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ईरान के संवर्धित यूरेनियम को हटाना 15-सूत्रीय संघर्ष-विराम प्रस्ताव की प्रमुख शर्त : पूर्व इजरायली राजदूत

 

यरूशलम, 26 मार्च (आईएएनएस)। जर्मनी में इजरायल के पूर्व राजदूत जेरेमी इसाचारॉफ ने कहा है कि अमेरिका की ओर से ईरान को भेजे गए 15-सूत्रीय संघर्ष-विराम प्रस्ताव में, परमाणु प्रसार के नजरिए से, संवर्धित यूरेनियम को हटाना ही सबसे अहम बात है।

आईएएनएस के साथ एक इंटरव्यू में इसाचारॉफ ने बताया कि हाल के वर्षों में ईरान ने लगभग 10 हजार किलोग्राम यूरेनियम को अलग-अलग स्तरों तक संवर्धित किया है, जिसमें से 8,500 किलोग्राम को 3.67 प्रतिशत तक और 1,000 किलोग्राम को 20 प्रतिशत तक संवर्धित किया गया है।

जब उनसे पूछा गया कि अमेरिका की ओर से ईरान को संघर्ष खत्म करने के लिए 15-सूत्रीय प्रस्ताव भेजने के बारे में उनका क्या विचार है, तो जेरेमी इसाचारॉफ ने कहा, "कुछ दिन पहले राष्ट्रपति ट्रंप को सुनते हुए, उन्होंने सभी परमाणु सामग्री को हटाने, ईरान में मिसाइल भंडार और क्षमताओं को सीमित करने और होर्मुज स्‍ट्रेट पर संयुक्त नियंत्रण रखने के बारे में बात की थी। उन्होंने होर्मुज स्‍ट्रेट पर किसी तरह के संयुक्त नियंत्रण की बात की, जिसके बारे में मुझे यकीन नहीं है कि बहुत ज्यादा विवरण की जरूरत होगी। यह सिर्फ 450 किलो या उससे ज्यादा यूरेनियम को हटाने के बारे में नहीं है, जिसे 60 प्रतिशत तक संवर्धित किया गया है।"

उन्होंने कहा, “हाल के वर्षों में ईरान ने लगभग 10 हजार किलोग्राम यूरेनियम को विभिन्न स्तरों तक संवर्धित किया है, ज‍िसमें 8,500 किलोग्राम को 3.67 प्रतिशत तक और 1,000 किलोग्राम को 20 प्रतिशत तक संवर्धित क‍िया गया है। इसके अलावा 460 किलोग्राम यूरेनियम को 60 प्रतिशत तक भी संवर्धित किया गया है। मेरे लिए एक ऐसे व्यक्ति के रूप में जिसने इस मुद्दे पर काफी काम किया है, खासकर प्रसार के दृष्टिकोण से, यह एक अहम इम्तिहान होगा कि इन 15 बिंदुओं में से कोई भी किस हद तक संवर्धित यूरेनियम को हटवाने में कामयाब हो पाता है। साथ ही, यह भी साफ होना चाहिए कि आईएईए को ईरान के अंदर मौजूद इन सामग्रियों, जगहों और अलग-अलग सुविधाओं की पूरी तरह से जांच करने की क्षमता हासिल हो।"

अमेरिका ने पश्चिम एशिया में संघर्ष समाप्त करने के लिए ईरान को 15-बिंदुओं की एक योजना भेजी है। द न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, यह जानकारी उन दो अधिकारियों के हवाले से दी गई है जिन्हें इस कूटनीतिक पहल की जानकारी दी गई थी।

पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष की शुरुआत 28 फरवरी को अमेरिका-इजरायल के संयुक्त हमलों के बाद हुई, जिसमें ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई और अन्य शीर्ष सैन्य अधिकारी मारे गए थे।

इसाचारॉफ ने यह भी उल्लेख किया कि इजरायल का ईरान और हिज्बुल्लाह के हमलों का सामना करना जारी है और 'अभी कुछ भी हो सकता है।'

