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संस्कृति और आधुनिकता का एक-दूसरे के साथ सह-अस्तित्व संभव : दत्तात्रेय होसबोले

 

वाशिंगटन, 24 अप्रैल (आईएएनएस)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के महासचिव दत्तात्रेय होसबोले ने संगठन के वैश्विक विस्तार, उसकी सभ्यतागत सोच और समाज को जोड़ने में उसकी भूमिका पर बात की। उन्होंने कहा कि भारत जब अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों के साथ अपने संबंध बढ़ा रहा है, तब सांस्कृतिक मूल्य और आधुनिकता साथ-साथ चल सकते हैं।

'न्यू इंडिया कॉन्फ्रेंस' के दौरान हडसन इंस्टीट्यूट में एक अनौपचारिक बातचीत में बोलते हुए, होसाबले ने आरएसएस को एक लोगों का स्वैच्छिक आंदोलन बताया, जिसकी जड़ें भारत के सांस्कृतिक लोकाचार और सभ्यतागत मूल्यों में गहरी जमी हैं। उन्होंने आगे कहा कि पिछली एक सदी में इसका मुख्य काम ऐसे निस्वार्थ स्वयंसेवकों का एक नेटवर्क बनाना रहा है जो समाज सेवा और राष्ट्र निर्माण के लिए समर्पित हैं।

उन्होंने कहा, "आरएसएस लोगों का एक स्वैच्छिक आंदोलन है, और यह सांस्कृतिक लोकाचार और सभ्यतागत मूल्यों से प्रेरित है... पिछले 100 सालों से यह स्वयंसेवकों को तैयार करने में लगा हुआ है। संगठन आत्मविश्वास, सेवा-भाव और एकता की भावना जगाने के लिए रोज़ाना और हर हफ्ते हजारों बैठकें आयोजित करता है।"

होसबोले ने बताया कि आरएसएस ने शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास और आपदा राहत जैसे कई क्षेत्रों में अपना काम बढ़ाया है। उन्होंने कहा कि स्वयंसेवक मिलकर करीब 40 तरह की सामाजिक संस्थाएं चला रहे हैं, जो राष्ट्र निर्माण में योगदान दे रही हैं।

पश्चिमी देशों में आरएसएस को लेकर बनी धारणाओं पर उन्होंने कहा कि संगठन को सही तरीके से समझा नहीं गया है। उन्होंने यह भी कहा कि इसे “अल्पसंख्यक विरोधी, विकास विरोधी और आधुनिकता विरोधी” बताने वाली बातें सही नहीं हैं और यह छवि वर्षों से बनाई गई है।

विचारधारा के बारे में, होसाबले ने ज़ोर देकर कहा कि आरएसएस हिंदू पहचान को एक धार्मिक अवधारणा के बजाय एक सभ्यतागत अवधारणा के रूप में देखता है। उन्होंने कहा, "हिंदू पहचान एक सभ्यतागत पहचान है, धार्मिक नहीं... इसमें किसी के भी अलग-थलग पड़ने की कोई गुंजाइश नहीं है।" उन्होंने आगे कहा कि "गलतफहमियों" और "शंकाओं" को दूर करने के लिए अलग-अलग समूहों के साथ बातचीत करना जरूरी है।

उन्होंने यह भी कहा कि परंपरा और आधुनिकता एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। उनके अनुसार, दोनों साथ-साथ चल सकते हैं। उन्होंने इसे बरगद के पेड़ से तुलना करते हुए कहा कि जैसे उसकी जड़ें मजबूत होती हैं और समय के साथ नई पत्तियां और फूल आते हैं, वैसे ही संस्कृति और आधुनिकता साथ बढ़ते हैं।

भारत की वैश्विक भूमिका पर उन्होंने कहा कि भारत सभी देशों, खासकर अमेरिका के साथ अच्छे संबंध चाहता है। उन्होंने जोर दिया कि ये रिश्ते आपसी विश्वास, सम्मान और एक-दूसरे की जरूरतों को समझने पर आधारित होने चाहिए।

भारत-अमेरिका संबंधों को मजबूत करने के लिए उन्होंने लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने की बात कही। उनका कहना था कि कई बार पूर्वाग्रह बीच में आ जाते हैं, इसलिए बेहतर समझ जरूरी है। उन्होंने कहा कि संस्थाएं, थिंक टैंक और विश्वविद्यालय इस दूरी को कम करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

देश के भीतर आरएसएस की प्राथमिकताओं पर उन्होंने पांच मुख्य बिंदु बताए- सामाजिक समरसता, पर्यावरण के अनुकूल जीवन, पारिवारिक मूल्य, आत्मनिर्भरता और नागरिक कर्तव्य व बोध। उन्होंने कहा कि ये सिद्धांत सार्वभौमिक हैं और एक मजबूत और समृद्ध राष्ट्र बनाने में मदद करते हैं।

उन्होंने आरएसएस के भीतर स्वयंसेवा को जीवन भर की प्रतिबद्धता के रूप में भी वर्णित किया। उन्होंने कहा, "यह जीवन जीने का एक तरीका है... 24 घंटे, सातों दिन और 365 दिन... एक बार स्वयंसेवक, हमेशा स्वयंसेवक।"

यह 'फायरसाइड चैट' हडसन इंस्टीट्यूट के 'न्यू इंडिया कॉन्फ्रेंस' का हिस्सा थी, जिसने नीति निर्माताओं, विद्वानों और रणनीतिक विशेषज्ञों को एक मंच पर लाकर भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका और अमेरिका-भारत साझेदारी के भविष्य पर चर्चा करने का अवसर प्रदान किया।

यह सम्मेलन ऐसे समय में हुआ है जब अमेरिका भारत को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में एक अहम रणनीतिक साझेदार के रूप में देख रहा है। 1925 में स्थापित आरएसएस को दुनिया के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठनों में से एक माना जाता है और इसका भारत के सामाजिक और राजनीतिक जीवन पर लंबे समय से प्रभाव रहा है।

--आईएएनएस

एएस/