सीएसआर रैकेट: ईडी ने 4 राज्यों में 8 ठिकानों पर तलाशी के बाद 21 लाख रुपए जब्त किए
मुंबई, 5 अक्टूबर (आईएएनएस)। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने 200 करोड़ रुपए के फर्जी कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (सीएसआर) डोनेशन से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामलों में महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, गुजरात और दिल्ली-एनसीआर में आठ जगहों पर तलाशी के दौरान 21 लाख रुपए और डिजिटल सबूत जब्त किए। इस संबंध में अधिकारी ने सोमवार को जानकारी दी।
बयान के मुताबिक, प्रवर्तन निदेशालय के मुंबई जोनल ऑफिस-I ने एक अक्टूबर को तलाशी ली थी। इससे शुरुआती तौर पर चैरिटेबल ट्रस्ट, ट्रस्टी, सीएसआर एजेंट, बिचौलियों और इक्विपमेंट सप्लायर्स के एक ऐसे नेटवर्क का पता चला है जो सीएसआर फंड को दूसरी जगह भेजने और रीसायकल करने में शामिल थे।
बयान में कहा गया है कि यह तलाशी मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (पीएमएलए), 2002 के प्रावधानों के तहत धर्मेंद्र कुमार चंद्रवीर सिंह और अन्य के मामले में ली गई थी, जो फर्जी सीएसआर डोनेशन रैकेट से जुड़ा है।
तलाशी के दौरान 21 लाख रुपए नकद जब्त किए गए। ईडी ने बताया कि तलाशी के दौरान कई आपत्तिजनक दस्तावेज और डिजिटल डिवाइस भी मिले और जब्त किए गए।
ईडी की जांच पीएमएलए के तहत शुरू की गई थी। यह जांच धर्मेंद्र कुमार चंद्रवीर सिंह के खिलाफ जुहू पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर पर आधारित थी। उन पर महाराष्ट्र मेडिकल प्रैक्टिशनर्स एक्ट, 1961, नेशनल मेडिकल कमीशन एक्ट, 2019 और भारतीय न्याय संहिता, 2023 के तहत अपराधों का आरोप है। इनमें आईपीसी की धारा 420, 467, 471 और 475 से जुड़े अपराध भी शामिल हैं, जो पीएमएलए के तहत 'शेड्यूल्ड ऑफेंस' (सूचीबद्ध अपराध) हैं।
ईडी ने बताया कि जांच से पता चला है कि धर्मेंद्र कुमार चंद्रवीर सिंह के पास कोई मान्यता प्राप्त मेडिकल डिग्री या मेडिकल काउंसिल में रजिस्ट्रेशन नहीं था और उन्होंने सिर्फ 12वीं कक्षा तक पढ़ाई की थी। इसके बावजूद उन्होंने खुद को डॉक्टर बताया और लगभग तीन दशकों तक 'डॉक्टर' का टाइटल इस्तेमाल किया।
जांच एजेंसी ने कहा कि "डॉक्टर" के टाइटल से जुड़ी साख और ऐसी पहचान का फायदा उठाते हुए, उसने चैरिटेबल ट्रस्ट और संस्थाओं का एक नेटवर्क बनाया और चलाया। ये संस्थाएं देखने में तो हेल्थकेयर पर केंद्रित सीएसआर गतिविधियों में लगी हुई लगती थीं, लेकिन इनके जरिए पीएसयू और प्राइवेट कंपनियों से भारी मात्रा में सीएसआर फंड जुटाए गए।
ईडी के मुताबिक, देश भर में कम से कम 40 पीएसयू और पब्लिक सेक्टर बैंकों ने आरोपी द्वारा चलाए जा रहे ट्रस्टों को सीएसआर डोनेशन दिया है।
कई प्रोजेक्ट्स या तो अधूरे छोड़े गए या फिर मिले फंड के अनुपात में पूरे नहीं किए गए, जबकि वेंडर के बिल बढ़ा-चढ़ाकर दिखाए गए और अतिरिक्त फंड को फर्जी या शेल कंपनियों के जरिए इधर-उधर किया गया। ईडी का आरोप है कि सीएसआर फंडिंग दिलाने वाले बिचौलियों को किकबैक और कमीशन भी दिए गए।
ईडी ने कहा कि जांच से पता चला है कि इन ट्रस्ट का इस्तेमाल अस्पतालों और हेल्थकेयर संस्थानों के लिए महंगी मेडिकल मशीनरी और उपकरण खरीदने के लिए फंड जुटाने के जरिया के तौर पर किया गया था।
बयान में कहा गया है कि जब ऐसे संस्थानों ने जरूरी उपकरण खरीदने के लिए फंड की कमी का हवाला दिया, तो उन्हें संबंधित इलाके के जन-प्रतिनिधियों से जोड़ा गया। इन जन-प्रतिनिधियों ने खास तौर पर सिंह द्वारा चलाए जा रहे ट्रस्ट के जरिए ऐसे प्रोजेक्ट्स के लिए फंड देने की सिफारिशें कीं।
इसमें कहा गया है कि जांच से पता चला है कि पीएसयू ने मुख्य रूप से जन-प्रतिनिधियों या उनके स्टाफ से मिली ऐसी सिफारिशों के आधार पर ही इन ट्रस्ट को सीएसआर डोनेशन दिया था।
इसमें कहा गया है कि जांच से यह भी पता चला है कि प्राइवेट कंपनियों से मिले सीएसआर योगदान का एक बड़ा हिस्सा, छोटा कमीशन काटने के बाद, योगदान करने वालों को कैश में वापस कर दिया जाता था।
जांच में सीएसआर एजेंटों और बिचौलियों के एक नेटवर्क का पता चला है जो सीएसआर फंड को ट्रस्ट तक पहुंचाते थे, और फिर वहां से यह पैसा मार्केट ऑपरेटरों द्वारा कंट्रोल की जाने वाली शेल कंपनियों (फर्जी कंपनियों) के जरिए आगे भेजा जाता था। इनमें से ज्यादातर कंपनियों की पहचान जीएसटी धोखाधड़ी की कई जांचों में भी की गई है।
सीएसआर सिस्टम का इस्तेमाल हिसाब-किताब वाले फंड को बिना हिसाब-किताब वाले कैश में बदलने के जरिया के तौर पर किया गया। ईडी ने कहा कि इस सिस्टम के जरिए 200 करोड़ रुपए का सीएसआर फंड इधर-उधर किया गया।
--आईएएनएस
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