इजरायल की वर्तमान स्थिति के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा, “सबसे पहले, मैं व्यक्तिगत रूप से उम्मीद करता हूं कि कूटनीतिक संपर्क जारी हों। मैंने कुछ दिन पहले राष्ट्रपति ट्रंप ने जो कहा, उसे बहुत ध्यान से सुना। मुझे समझ में आता है कि मध्यस्थता की प्रक्रिया चल रही है, लेकिन मेरा मानना है कि इस चैनल के माध्यम से संदेशों का आदान-प्रदान एक राजनीतिक समाधान खोजने में महत्वपूर्ण हो सकता है, जो पिछले तीन हफ्तों में हुई सैन्य कार्रवाई के पूरक के रूप में काम करेगा। इस समय यह प्रक्रिया अमेरिकियों की ओर से संचालित की जा रही है और स्थिति अभी भी बहुत अस्पष्ट है। गुरुवार सुबह और बुधवार को भी हम ईरान की ओर से मिसाइल हमलों और उत्तर में हिज्बुल्लाह की ओर से हमलों का सामना कर रहे थे। इसलिए हम अभी भी ऐसी स्थिति में हैं कि कुछ भी हो सकता है और हम उसके लिए तैयार हैं।”

पूर्व राजदूत ने पश्चिम एशिया के संघर्ष में पाकिस्तान की मध्यस्थता की खबरों पर बात की और कहा कि इजरायल भारत को 'एक बहुत करीबी रणनीतिक साझेदार' मानता है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया इजरायल यात्रा को इस रणनीतिक साझेदारी में महत्वपूर्ण बताया।

उन्होंने कहा, “हमारे पाकिस्तान के साथ संबंध नहीं हैं। उस क्षेत्र में हमारी सबसे बड़ी दोस्ती भारत के साथ है। हम भारत को एक बहुत करीबी रणनीतिक साझेदार मानते हैं, एक ऐसा साझेदार जिस पर हमें बहुत भरोसा है। हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी इजरायल गए थे। यह रणनीतिक साझेदारी के लिए एक महत्वपूर्ण यात्रा थी। इसलिए हमारे पाकिस्तान के साथ कोई संबंध नहीं हैं और जैसा कि आपने कहा क‍ि उनका अपना इत‍िहास रहा है। उनके कुछ इस्लामी चरमपंथी रुझान हैं और हमने पाकिस्तान को मध्यस्थ के रूप में नहीं चुना है। अगर यह बात सच है, तो यह अमेरिकियों की ओर से लिया गया फैसला है।”

इसाचारॉफ ने कहा, “मेरा मानना है कि बहुत करीबी सहयोगियों के साथ परामर्श करना हमेशा महत्वपूर्ण होता है और मैं अमेरिकी प्रशासन की ओर से नहीं बोल सकता। एक इजरायली के रूप में, जिसने इस मुद्दे पर बहुत करीब से काम किया है, मैं समझता हूं कि हमें आम तौर पर अपने सहयोगियों, जैसे भारत के साथ वर्तमान स्थिति पर बहुत गहन और निरंतर बातचीत करनी चाहिए। हम समझते हैं कि वर्तमान स्थिति भारतीय हितों को प्रभावित करती है। हम यह भी समझते हैं कि भारत की ईरान के प्रति नीति, इजरायल से अलग हो सकती है। लेकिन यह ऐसी नीति नहीं है जो इजरायल के नुकसान पर आधारित हो। मेरा मानना है कि आपने अपने हितों को आगे बढ़ाने और इजरायल के साथ अपनी मित्रता बनाए रखने का एक तरीका खोज लिया है। मेरे लिए यह महत्वपूर्ण है कि हम अपने सहयोगियों और मित्रों से परामर्श करें। यह केवल इजरायल के बारे में नहीं है, बल्कि पूरे क्षेत्र के बारे में है। यह दुनिया के अन्य हिस्सों, जैसे भारतीय उपमहाद्वीप और पूरे एशिया के बारे में भी है, जिनका इसमें बड़ा हित है, साथ ही निश्चित रूप से यूरोप का भी।”

--आईएएनएस

एवाई/एबीएम