना” होगी।

निपटान का मतलब दोष स्वीकार करना या दोष से इनकार करना नहीं होता। हालांकि, इससे संबंधित कंपनी या व्यक्ति पर वित्तीय प्रभाव पड़ेगा और नियामक को कार्यवाही का तेजी से निपटारा करने में मदद मिल सकती है।

नई प्रक्रिया के तहत सेबी, कारण बताओ नोटिस जारी करने से पहले एक निपटान नोटिस जारी करेगा। ऐसा नोटिस पाने वाली संस्थाओं के पास निपटान आवेदन दाखिल करने के लिए 60 दिन का समय होगा।

प्रस्तावित व्यवस्था का असर सूचीबद्ध कंपनियों की प्रकटीकरण आवश्यकताओं पर भी पड़ सकता है। सेबी के पूर्णकालिक सदस्य कमलेश चंद्र वार्ष्णेय ने कहा कि कंपनियों को कारण बताओ नोटिस मिलने पर जानकारी का खुलासा करना आवश्यक है, लेकिन निपटान नोटिस के लिए जरूरी नहीं कि ऐसी ही प्रकटीकरण आवश्यकता पैदा हो, क्योंकि यह कारण बताओ नोटिस नहीं है।

वार्ष्णेय ने कहा, “संभवत: क्योंकि यह (निपटान नोटिस) कारण बताओ नोटिस नहीं है, इसलिए ऐसी आवश्यकता उत्पन्न नहीं होगी। लेकिन हम इस पहलू की जांच करेंगे।”

--आईएएनएस

एबीएस