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पाकिस्तान: मानवाधिकार समूह ने खैबर पख्तूनख्वा में गवर्नर शासन खत्म करने और नेताओं की रिहाई की मांग की

 

इस्लामाबाद, 25 अक्टूबर (आईएएनएस)। पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग (एचआरसीपी) ने रविवार को खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में आपातकाल और गवर्नर शासन को तत्काल समाप्त करने के साथ मुख्यमंत्री सहित सभी मनमाने ढंग से हिरासत में लिए गए लोगों की रिहाई की मांग की।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर साझा किए गए अपने बयान में एचआरसीपी ने कहा कि खैबर पख्तूनख्वा पाकिस्तान का एकमात्र ऐसा प्रांत है, जहां विपक्ष की सरकार है। ऐसे में संघीय सरकार द्वारा आपातकाल और गवर्नर शासन लागू करने का निर्णय और भी अधिक चिंताजनक है। आयोग ने निर्वाचित मुख्यमंत्री और अन्य जनप्रतिनिधियों की हिरासत की निंदा करते हुए इसे लोकतांत्रिक मानदंडों का घोर उल्लंघन बताया।

एचआरसीपी का यह बयान ऐसे समय में आया है, जब 12 अक्टूबर को संघीय सरकार द्वारा प्रांतीय सरकार को आपातकाल के तहत निलंबित किए जाने के बाद खैबर पख्तूनख्वा के मुख्यमंत्री सोहेल अफरीदी और कई कैबिनेट सदस्यों को हिरासत में ले लिया गया था। पाकिस्तान के अखबार डॉन की रिपोर्ट के अनुसार, अफरीदी, नेशनल असेंबली के सदस्य जुनैद अकबर और विधानसभा अध्यक्ष बाबर सलीम स्वाती को 'प्रिवेंटिव कस्टडी' में रखा गया था।

एचआरसीपी ने एक्स पर लिखा, "इससे पहले भी पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग ने अधिकारियों को खैबर पख्तूनख्वा में आपातकाल और गवर्नर शासन लागू करने के खिलाफ कड़ी चेतावनी दी थी। दो सप्ताह बाद हम एक बार फिर इन कदमों का पूर्ण विरोध दोहराते हैं। हमारी चिंताएं अब भी लोकतांत्रिक दायरे के सिमटने, प्रांत के मतदाताओं के मताधिकार से वंचित होने, मनमानी और निवारक हिरासत और आम नागरिकों पर सुरक्षा उपायों के असंगत प्रभाव को लेकर बनी हुई हैं।"

आयोग ने कहा, "खैबर पख्तूनख्वा देश का इकलौता विपक्ष-शासित प्रांत है, ऐसे में यह हस्तक्षेप विशेष रूप से चिंताजनक है। इसके निर्वाचित मुख्यमंत्री की हिरासत लोकतांत्रिक मानदंडों का घोर अपमान है, जबकि अन्य निर्वाचित जनप्रतिनिधियों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं, जिनमें पंजाब में पीटीआई की महिला कार्यकर्ता भी शामिल हैं, की गिरफ्तारी राजनीतिक गतिविधियों पर व्यापक कार्रवाई की ओर संकेत करती है।"

एचआरसीपी ने कहा कि वह उग्रवाद और आतंकवाद की निंदा करता है, लेकिन इस बात पर जोर दिया कि आतंकवाद-रोधी कदम कानून के दायरे में उठाए जाने चाहिए और ये सामूहिक दंड, अत्यधिक बल प्रयोग या मौलिक अधिकारों के दमन का बहाना नहीं बनने चाहिए।

एचआरसीपी ने कहा कि सैन्य अभियानों में नागरिकों के हताहत होने और बड़े पैमाने पर विस्थापन का जोखिम बना रहता है, जबकि केवल बल प्रयोग के माध्यम से स्थायी शांति स्थापित करने के प्रयास बार-बार विफल साबित हुए हैं।

एचआरसीपी ने एक्स पर लिखा, "प्रिवेंटिव कस्टडी और गैरकानूनी हिरासत विपक्ष की आवाज दबाने या न्यायिक सुरक्षा उपायों को दरकिनार करने का हथियार नहीं बननी चाहिए। हिरासत में लिए गए लोगों को उनकी गिरफ्तारी या हिरासत के आधारों की जानकारी दी जानी चाहिए, उन्हें वकीलों और परिवार के सदस्यों से मिलने की अनुमति मिलनी चाहिए तथा कानूनी रूप से निर्धारित समय-सीमा के भीतर अदालत में पेश किया जाना चाहिए। प्रांत में अपारदर्शी नजरबंदी केंद्रों का इतिहास इन सुरक्षा उपायों को विशेष रूप से आवश्यक बनाता है।"

एचआरसीपी ने इंटरनेट और मोबाइल सेवाएं बंद करने के शुरुआती फैसले को लेकर भी संघीय सरकार की आलोचना की और कहा कि इस तरह की बंदिशों से सूचना तक पहुंच बाधित होती है तथा शिक्षा, संचार और आजीविका पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

आयोग ने कहा कि उत्तरी और दक्षिणी वजीरिस्तान, बन्नू और मिरानशाह में कर्फ्यू और सैन्य तैनाती के कारण आम जनजीवन अब भी प्रभावित हो रहा है।

मानवाधिकार समूह ने खैबर, पेशावर और स्वात में पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) के कार्यकर्ताओं पर पुलिस छापेमारी की खबरों पर भी चिंता व्यक्त की। उसने मुख्यमंत्री और मनमाने ढंग से हिरासत में लिए गए अन्य सभी लोगों की तत्काल रिहाई, आपातकाल और गवर्नर शासन समाप्त करने तथा प्रांतीय विधानसभा की बहाली की मांग की। साथ ही पाकिस्तान सरकार और पीटीआई से उग्रवाद से निपटने, मौलिक अधिकारों की रक्षा करने और संसाधनों पर स्थानीय स्वामित्व सुनिश्चित करने के लिए राजनीतिक संवाद पुनः शुरू करने का आग्रह किया।

एचआरसीपी ने कहा, "हम पेशावर, स्वात और खैबर में पीटीआई कार्यकर्ताओं पर पुलिस छापेमारी और सभाओं को तितर-बितर किए जाने की खबरों से भी चिंतित हैं। बारा में पुलिस ने कथित तौर पर 2,000 से 4,000 लोगों की एक सभा पर लाठीचार्ज किया। इन खबरों की स्वतंत्र पुष्टि अभी आवश्यक है, लेकिन पूर्ण जानकारी के अभाव को अधिकारों के उल्लंघन न होने के प्रमाण के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। शांतिपूर्ण सभा पर लगाए गए प्रतिबंध वैध, आवश्यक और अनुपातिक होने चाहिए। साथ ही हिरासत में रखी गई महिलाओं के साथ किए गए व्यवहार की भी जांच होनी चाहिए।"

एचआरसीपी ने कहा, "हम मुख्यमंत्री और मनमाने ढंग से हिरासत में लिए गए अन्य सभी लोगों की तत्काल रिहाई, आपातकाल और गवर्नर शासन समाप्त करने और प्रांतीय विधानसभा की बहाली की मांग करते हैं। हम सरकार और पीटीआई से आग्रह करते हैं कि वे नागरिक समाज की भागीदारी के साथ व्यापक राजनीतिक संवाद पुनः प्रारंभ करें, ताकि उग्रवाद से प्रभावी ढंग से निपटा जा सके, मौलिक अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित हो और संसाधनों पर स्थानीय स्वामित्व कायम रखा जा सके।"

आयोग ने आगे कहा, "राज्य को यह समझना चाहिए कि आम सहमति और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के बजाय आपातकाल के माध्यम से शासन चलाने का प्रयास पाकिस्तान के लोकतंत्र को अपूरणीय क्षति पहुंचा सकता है।"

--आईएएनएस

केके/वीसी